
हस्तिनापुर के महाराज शांतनु एक दिन गंगा तट पर विचरण कर रहे थे, जब उनकी दृष्टि मछुआरों की कन्या सत्यवती पर पड़ी। उसके रूप और गुणों पर मोहित होकर शांतनु ने उससे विवाह का प्रस्ताव रखा। किंतु सत्यवती के पिता, मछुआरों के मुखिया दाशराज, ने एक कठोर शर्त रखी, 'मेरी पुत्री का पुत्र ही हस्तिनापुर का राजा बनेगा।'
शांतनु के पुत्र देवव्रत पहले से ही युवराज थे। राजा इस शर्त को मानने में असमर्थ थे, अतः टूटे मन से लौट गए। पुत्र देवव्रत ने पिता की उदासी का कारण जाना और स्वयं दाशराज के पास पहुंचे। उन्होंने घोषणा की, 'मैं राजसिंहासन का त्याग करता हूं।' किंतु दाशराज संतुष्ट नहीं हुए। उन्होंने कहा, 'आज तुमने त्याग किया, परंतु कल तुम्हारी संतान तो सिंहासन मांगेगी!'
तब देवव्रत ने वह प्रतिज्ञा ली जिसने इतिहास को हिला दिया, 'मैं आजीवन ब्रह्मचारी रहूंगा। मेरे कोई संतान नहीं होगी। मैं कभी विवाह नहीं करूंगा।' इस भीषण प्रतिज्ञा के कारण ही देवव्रत का नाम भीष्म पड़ा, जो भीषण संकल्प ले सके।
भीष्म की प्रतिज्ञा केवल एक व्यक्तिगत निर्णय नहीं थी, यह स्वाधीनता के स्वैच्छिक त्याग का प्रतीक है। उन्होंने अपनी समस्त इच्छाओं, सुखों और भविष्य को एक ही क्षण में बंधक बना दिया। भारतीय दर्शन में वचन को ब्रह्म-तुल्य माना गया है- 'सत्यं वद'। किंतु यहां प्रश्न उठता है कि क्या एक क्षणिक भावावेश में लिया गया वचन जीवनभर का बंधन बनना उचित है? भीष्म ने पिता के प्रेम में, बिना भविष्य के परिणामों को तौले, एक ऐसा वचन ले लिया जो आगे चलकर न केवल उनके लिए, बल्कि पूरे कुरुवंश के लिए विनाश का कारण बना।
भीष्म की प्रतिज्ञा पितृभक्ति का उत्कृष्ट उदाहरण है, परंतु इसी में उसकी सबसे बड़ी त्रासदी छिपी है। एक पुत्र का प्रेम इतना अंधा हो गया कि उसने राजनीतिक विवेक को तिलांजलि दे दी। वे आजीवन हस्तिनापुर की रक्षा करते रहे, चाहे सिंहासन पर धृतराष्ट्र जैसा अंधा राजा हो, या दुर्योधन जैसा अधर्मी। प्रतिज्ञा ने उनके विवेक को जंजीरों में जकड़ दिया। द्रौपदी के चीरहरण के समय भीष्म मौन रहे, इसलिए नहीं कि वे न्याय को नहीं जानते थे, बल्कि इसलिए कि उनका वचन उन्हें उस सिंहासन के प्रति बाध्य करता था जिसे उन्होंने कभी ठुकरा दिया था। यह नैतिक विडंबना महाभारत की सबसे गहरी पीड़ा है।
यह कथा एक कटु सामाजिक सत्य भी उजागर करती है। सत्यवती एक मोहरे की भांति थीं। उनके पिता ने उन्हें सत्ता की सौदेबाजी में प्रयोग किया। स्त्री की इच्छा, उसका भविष्य, उसकी प्रसन्नता, इन सबका कोई स्थान उस वार्तालाप में नहीं था जो दो पुरुषों के बीच हुआ। यह प्रवृत्ति आज भी समाज में किसी न किसी रूप में विद्यमान है, जहां स्त्री को संपत्ति की भांति, परिवार की महत्वाकांक्षाओं का साधन बनाया जाता है।
भीष्म की प्रतिज्ञा हमें तीन शाश्वत सत्य सिखाती है। पहला- प्रतिज्ञा सोच-समझकर लें क्योंकि भावावेश में लिया गया वचन जीवनभर का बोझ बन सकता है। दूसरा- धर्म और वचन में संघर्ष हो, तो धर्म को प्राथमिकता दें क्योंकि अंधी निष्ठा अधर्म की सहयोगी बन जाती है। और तीसरा, प्रेम अंधा न हो। पितृभक्ति हो, देशभक्ति हो या कोई भी बंधन, उसे विवेक की कसौटी पर कसना आवश्यक है।
भीष्म महान थे, परंतु उनकी महानता ही उनकी सबसे बड़ी बेड़ी बन गई। वे शरशय्या पर लेटे रहे और इतिहास साक्षी रहा कि एक वचन पूरे युग को बदल सकता है।
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