
भावार्थ- मनुष्यों के लिए बहुत पैदल चलना बुढ़ापा लाता है, घोड़े बांधे रहने से बूढ़े होते हैं, अमैथुन से स्त्रियों पर बुढ़ापा छाता है और धूप में ज्यादा सुखाने से वस्त्र जर्जर हो जाते हैं।
चाणक्य नीति का यह श्लोक चार अत्यंत सरल और दैनिक जीवन से लिए गए उदाहरणों के माध्यम से एक ऐसा सार्वभौमिक सत्य प्रस्तुत करता है जो व्यक्ति से लेकर समाज तक, शरीर से लेकर आत्मा तक समान रूप से लागू होता है। वह सत्य है- अतिरेक ही जरा है। प्रत्येक वस्तु, प्रत्येक प्राणी की एक स्वाभाविक क्षमता है, एक सीमा है और जब उस सीमा से परे जाने को विवश किया जाता है, तब वह समय से पहले जीर्ण हो जाती है। 'जरा' यहां केवल वृद्धावस्था नहीं, अपितु यह उस अवस्था का नाम है जब कोई अपनी स्वाभाविक शक्ति और प्रसन्नता खो देता है।
यहां 'अध्वा' अर्थात् मार्ग। अत्यधिक पैदल चलना या अत्यधिक यात्रा। शरीर की एक सीमा होती है। जब उस सीमा से परे मनुष्य को निरंतर चलाया जाए, बिना विश्राम, बिना पोषण, बिना विराम तो शरीर समय से पहले जर्जर हो जाता है। किंतु इस सूत्र का गहरा अर्थ केवल शारीरिक थकान तक सीमित नहीं है।
'अध्वा' जीवन के उस निरंतर भागते रहने का भी प्रतीक है जो आज के युग में सर्वत्र दिखता है। नौकरी, परिवार, सामाजिक दायित्व, महत्त्वाकांक्षाओं के लिए सुबह से रात तक सतत भाग-दौड़ मनुष्य को उतनी ही तेजी से जीर्ण करती है जितनी अत्यधिक पैदल यात्रा।
आधुनिक चिकित्साविज्ञान में इसे 'Burnout' कहते हैं- वह अवस्था जब अत्यधिक श्रम और अत्यधिक दबाव के कारण व्यक्ति की शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक ऊर्जा पूर्णतः चुक जाती है। इस सूत्र में विश्राम का महत्त्व भी निहित है। विश्राम आलस्य नहीं, वह पुनर्निर्माण की प्रक्रिया है। जो शरीर को समय पर विश्राम देता है, जो जीवन में ठहरने के क्षण बनाता है, वह अधिक लंबे समय तक, अधिक प्रभावशाली ढंग से यात्रा कर सकता है।
घोड़े का स्वाभाविक धर्म गति है। जब घोड़े को बांधकर रखा जाता है, जब उसकी गति को अवरुद्ध किया जाता है, तब उसका तेज मंद पड़ता है, उसकी मांसपेशियां शिथिल होती हैं और उसका स्वभाव विषण्ण हो जाता है। यह रूपक मनुष्य और समाज दोनों पर लागू होता है।
जो व्यक्ति जिस क्षेत्र में स्वाभाविक रूप से प्रतिभाशाली है, यदि उसे उस क्षेत्र से दूर रखा जाए, यदि उसकी स्वाभाविक क्षमता को बंधनों में जकड़ा जाए तो वह भी जीर्ण होने लगता है। एक कलाकार को यदि केवल लेखाकार बनने को विवश किया जाए, एक स्वाभाविक नेता को यदि अनुयायी बनकर रहने को कहा जाए तो वह भीतर से मुरझाता जाता है।
