
वनवास के दिन चल रहे थे। पाण्डव अज्ञातवास से पहले के उन वर्षों में वन-वन भटक रहे थे, राज्यहीन, अपमानित, किन्तु टूटे हुए नहीं। युधिष्ठिर के मन में एक ही चिन्ता थी कि जब युद्ध होगा, तब क्या हमारे पास वे अस्त्र होंगे जो कौरवों की उस विशाल सेना को परास्त कर सकें? द्रोणाचार्य, कर्ण, भीष्म, ये सब महारथी थे। साधारण पराक्रम से उन्हें जीतना असंभव था।
महर्षि व्यास ने युधिष्ठिर को मार्ग दिखाया- अर्जुन को दिव्यास्त्र प्राप्त करने के लिए तपस्या करनी होगी। और वह तपस्या साधारण नहीं होगी। देवराज इन्द्र स्वयं परीक्षा लेंगे, और महादेव शिव की कृपा बिना पाशुपतास्त्र मिलना असंभव है। अर्जुन ने भाइयों से विदा ली और हिमालय की ओर प्रस्थान कर गए।
इन्द्रकील पर्वत पर अर्जुन ने तपस्या आरम्भ की। पहले मास फल खाकर, फिर जल पीकर, और अन्ततः वायु मात्र पर जीवित रहकर। दोनों भुजाएं ऊपर उठाई हुईं, एक पैर पर खड़े, नेत्र बन्द। न शीत की चिन्ता, न ताप का भय। उनके शरीर की ऊष्मा से आसपास के ऋषि-मुनि व्याकुल हो उठे। इतनी प्रचण्ड थी वह साधना।
देवलोक में हलचल मच गई। इन्द्र ने सोचा, इस मनुष्य की तपस्या परखनी होगी। वे एक वृद्ध ब्राह्मण का वेश धरकर आए और अर्जुन से पूछा, 'इस कठोर तप का प्रयोजन क्या है? स्वर्ग चाहिए, अप्सराएं चाहिए, या यश?' अर्जुन का उत्तर था, 'न स्वर्ग, न यश, न सुख। मुझे केवल वे अस्त्र चाहिए जिनसे मैं अपने धर्म का पालन कर सकूं, अपने भाइयों की रक्षा कर सकूं।' यह सुनकर इन्द्र ने अपना वास्तविक रूप प्रकट किया। वे प्रसन्न थे, परन्तु उनकी परीक्षा अभी समाप्त नहीं हुई थी।
इन्द्र ने वचन दिया कि वे स्वयं अर्जुन को अस्त्र देंगे, किन्तु पहले महादेव को प्रसन्न करना होगा। तभी एक विचित्र घटना घटी। एक विशाल वराह, जंगली सूअर अर्जुन की ओर दौड़ा। अर्जुन ने तीर चलाया। किन्तु उसी क्षण एक किरात (वनवासी शिकारी) ने भी अपना बाण छोड़ा और घोषणा की कि वराह उसका शिकार है।
विवाद हुआ। अर्जुन ने किरात से युद्ध किया। अपने समस्त अस्त्र-शस्त्र चलाए, किन्तु किरात अविचल रहा। धनुष टूट गया, तरकश खाली हो गया, हाथों से युद्ध किया, वह भी निष्फल। अर्जुन धराशायी हो गए। तब उस किरात ने अपना वास्तविक रूप प्रकट किया। वे स्वयं महादेव थे। जो तपस्वी अस्त्र पाने के लिए आया था, उसे पहले यह सिद्ध करना था कि पराजय में भी वह टूटता नहीं। शिव प्रसन्न हुए और पाशुपतास्त्र प्रदान किया। तत्पश्चात् इन्द्र, यम, वरुण, कुबेर, सभी दिग्पालों ने अर्जुन को दिव्यास्त्र दिए।
अर्जुन की तपस्या केवल शारीरिक कठोरता नहीं थी, वह एक सम्पूर्ण मनःसाधना थी। इन्द्र ने वेश बदलकर जो प्रश्न किया, वह वास्तव में यह जांच रहा था कि इस तपस्वी की प्रेरणा क्या है, स्वार्थ या धर्म? और शिव का किरात-रूप यह परख रहा था कि पराजय और असहायता की स्थिति में भी यह व्यक्ति अपने लक्ष्य से विचलित होता है या नहीं।
भारतीय परम्परा में तपस्या का अर्थ केवल देह को कष्ट देना नहीं है। तप का मूल अर्थ है, ताप, अर्थात वह आन्तरिक ऊष्मा जो अशुद्धियों को जलाकर व्यक्ति को परिष्कृत करे। गीता में भगवान ने तप के तीन स्तर बताए हैं- शारीरिक, वाचिक और मानसिक। अर्जुन की तपस्या इन तीनों स्तरों पर एक साथ हुई।
महात्मा विदुर का वह सूत्र यहां अत्यन्त प्रासंगिक है —
अर्थात बुद्धिमान व्यक्ति दुर्लभ वस्तु की इच्छा नहीं करते, खोई हुई वस्तु पर शोक नहीं करते, और विपत्ति में घबराते नहीं हैं। अर्जुन ने खोए हुए राज्य का रोना नहीं रोया, न अप्राप्य सुखों की कामना की। उन्होंने वह मांगा जो धर्म के लिए आवश्यक था और उसी के लिए तप किया। यही उनकी तपस्या की सफलता का रहस्य था।
जो व्यक्ति किसी बड़े लक्ष्य के लिए, परिवार के लिए, समाज के लिए, किसी उचित उद्देश्य के लिए अपना सुख-वैभव छोड़कर साधना करता है, उसे अदृश्य शक्तियां भी सहयोग करती हैं। किन्तु जो केवल अपने अहंकार या स्वार्थ की पूर्ति के लिए तप करता है, देवता उसे अस्त्र नहीं, परीक्षा देते हैं और वह उसमें उत्तीर्ण नहीं हो पाता।
अर्जुन की तपस्या यह नहीं कहती कि परिश्रम करो और फल अवश्य मिलेगा। वह यह कहती है कि जब उद्देश्य शुद्ध हो, साधना निष्काम हो, और पराजय में भी धैर्य न टूटे, तब सृष्टि स्वयं मार्ग बनाती है। शिव किरात बनकर आते हैं, इन्द्र वृद्ध ब्राह्मण बनकर आते हैं, परीक्षा के रूप में, अवसर के रूप में। सच्ची तपस्या फलीभूत होती है किन्तु उसके पहले वह परिष्कृत करती है।
आज की कथा और आज का विचार पढ़ने के लिए क्लिक करें।
Catch all the Business News, Market News, Breaking News Events and Latest News Updates on Live Mint. Download The Mint News App to get Daily Market Updates.
MoreOops! Looks like you have exceeded the limit to bookmark the image. Remove some to bookmark this image.