
भावार्थ : समुद्र प्रलय के समय में अपनी मर्यादा को छोड़ देते हैं और सागर भेद की इच्छा भी रखते हैं परन्तु साधुलोग प्रलय होने पर भी अपनी मर्यादा को नहीं छोड़ते।
प्रलयकाल में समुद्र अपनी मर्यादा तोड़ देते हैं। यह तो होता ही है। किन्तु साधु पुरुष प्रलय में भी अपनी सीमा का उल्लंघन नहीं करना चाहते। चाणक्य ने इस एक श्लोक में जो बात कही है, वह किसी दीर्घ ग्रन्थ की समाहार है। प्रकृति की सबसे विराट, सबसे अजेय शक्ति समुद्र भी जब महाविनाश के क्षण में अपनी सीमाएं भूल जाती है, तब एक साधु अपने चरित्र की रेखा नहीं लांघता। यहीं से इस श्लोक की दार्शनिक गहराई आरम्भ होती है।
भारतीय चिन्तन में 'प्रलय' का अर्थ केवल जलप्रलय नहीं है। वह सत्ता के विघटन की परम अवस्था है, जब नियम टूटते हैं, व्यवस्था ध्वस्त होती है, और सृष्टि का सम्पूर्ण ढांचा शिथिल पड़ जाता है। इस अर्थ में 'प्रलय' एक रूपक भी है, व्यक्ति के जीवन में आनेवाले उन विकट संकटों का, जब चारों ओर अन्धकार हो, मूल्य डगमगा रहे हों, और प्रलोभन या भय दोनों मिलकर मनुष्य को उसके स्वभाव से च्युत कर देना चाहते हों। चाणक्य कहते हैं कि समुद्र को क्षमा किया जा सकता है। वह प्रकृति की शक्ति है, चेतन नहीं। किन्तु साधु, जो विवेकशील है, जिसने चरित्र को साधा है, वह प्रलय में भी नहीं टूटता।
यह श्लोक दो महान प्रतीकों को आमने-सामने रखता है। सागर असीम है, गम्भीर है, अथाह है। और साधु, शान्त, तपस्वी, अनासक्त हैं। सामान्य दृष्टि में सागर बड़ा प्रतीत होता है। किन्तु चाणक्य का विवेक यहां सब कुछ पलट देता है। सागर की विशालता भौतिक है, बाह्य है। साधु की दृढ़ता आत्मिक है, अन्तर्निहित है।
जब प्रलय आता है, सागर की सीमाएं टूट जाती हैं क्योंकि उसकी मर्यादा बाहर से थी, परिस्थिति-जन्य थी। साधु की मर्यादा भीतर से है, वह संस्कार-जन्य है, स्वभाव-जन्य है। इसीलिए वह परिस्थिति के साथ नहीं बहती। महाभारत में भी भीष्म ने इसी सत्य को जिया। शर-शय्या पर पड़े, मृत्यु की प्रतीक्षा में, उन्होंने धर्म का उपदेश दिया। उनके जीवन का प्रलय, उनके ही कुल का विनाश, उनके धर्म-बोध को नहीं डिगा सका।
आज का समाज एक विचित्र प्रलय से गुजर रहा है। यह प्रलय जलप्लावन का नहीं, मूल्यों के विसर्जन का है। जब संस्थाएं अपनी मर्यादा भूलने लगती हैं, न्यायपीठ दबाव में झुकती है, पत्रकारिता सत्ता की भाषा बोलने लगती है, और शिक्षक परीक्षा-प्रणाली की दासता स्वीकार कर लेते हैं, तब यह श्लोक अपनी सम्पूर्ण प्रासंगिकता में सामने आता है।
चाणक्य की दृष्टि में 'साधु' केवल संन्यासी नहीं है। अपितु साधु प्रत्येक वह व्यक्ति है जिसने अपने धर्म को, अपनी भूमिका की नैतिक सीमा को आत्मसात किया है। एक न्यायाधीश का धर्म निर्भीक निर्णय है। एक पत्रकार का धर्म असुविधाजनक सत्य है। एक शिक्षक का धर्म विद्यार्थी का उत्थान है। प्रलय आने परअर्थात दबाव, प्रलोभन, भय के क्षण में जो इस धर्म को नहीं छोड़ता, वही साधु है।
एक सूक्ष्म दार्शनिक बिन्दु और है। चाणक्य कहते हैं- साधवः इच्छन्ति न। अर्थात साधु चाहते नहीं। केवल यह नहीं कि वे तोड़ते नहीं, वे तोड़ने की इच्छा भी नहीं रखते। यह भेद महत्त्वपूर्ण है। जो व्यक्ति मन में पतन चाहता हो किन्तु बाह्य कारणों से रुका हो, वह साधु नहीं। साधु वह है जिसका अन्तःकरण भी विचलित नहीं होता।
यही गीता का 'स्थितप्रज्ञ' है। यही उपनिषद् का 'धीर' है। चाणक्य ने नीतिशास्त्र की भाषा में वही बात कही जो वेदान्त ने आध्यात्मिक भाषा में कही कि चरित्र परिस्थिति का दास नहीं होता, वह आत्मा की अभिव्यक्ति है। प्रलय परीक्षा लेता है। साधु उत्तीर्ण होता है, इसलिए नहीं कि वह शक्तिशाली है, बल्कि इसलिए कि उसे टूटने की इच्छा ही नहीं होती। यही चाणक्य का सबसे गहरा सन्देश है- संकट चरित्र नहीं बनाता, वह केवल उसे प्रकट करता है।
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