सामाजिक संदर्भ में यह सूत्र और भी विस्तृत हो जाता है। जो समाज अपने नागरिकों की स्वाभाविक क्षमताओं को, चाहे भय से, चाहे रूढ़ि से, चाहे संकीर्ण परंपराओं से दबाकर रखता है, वह समाज सामूहिक रूप से जीर्ण होता जाता है। स्त्रियों की प्रतिभा को घर की चारदीवारी में बांधना, युवाओं की रचनात्मकता को परंपरा के नाम पर कुचलना, ये सब उस बंधन के सामाजिक रूप हैं जो घोड़े को जीर्ण करते हैं।
इस सूत्र में स्वतंत्रता और प्रतिभा-विकास का गहरा संदेश है। प्रत्येक व्यक्ति में एक स्वाभाविक 'वेग' है। एक ऐसी क्षमता जो उसे दूसरों से अलग करती है। उस वेग को पहचानना और उसे अभिव्यक्ति देना, यही जीवन की सबसे बड़ी सेवा है।
यह सूत्र सबसे अधिक सूक्ष्म और सबसे अधिक गलत समझा जाने वाला है। 'मैथुन' का अर्थ यहां केवल शारीरिक संबंध नहीं, इसका व्यापक अर्थ है दाम्पत्य का संपूर्ण सौंदर्य। यानी प्रेम, सहचर्य, परस्पर आदर, भावनात्मक उष्णता और जीवन की साझेदारी। जब स्त्री प्रेम और सहचर्य से वंचित रहती है, जब वह भावनात्मक एकाकीपन में जीती है तो उसकी जीवनशक्ति क्षीण होने लगती है। यह किसी भी मनुष्य के लिए सत्य है। यह 'जरा' शारीरिक नहीं, आत्मिक है। भोजन और निद्रा की तरह प्रेम मनुष्य की मूलभूत आवश्यकता है। जिसे यह नहीं मिलता, वह भले ही जीवित रहे, जीवन की उष्णता और रंग उससे विदा हो जाते हैं।
आधुनिक मनोविज्ञान इसे 'Emotional Deprivation Syndrome' कहता है। शोध सिद्ध करते हैं कि जो लोग भावनात्मक जुड़ाव और प्रेम से वंचित रहते हैं, उनकी रोग-प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होती है, मानसिक स्वास्थ्य बिगड़ता है और जीवन-काल भी कम होता है। प्रेम केवल भावना नहीं, वह जीवन का पोषण है।
यह सूत्र सबसे ठोस और भौतिक है किंतु इसमें भी एक गहरी रूपक-शक्ति है। वस्त्र को यदि अत्यधिक धूप में, अत्यधिक ताप में रखा जाए तो उसके रेशे टूटने लगते हैं, रंग फीका पड़ता है और वह समय से पहले जर्जर हो जाता है। इस रूपक का सामाजिक अर्थ यह है कि अत्यधिक दबाव, अत्यधिक प्रतिकूल परिस्थितियां और अत्यधिक कठिनाई किसी भी व्यक्ति, संबंध या संस्था को समय से पहले जर्जर कर देती हैं। जिस प्रकार वस्त्र को छांव और उचित देखभाल चाहिए, उसी प्रकार संबंधों को पोषण चाहिए, संस्थाओं को सुरक्षा चाहिए और मनुष्य के मन को भी कभी-कभी 'छांव' चाहिए।
इन चारों उदाहरणों में एक ही सत्य की प्रतिध्वनि है- अतिरेक जरा है, संतुलन जीवन है। अत्यधिक परिश्रम, अत्यधिक बंधन, अत्यधिक अभाव और अत्यधिक ताप — ये सब अपने-अपने क्षेत्र में जीर्णता लाते हैं। चाणक्य यहाँ "अति सर्वत्र वर्जयेत्" के उसी दर्शन को एक नए कोण से प्रस्तुत कर रहे हैं।
इस श्लोक का सबसे व्यावहारिक संदेश यह है कि अपनी और अपने प्रियजनों की 'जरा' के संकेतों को पहचानना सीखिए और उनका स्रोत खोजिए।
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