Shri Durga Chalisa: नवरात्रि में 9 दिन करें श्री दुर्गा चालीसा का पाठ, आप पर बरसेगी मां दुर्गा की कृपा

चैत्र नवरात्रि 2026 में 19 से 27 मार्च तक मनाई जाएगी और राम नवमी पर समाप्त होगी। इन नौ दिनों में मां दुर्गा के नौ रूपों की पूजा होती है। यह हिंदू नववर्ष की शुरुआत और वसंत के आगमन का प्रतीक है, जो नई शुरुआत और सकारात्मक ऊर्जा का संकेत देता है।

Manali Rastogi
अपडेटेड19 Mar 2026, 06:11 AM IST
श्री दुर्गा चालीसा
श्री दुर्गा चालीसा(Pexels)

चैत्र नवरात्रि की शुरुआत बहुत शांत तरीके से होती है। कोई अचानक बदलाव या शोर नहीं होता, बल्कि धीरे-धीरे दिनचर्या में बदलाव आने लगता है। लोग थोड़ा जल्दी उठने लगते हैं, खान-पान बदल लेते हैं और जहां संभव हो, अपनी गति धीमी कर लेते हैं। इस दौरान लोग अपने आसपास सकारात्मक ऊर्जा महसूस करते हैं।

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इस साल यह पर्व 19 मार्च से शुरू होकर 27 मार्च तक चलेगा और राम नवमी के साथ समाप्त होगा। ये नौ दिन मां दुर्गा के नौ रूपों, जिन्हें नवदुर्गा कहा जाता है, की पूजा के लिए समर्पित होते हैं। यह कई हिस्सों में हिंदू नववर्ष की शुरुआत भी दर्शाता है, इसलिए इसके साथ एक नई शुरुआत जैसा एहसास जुड़ा होता है।

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चैत्र नवरात्रि नई शुरुआत के विचार से जुड़ी हुई है। यह हिंदू चंद्र वर्ष की शुरुआत और वसंत ऋतु के आगमन के साथ मेल खाती है, जिन्हें नवीकरण और नएपन का प्रतीक माना जाता है। जब यह पर्व राम नवमी के दिन समाप्त होता है, तो यह एक साथ अंत और नई शुरुआत दोनों को दर्शाता है। इस दौरान श्री दुर्गा चालीसा का पाठ करना बेहद शुभ माना जाता है। अगर आपको अपने जीवन में सुख-शांति चाहिए तो नवरात्रि के नौ दिन दुर्गा चालीसा का पाठ जरूर करें।

श्री दुर्गा चालीसा (Shri Durga Chalisa In Hindi)

नमो नमो दुर्गे सुख करनी।

नमो नमो दुर्गे दुःख हरनी॥

निरंकार है ज्योति तुम्हारी।

तिहूं लोक फैली उजियारी॥ शशि ललाट मुख महाविशाला।

नेत्र लाल भृकुटि विकराला॥

रूप मातु को अधिक सुहावे।

दरश करत जन अति सुख पावे॥

तुम संसार शक्ति लै कीना।

पालन हेतु अन्न धन दीना॥

अन्नपूर्णा हुई जग पाला।

तुम ही आदि सुन्दरी बाला॥

प्रलयकाल सब नाशन हारी।

तुम गौरी शिवशंकर प्यारी॥

शिव योगी तुम्हरे गुण गावें।

ब्रह्मा विष्णु तुम्हें नित ध्यावें॥

रूप सरस्वती को तुम धारा।

दे सुबुद्धि ऋषि मुनिन उबारा॥

धरयो रूप नरसिंह को अम्बा।

परगट भई फाड़कर खम्बा॥

रक्षा करि प्रह्लाद बचायो।

हिरण्याक्ष को स्वर्ग पठायो॥

लक्ष्मी रूप धरो जग माहीं।

श्री नारायण अंग समाहीं॥

क्षीरसिन्धु में करत विलासा।

दयासिन्धु दीजै मन आसा॥

हिंगलाज में तुम्हीं भवानी।

महिमा अमित न जात बखानी॥

मातंगी अरु धूमावति माता।

भुवनेश्वरी बगला सुख दाता॥

श्री भैरव तारा जग तारिणी।

छिन्न भाल भव दुःख निवारिणी॥

केहरि वाहन सोह भवानी।

लांगुर वीर चलत अगवानी॥

कर में खप्पर खड्ग विराजै।

जाको देख काल डर भाजै॥

सोहै अस्त्र और त्रिशूला।

जाते उठत शत्रु हिय शूला॥

नगरकोट में तुम्हीं विराजत।

तिहुँलोक में डंका बाजत॥

शुम्भ निशुम्भ दानव तुम मारे।

रक्तन बीज शंखन संहारे॥

महिषासुर नृप अति अभिमानी।

जेहि अघ भार मही अकुलानी॥

रूप कराल कालिका धारा।

सेन सहित तुम तिहि संहारा॥

परी गाढ़ सन्तन पर जब जब।

भई सहाय मातु तुम तब तब॥

आभा पुरी अरु बासव लोका।

तब महिमा सब रहें अशोका॥

ज्वाला में है ज्योति तुम्हारी।

तुम्हें सदा पूजें नर-नारी॥

प्रेम भक्ति से जो यश गावें।

दुःख दारिद्र निकट नहिं आवें॥

ध्यावे तुम्हें जो नर मन लाई।

जन्म-मरण ताकौ छुटि जाई॥

जोगी सुर मुनि कहत पुकारी।

योग न हो बिन शक्ति तुम्हारी॥

शंकर आचारज तप कीनो।

काम क्रोध जीति सब लीनो॥

निशिदिन ध्यान धरो शंकर को।

काहु काल नहिं सुमिरो तुमको॥

शक्ति रूप का मरम न पायो।

शक्ति गई तब मन पछितायो॥

शरणागत हुई कीर्ति बखानी।

जय जय जय जगदम्ब भवानी॥

भई प्रसन्न आदि जगदम्बा।

दई शक्ति नहिं कीन विलम्बा॥

मोको मातु कष्ट अति घेरो।

तुम बिन कौन हरै दुःख मेरो॥

आशा तृष्णा निपट सतावें।

रिपु मुरख मोही डरपावे॥

शत्रु नाश कीजै महारानी।

सुमिरौं इकचित तुम्हें भवानी॥

करो कृपा हे मातु दयाला।

ऋद्धि-सिद्धि दै करहु निहाला।।

जब लगि जियऊं दया फल पाऊं।

तुम्हरो यश मैं सदा सुनाऊं॥

श्री दुर्गा चालीसा जो कोई गावै।

सब सुख भोग परमपद पावै॥

देवीदास शरण निज जानी।

करहु कृपा जगदम्ब भवानी॥

॥इति श्रीदुर्गा चालीसा सम्पूर्ण॥

जय माता दी

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