
भगवान शिव के भक्त रविवार को रवि प्रदोष व्रत और मासिक शिवरात्रि दोनों मनाएंगे। आषाढ़ कृष्ण पक्ष में एक ही दिन इन दोनों पर्वों का पड़ना बेहद शुभ माना जाता है। यह दिन भगवान शिव की पूजा, व्रत और आराधना के लिए खास माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन श्रद्धा से पूजा करने पर अच्छी सेहत, लंबी उम्र, मानसिक शांति और आध्यात्मिक उन्नति का आशीर्वाद मिलता है।
रविवार को पड़ने वाले प्रदोष व्रत को रवि प्रदोष व्रत कहा जाता है। मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने और भगवान शिव की पूजा करने से पितृ दोष के प्रभाव को कम करने में मदद मिलती है और कुंडली में सूर्य ग्रह मजबूत होता है। इसी दिन रात में मासिक शिवरात्रि भी मनाई जाएगी, जो हर महीने कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि पर आती है।
सूर्यास्त के बाद शुरू होने वाला प्रदोष काल भगवान शिव की पूजा के लिए सबसे शुभ समय माना जाता है। इस दौरान भक्त दिनभर व्रत रखते हैं और शाम के शुभ मुहूर्त में शिव पूजा करते हैं।
प्रदोष व्रत हर महीने दो बार, त्रयोदशी तिथि पर रखा जाता है। जब यह व्रत रविवार को पड़ता है तो इसे रवि प्रदोष व्रत कहा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन श्रद्धा और नियम से व्रत रखने से पितृ दोष का प्रभाव कम होता है और सूर्य की शुभ स्थिति मजबूत होती है।
भक्त अच्छी सेहत, लंबी उम्र, आत्मविश्वास, पारिवारिक सुख और समाज में सम्मान की कामना करते हैं। यह भी माना जाता है कि इस व्रत से जीवन की परेशानियां दूर होती हैं और कठिन समय में मानसिक शक्ति मिलती है।
एक समय की बात है। एक छोटे से गांव में एक गरीब ब्राह्मण अपनी पत्नी और बेटे के साथ रहता था। ब्राह्मण की पत्नी बहुत धर्मपरायण थी और हर प्रदोष व्रत पूरे श्रद्धा भाव से रखती थी। उनका एक ही पुत्र था, जिसे वह बहुत स्नेह करती थी।
एक दिन उनका बेटा गंगा स्नान करने के लिए घर से निकला। रास्ते में कुछ चोरों ने उसे रोक लिया। उन्होंने सोचा कि यह किसी संपन्न परिवार का लड़का होगा। चोरों ने उसे डराते हुए कहा, "अगर अपनी जान बचानी है तो अपने पिता के छिपे हुए धन के बारे में बता दो।"
लड़के ने शांत स्वर में जवाब दिया, “हम बहुत गरीब लोग हैं। हमारे घर में कोई धन-दौलत नहीं है।” चोरों की नजर उसके हाथ में बंधी पोटली पर पड़ी। उन्होंने पूछा, "फिर इसमें क्या रखा है?" लड़के ने बिना किसी डर के सच बता दिया, "मेरी मां ने रास्ते के लिए रोटियां बांध दी हैं।"
उसकी सादगी और सच्चाई देखकर चोरों का मन बदल गया। उन्होंने आपस में कहा, "यह तो बहुत गरीब परिवार का बच्चा है। इसे परेशान करने से कोई लाभ नहीं।" इतना कहकर उन्होंने उसे छोड़ दिया और वहां से चले गए।
लड़का आगे बढ़ते-बढ़ते एक दूसरे नगर में पहुंच गया। यात्रा से थक जाने के कारण वह नगर के बाहर एक बड़े बरगद के पेड़ की छांव में आराम करने लगा और वहीं उसे नींद आ गई।
उसी समय राजा के सैनिक चोरों की तलाश में उस इलाके में पहुंचे। उन्होंने सोते हुए लड़के को देखा और बिना पूरी जांच किए उसे चोर समझ लिया। सैनिक उसे पकड़कर राजा के सामने ले गए। राजा ने भी बिना सच्चाई जाने उसे जेल में बंद करने का आदेश दे दिया।
इधर जब शाम तक बेटा घर नहीं पहुंचा तो उसकी मां बहुत परेशान हो गई। अगले दिन प्रदोष व्रत था। उसने पूरी श्रद्धा के साथ व्रत रखा और भगवान शिव से अपने बेटे की सुरक्षित वापसी की प्रार्थना की।
भगवान शिव अपने भक्त की भक्ति से प्रसन्न हुए। उसी रात उन्होंने राजा को स्वप्न में दर्शन दिए और कहा, "जिस बालक को तुमने कैद किया है, वह निर्दोष है। उसे सुबह होते ही सम्मान के साथ रिहा कर दो। यदि ऐसा नहीं किया तो तुम्हारे राज्य का सुख और वैभव समाप्त हो जाएगा।"
