Shark Tank Season 5: 5 जनवरी 2026 से शुरू हुए शार्क टैंक इंडिया सीजन 5 का एक हालिया एपिसोड इन दिनों सोशल मीडिया पर खूब चर्चा में है। वजह कोई डील नहीं, बल्कि एक ऐसा पिच सेशन रहा, जहां चमक-दमक और बड़े दावों के बावजूद एक वेलनेस ब्रांड को रिजेक्ट कर दिया गया। चलिए जानते हैं क्या है पूरा माजरा।
‘डॉक्टर’ लिखने पर उठा सवाल
एपिसोड में एक वेलनेस ब्रांड Lewisia Wellness ने ₹1 करोड़ के निवेश के बदले ₹100 करोड़ की वैल्यूएशन मांगी। ब्रांड के फाउंडर मनोज दास ने खुद को “डॉ.” बताकर प्रोडक्ट्स पेश किए, लेकिन जब शार्क्स ने सवाल किए तो साफ हुआ कि उनके पास कोई मेडिकल डिग्री नहीं है। इतना ही नहीं, जिन प्रोडक्ट्स को “केमिकल-फ्री” बताया जा रहा था, उनमें केमिकल्स मौजूद होने की बात भी सामने आई।
जब एक-एक कर खोखले निकले दावे
शुरुआत में यह ब्रांड एक परफेक्ट D2C सक्सेस स्टोरी जैसा लग रहा था, चार कैटेगरी में प्रोडक्ट्स, 50 फीसदी से ज्यादा डायरेक्ट वेबसाइट सेल्स और मल्टी-करोड़ रेवेन्यू के दावे। लेकिन जैसे-जैसे सवाल बढ़े, वैसे-वैसे हर दावा कमजोर पड़ता गया। रिव्यूज और डेटा ने रेवेन्यू की कहानी पर भी सवाल खड़े कर दिए। एक-एक कर हर बात एक्सपोज हो गई।
इन्वेस्टर ने फ्रॉड तक कह दिया
इसपर मिनिमलिस्ट के को-फाउंडर इन्वेस्टर मोहित यादव ने तो सीधे कह दिया- आप यूजर्स इनसिक्योरिटी पर क्लिक बेट कंटेंट क्रिएट कर रहे हैं। नॉन-साइंटिफिक प्रोडक्ट बेच रहे हैं। मतलब ये तो 'फ्रॉड' है।
आप जेल भी जा सकते हैं…
पैनल में मौजूद निवेशकों ने सिर्फ डील से मना नहीं किया, बल्कि गंभीर चेतावनी भी दी। इन्वेस्टर अनुपम मित्तल ने साफ कहा कि ऐसे गलत दावे कानूनी मुश्किलें खड़ी कर सकते हैं। न कोई हैंडशेक हुआ, न कोई शुभकामनाएं, सीधा संदेश था कि इस तरह की ब्रांडिंग बर्दाश्त नहीं की जा सकती।
शार्क टैंक की लोगों ने की तारीफ
इस एपिसोड के बाद लिंक्डइन और X पर कई प्रोफेशनल्स और यूजर्स ने शो की तारीफ की। एक NGO फाउंडर ने लिखा कि जो निवेशक और प्लेटफॉर्म्स ऐसे फर्जीवाड़े को खुलेआम उजागर करते हैं, उन्हें सलाम। वहीं X पर एक यूजर ने लिखा- शुक्रिया शार्क टैंक इस एक्सपोज के लिए।
एक ने इस पिच को एक रिमाइंडर बताया कि वायरल रील्स, इंफ्लुएंसर प्रमोशन और बड़े-बड़े दावे ब्रांड को ऊपर जरूर ले जा सकते हैं, लेकिन जब प्रोडक्ट और सच्चाई खोखली हो, तो 15 मिनट की पूछताछ सब कुछ उजागर कर देती है।
यह एपिसोड सिर्फ एक रेजेक्शन नहीं था, बल्कि कंज्यूमर ट्रस्ट के पक्ष में लिया गया स्टैंड था। जिम्मेदार निवेश, पारदर्शिता और ईमानदार ब्रांडिंग ही लंबे समय तक टिकती है। शायद यही वजह है कि इस बार 'नो डील' भी लोगों को सही लगा।