Mauni Amavasya Vrat Katha: मौनी अमावस्या हिंदू धर्म का एक प्रमुख पर्व है। यह माघ महीने में आती है और इसे माघी या माघ अमावस्या भी कहा जाता है। इस दिन लोग पवित्र नदियों में स्नान करते हैं, व्रत रखते हैं, पितरों के लिए तर्पण करते हैं और स्नान के बाद दान-पुण्य करते हैं। मान्यता है कि इस दिन किए गए धार्मिक कार्य शुभ फल देते हैं। इस वर्ष मौनी अमावस्या 18 जनवरी को है। आइए जानते हैं इससे जुड़ी व्रत कथा।
मौनी अमावस्या की कथा (Mauni Amavasya Vrat Katha In Hindi)
पौराणिक कथा के अनुसार, कांचीपुरी नगर में देवस्वामी नाम के एक ब्राह्मण अपनी पत्नी धनवती के साथ रहते थे। उनके सात पुत्र और एक पुत्री थी, जिसका नाम गुणवती था। जब सभी बच्चे बड़े हो गए, तो देवस्वामी ने सबसे पहले अपनी पुत्री का विवाह करने का निश्चय किया। उन्होंने गुणवती की कुंडली अपने सबसे छोटे पुत्र को देकर किसी विद्वान ज्योतिषी को दिखाने भेजा।
ज्योतिषी ने कुंडली देखकर बताया कि गुणवती का पति विवाह के तुरंत बाद मर जाएगा। यह सुनकर देवस्वामी बहुत दुखी हुए और एक संत से सलाह ली। संत ने बताया कि सिंहल द्वीप पर सोमा धोबिन नाम की एक अत्यंत पतिव्रता स्त्री रहती है। यदि वह विवाह से पहले गुणवती के घर आकर पूजा करे और उसे आशीर्वाद दे, तो यह दोष दूर हो सकता है। यह सुनकर देवस्वामी ने अपनी पुत्री और छोटे पुत्र को सिंहल द्वीप भेजा।
यात्रा के दौरान दोनों समुद्र किनारे एक पीपल के पेड़ के नीचे रुके। उस पेड़ पर गिद्धों का परिवार रहता था। उस समय घोंसले में केवल गिद्ध के बच्चे थे। उन्होंने भाई-बहन की बातचीत सुन ली और समझ गए कि वे रास्ता नहीं जानते। शाम को जब गिद्ध लौटा, तो बच्चों ने सारी बात बता दी। गिद्ध को उन पर दया आई। उसने उन्हें भोजन कराया और उनकी मदद करने का निश्चय किया। गिद्ध की सहायता से दोनों सिंहल द्वीप पहुंच गए।
वहां गुणवती और उसका भाई चुपचाप सोमा धोबिन के घर के पास रहने लगे। सोमा का आशीर्वाद पाने के लिए गुणवती रोज़ सुबह सोमा के आंगन को साफ कर गोबर से लीपती थी, लेकिन सोमा को पता नहीं था कि यह काम कौन करता है। एक दिन सोमा ने अपनी बहुओं से पूछा कि आंगन कौन साफ करता है। बहुओं ने झूठ बोलकर कहा कि वही करती हैं। सोमा को संदेह हुआ, इसलिए वह रात भर जागती रही। सुबह उसने एक युवती को आंगन लीपते देखा। सोमा ने उससे कारण पूछा। तब गुणवती ने अपनी पूरी कहानी बता दी। यह सुनकर सोमा धोबिन द्रवित हो गईं और उसने गुणवती के वैवाहिक जीवन की रक्षा का वचन दिया।
सोमा धोबिन गुणवती और उसके भाई के साथ उनके घर गईं और वहां पूजा की। फिर गुणवती का विवाह हुआ, लेकिन विधि का विधान टल न सका और विवाह के बाद उसके पति की मृत्यु हो गई। तब सोमा धोबिन ने अपना संचित पुण्य गुणवती को दान कर दिया, जिससे उसका पति जीवित हो गया। पुण्य दान करने के कारण सोमा के अपने पति और पुत्र की मृत्यु हो गई।
घर से निकलते समय सोमा ने अपनी बहुओं से कहा था कि जब तक वह लौट न आएं, पति और पुत्र के शवों को सुरक्षित रखना। बहुओं ने ऐसा ही किया। वापस लौटते समय सोमा एक पीपल के पेड़ के नीचे बैठीं, भगवान विष्णु की पूजा की और 108 बार उस पेड़ की परिक्रमा की। इससे उन्हें फिर से पुण्य प्राप्त हुआ। घर लौटने पर उसी पुण्य के प्रभाव से उनके पति और पुत्र जीवित हो गए। इस कथा से मौनी अमावस्या के व्रत, दान और पुण्य के महत्व का पता चलता है।
(डिस्क्लेमर: इस लेख में दी गई जानकारी सिर्फ धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं पर आधारित है। मिंट हिंदी इस जानकारी की सटीकता या पुष्टि का दावा नहीं करता। किसी भी उपाय या मान्यता को अपनाने से पहले किसी योग्य विशेषज्ञ से सलाह लेना जरूरी है।)