
कुरुक्षेत्र का विशाल मैदान। एक ओर पाण्डव सेना, दूसरी ओर कौरव सेना। धर्म और अधर्म का महासंग्राम आरंभ होने को है। महारथी अर्जुन अपने सारथी श्रीकृष्ण से कहते हैं, 'हे केशव, रथ को दोनों सेनाओं के मध्य ले चलो। मैं देखना चाहता हूं कि मुझे किनसे युद्ध करना है।' रथ दोनों सेनाओं के बीच खड़ा होता है। अर्जुन की दृष्टि घूमती है। सामने भीष्म पितामह हैं, द्रोणाचार्य हैं, कर्ण हैं, चाचा-ताऊ हैं, भाई हैं, मित्र हैं, गुरु हैं। वही लोग जिन्होंने उन्हें प्रेम दिया, जिनकी गोद में वे खेले, जिनसे विद्या सीखी। और अर्जुन टूट जाते हैं।
उनके हाथ से गाण्डीव धनुष छूट जाता है। पैर लड़खड़ाते हैं। मुख सूख जाता है। वे रथ में बैठ जाते हैं और कहते हैं, 'मैं यह युद्ध नहीं करूंगा। इन सबको मारकर मुझे क्या मिलेगा? राज्य का क्या करूंगा, जब अपने ही न रहेंगे?' यही है अर्जुन का विषाद- गीता का पहला अध्याय, जहां एक महावीर की मानवीय पीड़ा प्रकट होती है।
तब योगेश्वर श्रीकृष्ण मुस्कुराते हैं और आरंभ होता है श्रीमद्भगवद्गीता का महान संवाद। कृष्ण कहते हैं, 'क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ।' हे अर्जुन, कायरता मत दिखाओ। यह तुम्हें शोभा नहीं देता। और फिर वे देते हैं वह अमर वचन जो सहस्त्रों वर्षों से मनुष्यता का मार्गदर्शन कर रहा है-
'तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने में है, फल में कभी नहीं। न तो फल की कामना से कर्म करो, और न ही कर्म से विरत हो जाओ।' कृष्ण समझाते हैं कि आत्मा अजर-अमर है, शरीर नश्वर है। जो तुम मारते हो, वह मरता नहीं, वह केवल एक वस्त्र उतारता है। इसलिए शोक व्यर्थ है। क्षत्रिय का धर्म है धर्मयुद्ध लड़ना। यदि तुम इस धर्म से भागे, तो अधर्म को विजय मिलेगी।
गीता का यह कर्म-दर्शन केवल युद्धभूमि का उपदेश नहीं बल्कि यह जीवन की समग्र व्याख्या है। मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है फल की आसक्ति। जब हम परिणाम से बंध जाते हैं, तो भय उत्पन्न होता है। भय असफलता का, भय अस्वीकृति का, भय हानि का। यह भय ही अर्जुन का विषाद था। कृष्ण कहते हैं कि फल ईश्वर के हाथ में है, कर्म तुम्हारे हाथ में। जो तुम्हारे वश में नहीं, उसकी चिंता तुम्हें दुर्बल बनाती है।
निष्काम कर्म का अर्थ निष्क्रियता नहीं है। कृष्ण संन्यास नहीं सिखाते, कर्म-संन्यास सिखाते हैं। यानी कर्म करो, किन्तु उसके फल से अपनी पहचान मत जोड़ो। कार्य में पूरी शक्ति लगाओ, परिणाम को प्रकृति पर छोड़ दो। अर्जुन का विषाद वास्तव में मोह था, करुणा नहीं। वे अपनों को खोने के भय से पीड़ित थे। कृष्ण इस भेद को स्पष्ट करते हैं कि सच्ची करुणा धर्म की रक्षा में है, मोह में नहीं।
आज के युग में यह संदेश और भी प्रासंगिक है। परीक्षा में असफल होने पर छात्र टूट जाता है, व्यापार में घाटा होने पर व्यापारी हार मान लेता है, रिश्तों में ठोकर लगने पर व्यक्ति जीवन से विमुख हो जाता है। यह सब अर्जुन का विषाद ही है। गीता कहती है- उठो, अपना कर्म करो। जीत-हार, यश-अपयश, ये परिणाम हैं, तुम्हारी पहचान नहीं। समाज में भी जब व्यक्ति स्वार्थ छोड़कर कर्तव्य को प्राथमिकता देता है, चाहे वह शिक्षक हो, चिकित्सक हो, किसान हो या नेता, तभी सभ्यता आगे बढ़ती है।
गीता का यह उपदेश मानव-चेतना का सर्वोच्च दर्शन है। अर्जुन का विषाद हम सभी का विषाद है। वह क्षण जब हम कर्तव्य और मोह के बीच डोलते हैं तब कृष्ण की वाणी वह प्रकाश की भांति हमें दिशा दिखाती है- कर्म करो, निःस्वार्थ भाव से करो, और फल ईश्वर पर छोड़ दो। यही मनुष्य का सबसे बड़ा धर्म है।
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