
AR Rehman News: म्यूजिक कंपोजर एआर रहमान इन दिनों चर्चा में हैं। मकर संक्रांति के दिन 14 जनवरी को उन्होंने बीबीसी रेडियो को एक इंटरव्यू दिया। इंटरव्यू लेने वाले थे हारून रशीद। करीब डेढ़ घंटे की बातचीत में एआर रहमान ने हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के बारे में कुछ ऐसी बातें कहीं जो सोशल मीडिया पर बहस का विषय बन गई हैं। एक्स पर एआर रहमान के दावों की गहन पड़ताल हो रही है। आइए जानते हैं कि एआर रहमान ने बीबीसी को दिए इंटरव्यू में क्या-क्या कहा जिन पर विवाद छिड़ा है और रहमान की उन बातों पर लोग कैसी-कैसी प्रतिक्रियाएं दे रहे हैं।
एक्स यूजर आदित्य ने एआर रहमान के इंटरव्यू का एक क्लिप साझा करते हुए कुछ बातें कहीं हैं। उन्होंने लिखा, 'एआर रहमान से मिलिए। इनका दावा है कि हिंदी संगीत की मां उर्दू है जबकि हिंदी उर्दू के जन्म के सदियों पहले से अस्तित्व में है। उर्दू तो सौतेला बच्चा है, ना कि हिंदी की मां। छावा को विभाजनकारी बताना दोहरेपन की हद है। यह औरंगजेब के नरसंहार का सीधा इतिहास है। तथ्यों को दिखाना विभाजनकारी नहीं होता है, उन्हें छिपाना विभाजनकारी है।'
आदित्य ने आगे लिखा, 'आठ वर्षों से कोई काम नहीं मिलने का रोना रोते हुए उन्होंने संप्रदायिकता और राजनीतिक बदलाव का जो आरोप मढ़ा है, वह करोड़ों की अकूत संपत्ति में तैर रहे एक शख्स के विक्टिम कार्ड खेलने का शानदार नमूना है। उन्होंने सीखते रहने में सफलता नहीं पाई, बदलती दुनिया के अनुरूप खुद को ढालने की जरूरत को अस्वीकार कर दिया। जैसा कि हर असल कलाकार खुद को खंगालता रहता है, लेकिन रहमान दुनिया में दोष देख रहे हैं। वह करोड़ों की ढेर पर बैठे हैं, चाहते तो अपना खुद का एल्बम बना सकते थे, अपने पैसे से फिल्में बनवा सकते थे, लेकिन तब विक्टिम कार्ड खेलने का मौका कैसे मिलता?'
शिखर लिखते हैं, 'एआर रहमान से मिलिए। उन्होंने अपनी कौम की तरफ से हुए पहलगाम आतंकी हमले पर एक शब्द नहीं बोला, लेकिन भारत ने जब पाकिस्तान पर हमला किया तो शांति की अपील करने लगे। उन्हें तमिल और बॉलिवुड दोनों से काम नहीं मिल रहा है, लेकिन वह केवल हिंदी फिल्म इंडस्ट्री और हिंदुओं पर विभाजनकारी होने का आरोप मढ़ेंगे।'
अभिजीत मजूमदार लिखते हैं, ‘मो. अजहरुद्दीन जब बतौर कैप्टन मैच फिक्सिंग में पकड़े गए तो तुरंत कह दिया कि मुस्लिम होने के कारण उन्हें निशाना बनाया जा रहा है। अब एआर रहमान का टैलेंट और काम फीका पड़ रहा है तो वह भी वैसा ही विक्टिमहुड कार्ड खेल रहे हैं। मुस्लिम विक्टिमकार्ड खेलने का मजा ही ऐसा है कि लोग खुद को रोक नहीं पाते हैं।’
शेफाली वैद्य कहती हैं, ‘मुस्लिम होना जाकिर हुसैन को भारत का सबसे चहेता तबलावादक बनने से, अमजद अली खान को भारत का सर्वोत्तम सरोद वादक बनने से, अजीम प्रेमजी को भारत का सबसे सफल उद्योगपति बनने से या एपीजे अब्दुल कलाम को भारत का राष्ट्रपति बनने से नहीं रोक सका। लेकिन एआर रहमान की रचनात्मकता और गुणवत्ता का क्षरण क्या शुरू हुआ, उन्हें खुद के मुसलमान होने की याद आ गई।’
