
कुरुक्षेत्र का युद्ध समाप्त हो चुका था। अठारह दिनों की उस विनाशलीला के पश्चात् जो शेष था, वह था केवल शोक, खंडहर और एक वृद्ध योद्धा का देह जो न जी रहा था, न मर रहा था। भीष्म पितामह बाणों की शय्या पर लेटे थे। दसों दिशाओं में उनके शरीर से शर घुसे हुए थे, पर उनकी आंखों में वेदना नहीं थी। वहां था एक अनंत शांत ज्योति। इच्छामृत्यु का वरदान उनके साथ था। शांतनु-पुत्र ने उत्तरायण की प्रतीक्षा में अपना देहत्याग स्थगित कर रखा था। सूर्य के उत्तर की ओर प्रस्थान तक वे जीवित रहने का संकल्प किये हुए थे।
युधिष्ठिर व्याकुल थे। महायुद्ध के पाप-बोध से दबे, भाइयों और परिजनों के शोक से टूटे, वे पितामह के पास आए। उनके साथ श्रीकृष्ण भी थे। भीष्म ने जो आगे कहा, वह महाभारत के शांतिपर्व और अनुशासनपर्व में संकलित है। राजधर्म, मोक्षधर्म, दानधर्म, स्त्रीधर्म, और सामाजिक नीति का अद्वितीय महाकोश। पर सबसे अद्भुत था वह क्षण जब युधिष्ठिर ने पूछा कि इस अवस्था में आप कैसे बोल सकते हैं? तब श्रीकृष्ण ने भीष्म के हृदय पर अपना दिव्य स्पर्श किया और उनमें अलौकिक वाकशक्ति का संचार हुआ। बाण-शरीर में धंसे थे, किंतु ज्ञान की वाणी निर्बाध बह रही थी, जैसे दीपक तेल समाप्त होने पर भी अंतिम क्षण तक प्रकाश देता है।
भीष्म की शरशैया केवल एक मृत्यु-प्रतीक्षा नहीं थी। वह भारतीय दर्शन का वह अनूठा क्षण था जब देह की सीमा समाप्त होने पर भी आत्मा का विस्तार रुकता नहीं। उपनिषदों में कठोपनिषद् की वह उक्ति स्मरण होती है जहां नचिकेता यम के द्वार पर मृत्यु के साथ संवाद करता है। यहां भीष्म स्वयं मृत्यु की देहरी पर खड़े हैं, और उस स्थान से ज्ञान का जो झरना फूटता है। वह पूरे महाभारत का सबसे दीर्घ, सबसे गहरा प्रवाह है।
मनोवैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो भीष्म की स्थिति असाधारण है। शरीर की असहनीय वेदना और मन की असीम प्रशांति, दोनों एक साथ विद्यमान हैं। आधुनिक मनोविज्ञान की भाषा में इसे 'detachment from the self' कहा जाएगा। आत्मा का देह से इस सीमा तक विलगन कि पीड़ा अनुभूति के केंद्र तक पहुंच ही न सके। गीता के दूसरे अध्याय में जिस स्थितप्रज्ञ की परिभाषा श्रीकृष्ण देते हैं, 'दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः।' जो दुःख में उद्विग्न न हो और सुख में आसक्त न हो। भीष्म उस परिभाषा को मात्र सिद्धांत नहीं, प्रत्यक्ष जीवन-सत्य बना देते हैं।
भीष्म ने युधिष्ठिर को जो राजधर्म समझाया, उसमें सत्ता के अहंकार के लिए कोई स्थान नहीं था। उन्होंने कहा कि राजा वह नहीं जो भोग करे, अपितु वह जो प्रजा के दुःख को अपना दुःख माने। यह संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना तब था। जब कोई नेता, संस्था, या व्यक्ति अपने अंतिम समय में भी दूसरों के कल्याण की चिंता करता है तो वह भीष्म की परंपरा में होता है। भीष्म ने अपनी मृत्युशैया को राजशास्त्र की पाठशाला बना दिया।
युधिष्ठिर केवल राजनीति नहीं, अपराधबोध लेकर आए थे। उन्होंने पूछा कि इतने हत्याकांड के पश्चात् भी क्या कोई पुण्य संभव है? भीष्म ने उत्तर दिया कि धर्म सूक्ष्म है, वह परिस्थिति के अनुसार बदलता है, किंतु उसका आधार सदा करुणा और सत्य है। यह वह दार्शनिक उत्तर है जो निरपेक्ष नैतिकता और सापेक्ष व्यावहारिकता के बीच का सेतु बनाता है। भारतीय दर्शन की यह विशेषता है कि वह 'श्वेत या श्याम' नहीं, अपितु रंगों का वह स्पेक्ट्रम देखता है जो वास्तविक जीवन में होता है।
आज के समय में हम प्रायः देखते हैं कि सेवानिवृत्ति, रोग, या वृद्धावस्था आते ही व्यक्ति अपने को निरर्थक मान लेता है। भीष्म का शरशैया-प्रसंग उस सोच को चुनौती देता है। ज्ञान की आयु नहीं होती। अनुभव की समाप्ति नहीं होती। जब तक श्वास है, जब तक चेतना है, तब तक देने का सामर्थ्य भी है। यही भीष्म का सबसे बड़ा उपदेश है, जो किसी श्लोक में नहीं, स्वयं उनके जीवन में अंकित है। शरशैया पर लेटे भीष्म एक प्रश्न पूछते हुए प्रतीत होते हैं कि क्या तुम अपनी सीमाओं को अपना परिचय बना लोगे? या सीमाओं के पार भी उस ज्ञान को जीते रहोगे जो तुम्हारे भीतर प्रतीक्षा कर रहा है?
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