सुबह होते ही राजा की आंख खुली और उसे अपनी गलती का एहसास हुआ। उसने तुरंत आदेश देकर लड़के को जेल से मुक्त कराया। इसके बाद राजा ने उससे पूरी घटना विस्तार से पूछी। लड़के ने रास्ते में चोरों से हुई मुलाकात से लेकर सैनिकों द्वारा पकड़े जाने तक की सारी बात सच-सच बता दी।
सच्चाई जानने के बाद राजा ने अपने सेवकों को ब्राह्मण और उसकी पत्नी को राजदरबार में बुलाने के लिए भेजा। दोनों पति-पत्नी घबराए हुए दरबार में पहुंचे। राजा ने उन्हें सांत्वना देते हुए कहा, "डरने की कोई बात नहीं है। आपका पुत्र पूरी तरह निर्दोष है और अब सुरक्षित है।"
अपनी भूल सुधारने के लिए राजा ने ब्राह्मण को पांच गांव दान में दिए, ताकि उसके परिवार की गरीबी हमेशा के लिए दूर हो जाए और वे सम्मान के साथ जीवन बिता सकें। भगवान शिव की कृपा से उस परिवार के सभी दुख समाप्त हो गए और वे सुख-समृद्धि से रहने लगे।
मान्यता है कि जो श्रद्धालु रवि प्रदोष व्रत पूरी आस्था और नियम के साथ करते हैं, उन पर भगवान शिव की विशेष कृपा बनी रहती है। उनके जीवन के कष्ट धीरे-धीरे दूर होते हैं और उन्हें सुख, स्वास्थ्य तथा समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
मासिक शिवरात्रि की पूजा निशीथ काल, यानी आधी रात के समय की जाती है। इसे भगवान शिव की आराधना के लिए सबसे पवित्र समय माना जाता है।
मासिक शिवरात्रि हर महीने कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाई जाती है और यह भगवान शिव को समर्पित होती है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, महाशिवरात्रि की आधी रात भगवान शिव पहली बार अनंत शिवलिंग के रूप में प्रकट हुए थे। इसी वजह से आधी रात में की जाने वाली शिव पूजा का विशेष महत्व माना जाता है।
इस दिन भक्त व्रत रखते हैं और शिवलिंग पर दूध, जल, बेलपत्र, फूल और फल अर्पित करते हैं। साथ ही 'ॐ नमः शिवाय' मंत्र का जाप करते हैं और पूरी रात जागकर भगवान शिव का ध्यान और भजन-पूजन करते हैं।
अविवाहित महिलाएं अच्छा जीवनसाथी पाने की कामना से यह व्रत रखती हैं, जबकि विवाहित महिलाएं अपने परिवार की सुख-शांति और पति की लंबी उम्र के लिए भगवान शिव से प्रार्थना करती हैं। यह भी मान्यता है कि यदि कोई भक्त महाशिवरात्रि से शुरुआत करके लगातार एक साल तक मासिक शिवरात्रि का व्रत रखता है, तो भगवान शिव की कृपा से उसकी कठिन मनोकामनाएं भी पूरी हो सकती हैं।
अधिकांश श्रद्धालु सुबह स्नान करके व्रत का संकल्प लेते हैं। पूरे दिन नियम और संयम का पालन करते हैं, भगवान शिव के मंत्रों का जाप करते हैं, धार्मिक ग्रंथों का पाठ करते हैं और संभव हो तो शिव मंदिर जाकर दर्शन करते हैं।
शाम को प्रदोष काल में विशेष शिव पूजा की जाती है। वहीं मासिक शिवरात्रि का व्रत रखने वाले भक्त आधी रात के निशीथ काल तक पूजा और भक्ति में लगे रहते हैं।
भगवान शिव के भक्तों के लिए 12 जुलाई 2026 का दिन बेहद खास है, क्योंकि रवि प्रदोष व्रत और मासिक शिवरात्रि का यह दुर्लभ संयोग व्रत, पूजा और भक्ति के माध्यम से भगवान शिव का आशीर्वाद पाने का सुनहरा अवसर माना जाता है।
(डिस्क्लेमर: इस लेख में दी गई जानकारी सिर्फ धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं पर आधारित है। मिंट हिंदी इस जानकारी की सटीकता या पुष्टि का दावा नहीं करता। किसी भी उपाय या मान्यता को अपनाने से पहले किसी योग्य विशेषज्ञ से सलाह लेना जरूरी है।)
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