एक्स हैंडल @Alpakanya ने महशूर लेखिका शोभा डे का एक बयान पोस्ट किया है। इसमें शोभा डे कह रही हैं कि बॉलिवुड सबसे बड़ी सेक्युलर इंडस्ट्री है। वो कहती हैं कि एआर रहमान ने जो सांप्रदायिकता की बात की है, वह बहुत खतरनाक टिप्पणी है।
कृष्ण कुमार मुरुगन बताते हैं कि एआर रहमान को कुल सात राष्ट्रीय पुरस्कार मिले जिनमें पांच तब मिले जब भाजपा केंद्र सरकार में थी। यूपीए की 10 वर्षों की सरकार में एआर रहमान को एक भी पुरस्कार नहीं दिया गया जब कांग्रेस और डीएमके शासन में थी।
ज्योति कर्मा कहती हैं कि एआर रहमान के पिता का नाम आरके शेखर और दादा का नाम के राजगोपालन था। वो लिखती हैं, ‘आपने उन्हें संगीत की इतनी तगड़ी विरासत को श्रेय देते हुए कभी नहीं देखा होगा। वह किसी सूफी को श्रेय देंगे बजाय अपने परिवार के। वह अपने नए मजहब के बारे में तो खूब बातें करेंगे, लेकिन हिंदू धर्म के बारे में उनसे एक अच्छा शब्द नहीं सुन सकते। अजित डोभाल ने धुरंधर फिल्म में एआर रहमान जैसे लोगों के लिए एक वाक्य बोला है- हम दुश्मनों से घिरे हैं।’
राकेश कृष्ण सिम्हा लिखते हैं, 'स्वामी विवेकानंद ने 1899 में कहा था- किसी का हिंदू धर्म छोड़कर जाना अपनों की जमात से एक कम होना भर नहीं होता है बल्कि एक दुश्मन का बढ़ जाना होता है। यह सबूत देख लीजिए- एआर रहमान की मां कस्तूरी शेखर थीं। 1989 में उन्होंने इस्लाम अपना लिया। आज वो विभूति लगाए किसी हिंदू को अपने घर में आने देना नहीं चाहती हैं। तमिल कवि और गीतकार पिरासूदन ने बताया कि एआर रहमान की मां ने उनसे क्या कहा था- हमारे घर विभूति लगाकर मत आया करो।'
मेघ अपडेट्स ने एक वीडियो पोस्ट किया है जिसमें एआर रहमान के दावों की पड़ताल की गई है। आप भी सुनिए।
एआर रहमान को यह तो बताना चाहिए कि अगर नरेंद्र मोदी की सरकार आने के बाद मुसलमानों के लिए परिस्थितियां बदल गईं तो फिर उन्हें तीन बार नैशनल अवॉर्ड कैसे मिल गए? ध्यान रहे कि बीजेपी शासन में रहमान को पांच नैशनल अवॉर्ड मिले हैं- वर्ष 2002 में, 2003 में, 2018 में दो बार और फिर 2024 में। ऊपर के सोशल मीडिया पोस्ट्स के भाव तो यही हैं कि शब्दों को सुरों में पिरोने में माहिर रहमान ने कब विक्टिम कार्ड खेलने में महारत हासिल कर ली, यह किसी को पता ही नहीं चला। ज्यादातर लोग एआर रहमान के इस रवैये से निराश हैं कि आखिर उन्हें विक्टिमहुड कार्ड खेलने की जरूरत क्यों पड़ गई?
Disclaimer: यह लेख सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म एक्स पर आई प्रतिक्रियाओं पर आधारित है। इन प्रतिक्रियाओं से मिंट हिंदी का कोई वास्ता नहीं है और न हम इससे सहमत या असहमत हैं।
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