
Tata Trusts battle: टाटा ग्रुप में चल रहे आंतरिक विवाद पर अब रतन टाटा के करीबी नोशिर सूनावाला ने पहली बार चुप्पी तोड़ी है। उन्होंने इस 157 साल पुराने ग्रुप में एकता और सामंजस्य की अपील की है। उन्होंने आंतरिक विवाद पर दुख जताते हुए तत्काल हल निकालने उम्मीद जताई है। टाटा ट्रस्ट्स इन दिनों अपने लीडरशिप में मतभेदों के कारण चर्चा में बना हुआ है। टाटा ट्रस्ट्स के पास टाटा संस में 51 फीसदी हिस्सेदारी है। इसी के साथ ग्रुप की होल्डिंग कंपनी को कंट्रोल करता है।
रतन टाटा के करीबी सहयोगी सूनावाला ने टाइम्स ऑफ इंडिया से बातचीत में कहा, 'टाटा ग्रुप में मैंने अपने करियर का ज्यादातर समय बिताया। इस ग्रुप में हो रहे मतभेदों को देखना दुखद है। मैं उम्मीद करता हूं कि ट्रस्ट्स के ट्रस्टी अपने मतभेदों को जल्द सुलझा लेंगे।" बता दें कि सूनावाला ने 2010 में टाटा संस के वाइस प्रेसिडेंट पद से और 2019 में टाटा ट्रस्ट्स के ट्रस्टी पद से इस्तीफा दे दिया था।
सूनावाला जब आगे पूछ गया कि क्या वह इस विवाद में मध्यस्थ की भूमिका निभा सकते हैं, तो उन्होंने साफ कहा, मैं अब बाहरी व्यक्ति हूं। मैंने कई साल पहले अपनी जिम्मेदारियां छोड़ दी थीं। मैंने अखबारों में उनके मतभेदों के बारे में पढ़ा। असल मुद्दा क्या है? यह 157 साल पुराना समूह है।" सूनावाला की यह टिप्पणी टाटा ग्रुप की विरासत और उसकी एकता की अहमियत को दिखाता है।
बता दें कि टाटा ट्रस्ट्स के ट्रस्टी मेहली मिस्त्री की पुनर्नियुक्ति को लेकर विवाद चल रहा है। सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट और सर रतन टाटा ट्रस्ट दोनों के ट्रस्टी मिस्त्री की नियुक्ति पर सहमति बनाने में ट्रस्ट्स के नेतृत्व में मतभेद आ गया है। जल्द ही इस फैसले का ऐलान होने की उम्मीद है, लेकिन सर्वसम्मति की कमी ने संगठन की एकता पर सवाल खड़े किए हैं। टाटा ट्रस्ट्स में ऐतिहासिक रूप से सभी फैसले सर्वसम्मति से लिए जाते रहे हैं, लेकिन इस बार ऐसा नहीं हो पाया है।
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