Ramzan Mei Roza Rakhne Aur Kholne ki Dua: रोजेदार रमजान के पाक महीने में सहरी और इफ्तार से पहले जरूर पढ़ें ये दुआ

रमजान का पवित्र महीना इबादत, सब्र और आत्मचिंतन का समय है। इसमें सहरी से इफ्तार तक रोजा रखा जाता है। रोजा रखने और खोलने से पहले दुआ पढ़ी जाती है, जिससे अल्लाह का शुक्र अदा होता है। दुआ ईमान मजबूत करती है और रोजे का सवाब बढ़ाती है।

Manali Rastogi
पब्लिश्ड20 Feb 2026, 07:18 AM IST
रोजेदार रमजान के पाक महीने में सहरी और इफ्तार से पहले जरूर पढ़ें ये दुआ
रोजेदार रमजान के पाक महीने में सहरी और इफ्तार से पहले जरूर पढ़ें ये दुआ

पवित्र महीना रमजान 2026 शुरू हो चुका है। यह महीना दुनिया भर के मुसलमानों के लिए रोजा रखने, इबादत करने, आत्मचिंतन करने और अपने ईमान को मजबूत करने का समय होता है। इस मुबारक महीने में सुबह सूरज निकलने से पहले से लेकर शाम सूरज डूबने तक रोजा रखना बहुत बड़ी इबादत माना जाता है।

रमजान में सिर्फ भूखे-प्यासे रहना ही नहीं, बल्कि सहरी और इफ्तार के समय दुआ पढ़ना भी बहुत जरूरी और सवाब का काम है। दुआ के जरिए बंदा अल्लाह का शुक्र अदा करता है और अपने रब से अपना रिश्ता और मजबूत करता है।

रोजा रखने की दुआ (सहरी की दुआ)

सहरी के समय रोजा शुरू करने से पहले मुसलमान अल्लाह के लिए रोजा रखने की नीयत करते हैं। नीयत का मतलब है दिल से पक्का इरादा करना कि यह रोजा सिर्फ अल्लाह की रज़ा के लिए रखा जा रहा है।

दुआ: “व बिसौमि ग़दिन नवयतु मिन शह्रि रमजान।”

अर्थ: “मैंने रमजान के महीने में कल का रोजा रखने की नीयत की।”

यह दुआ इस बात को जाहिर करती है कि इंसान पूरी सच्चाई और ईमानदारी के साथ अल्लाह की इबादत के लिए रोजा रख रहा है।

रोजा खोलने की दुआ (इफ्तार की दुआ)

जब शाम को सूरज डूब जाता है, तब रोजा खोला जाता है। उस समय अल्लाह का शुक्र अदा करने के लिए दुआ पढ़ी जाती है, क्योंकि उसी की ताकत से इंसान पूरे दिन का रोजा पूरा कर पाता है।

दुआ: “अल्लाहुम्मा इन्नी लका सुम्तु व बिका आमंतु व अलैका तवक्कलतु व अला रिज़्किका अफ़्तरतु।”

अर्थ: “ऐ अल्लाह! मैंने तेरे लिए रोजा रखा, तुझ पर ईमान लाया, तुझ पर भरोसा किया और तेरे दिए हुए रोज़ी से रोजा खोला।”

यह दुआ अल्लाह के प्रति भरोसा, ईमान और शुक्र का इजहार है।

एक और सही इफ्तार की दुआ

कई लोग रोजा खोलने के बाद यह खूबसूरत दुआ भी पढ़ते हैं:

“ज़हबा ज़्-ज़मअु वबतल्लतिल उरूक व साबितल अजरु इंशा अल्लाह।”

अर्थ: “प्यास खत्म हो गई, नसें तर हो गईं और अगर अल्लाह ने चाहा तो सवाब पक्का हो गया।”

यह दुआ इस बात की खुशी और उम्मीद जताती है कि अल्लाह रोजे का पूरा बदला अता करेगा।

रमजान में दुआ पढ़ने का महत्व

रमजान में सहरी और इफ्तार के समय दुआ पढ़ना बहुत अहम माना जाता है। इससे इंसान को यह एहसास होता है कि रोजा सिर्फ अल्लाह की खुशी के लिए रखा गया है। दुआ हमें सिखाती है कि ताकत, सब्र और रोज़ी सब कुछ अल्लाह की तरफ से है। रोजे के दौरान की गई दुआएँ ज्यादा कबूल होने की उम्मीद रहती हैं।

इस तरह रमजान का महीना इंसान को सब्र, शुक्र और अल्लाह के करीब होने का मौका देता है। रोजा सिर्फ शरीर की भूख-प्यास को रोकना नहीं है, बल्कि दिल और सोच को भी साफ करने का जरिया है।

(डिस्क्लेमर: इस लेख में दी गई जानकारी सिर्फ धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं पर आधारित है। मिंट हिंदी इस जानकारी की सटीकता या पुष्टि का दावा नहीं करता। किसी भी उपाय या मान्यता को अपनाने से पहले किसी योग्य विशेषज्ञ से सलाह लेना जरूरी है।)

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