
हस्तिनापुर के राजभवन में एक ऐसी सभा बुलाई गई जो इतिहास की धारा को सदा के लिए मोड़ देगी। दुर्योधन के मन में पांडवों की समृद्धि देखकर ईर्ष्या की अग्नि धधक रही थी। इंद्रप्रस्थ का वैभव, द्रौपदी का वह व्यंग्य- 'अंधे का पुत्र भी अंधा होता है।' यह सब उसके भीतर विष की तरह घुल चुका था। मामा शकुनि ने उपाय सुझाया- पासों का खेल। शकुनि कोई साधारण जुआरी न था; उसके पासे जादुई थे, उसकी चाल षड्यंत्र से भरी। धृतराष्ट्र जानते थे यह अनुचित है, फिर भी पुत्रमोह में उन्होंने निमंत्रण भेजा।
युधिष्ठिर आए। धर्मराज कहलाने वाले युधिष्ठिर, जो सत्य और न्याय के प्रतीक थे, वे भी इस जाल में फंस गए क्योंकि क्षत्रिय की मर्यादा थी कि आमंत्रण ठुकराना कायरता है, और जुए की चुनौती अस्वीकार करना अपमान।
पहला दांव लगा। फिर दूसरा। फिर तीसरा। युधिष्ठिर हारते गए- सोना, रथ, राज्य, हाथी, घोड़े... सब कुछ। और फिर वह क्षण आया जब उन्होंने अपने भाइयों को दांव पर लगाया। नकुल, सहदेव, अर्जुन, भीम- एक-एक करके सभी हार गए। तब उन्होंने स्वयं को दांव पर लगाया और हार गए। शकुनि ने पूछा, 'एक दांव और शेष है। द्रौपदी को लगाओ।' और युधिष्ठिर ने लगाया।
द्रौपदी के दांव पर भी युद्धिष्ठिर को हार ही मिली। द्रौपदी को भरी सभा में घसीटकर लाया गया। दुःशासन ने उनका चीरहरण करने का प्रयास किया। सभा में बैठे भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य, सबके सब मौन रहे। कर्ण ने अपमान किया। धृतराष्ट्र मौन रहे। यही वह क्षण था जब धर्म की परीक्षा हुई और सभा असफल हो गई। अंततः गांधारी के हस्तक्षेप और धृतराष्ट्र के भय से पांडवों को मुक्त किया गया, परंतु दूसरे द्यूत में वनवास और अज्ञातवास का दंड मिला। तेरह वर्ष का निर्वासन।
यह कथा केवल एक जुए की हार नहीं है। यह मानव मनोविज्ञान का सबसे गहरा विश्लेषण है। युधिष्ठिर की लत को समझिए। वह जानते थे कि शकुनि के पासे छल से भरे हैं। भीम ने कहा। अर्जुन ने चेताया। फिर भी वे रुक न सके। यह लत की प्रकृति है। तर्क मौन हो जाता है, आत्म-नियंत्रण टूट जाता है, और मनुष्य उस गर्त में उतरता चला जाता है जिसकी गहराई उसे दिखती है, पर पांव थमते नहीं। आधुनिक मनोविज्ञान इसे Cmpulsive Behavior कहता है। यह एक ऐसी मानसिक दासता होती है जो बाहरी बंधन से अधिक भयावह है।
दुर्योधन अंहकार के मकड़जाल में ऐसा फंसा कि उसे अपनी जीत का सुख नहीं, दूसरे के दुख में से संतोष मिलता था। यह अहंकार की विकृत परिणति है। जो व्यक्ति स्वयं के उत्थान से नहीं, दूसरे के अपमान से संतोष पाए, वह भीतर से कितना रिक्त है, यह कथा दर्शाती है।
द्यूत सभा में उपस्थित समस्त महारथियों का मौन एक सामाजिक पाप है। जब समाज के स्तंभ भीष्म जैसी प्रतिष्ठा, द्रोण जैसा ज्ञान, अन्याय के समक्ष चुप रहें, तो व्यवस्था ध्वस्त होती है। यह आज भी उतना ही सत्य है। मूक दर्शक भी अपराध में भागीदार होते हैं। दूसरी ओर, युधिष्ठिर ने क्षत्रिय मर्यादा के नाम पर चुनौती स्वीकार की। यह दिखाता है कि सामाजिक नियम जब विवेक से ऊपर हो जाएं, तो वे रक्षा नहीं करते, बंधन बन जाते हैं।
महाभारत की यह घटना हमें तीन शाश्वत सत्य देती है-
पहला, लत कभी नहीं जीतती, वह केवल छीनती है, चाहे वह द्यूत हो, क्रोध हो, या सत्ता की भूख।
दूसरा, अहंकार विनाश की पहली सीढ़ी है। दुर्योधन ने जो जीता, वह अंततः कुरुक्षेत्र में राख बन गया।
तीसरा, मौन भी एक हिंसा है। जब द्रौपदी पुकारती रही और सभा निःशब्द रही, उसी दिन महाभारत का युद्ध अनिवार्य हो गया।
व्यास ने यह कथा इसलिए नहीं लिखी कि हम युधिष्ठिर को दोष दें, उन्होंने लिखी ताकि हम स्वयं के भीतर के युधिष्ठिर को पहचानें।
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