
धृतराष्ट्र के राजमहल में उस दिन दीपक जल रहे थे, पर आत्माएं अंधेरे में डूबी थीं। युधिष्ठिर, जो धर्मराज कहलाते थे, द्यूत-क्रीड़ा में सब कुछ हार चुके थे। राज्य, सम्पत्ति, भाई, और अंततः स्वयं को भी। तब शकुनि ने मीठे विष की घुट्टी पिलाई, 'अब द्रौपदी को दांव पर लगाओ।' युधिष्ठिर ने विष के वश में होकर यही किया और हार गए।
दुर्योधन का आदेश हुआ- द्रौपदी को सभा में घसीट कर लाओ। दुःशासन उसके केश पकड़कर खींचता हुआ लाया। पांचों पाण्डव सिर झुकाए बैठे रहे। भीष्म पितामह मौन रहे। द्रोणाचार्य मौन रहे। विदुर ने विरोध किया, पर उनकी सुनी न गई। धृतराष्ट्र आंखें मूंदे रहे। वह पहले से ही अंधे थे, पर उस दिन उनकी आत्मा भी अंधी हो गई।
द्रौपदी ने सभा से न्याय मांगा। उसने पूछा, 'क्या एक पुरुष जो स्वयं दास हो चुका है, वह किसी और को दांव पर लगा सकता है?' यह प्रश्न न्याय का था, तर्क का था, धर्म का था। पर सभा मौन रही। दुःशासन ने उसका वस्त्र खींचना आरंभ किया। तब द्रौपदी ने मनुष्यों से आशा छोड़ दी। उसने दोनों हाथ ऊपर उठाए और केवल एक नाम पुकारा, 'हे गोविंद!' और वस्त्र बढ़ते चले गए। दुःशासन थकता रहा, वस्त्रों का ढेर लगता रहा। मान-मर्दन का वह षड्यंत्र विफल हो गया।
यह केवल एक स्त्री के अपमान की कथा नहीं है। यह उस क्षण की कथा है जब व्यवस्था अपना धर्म भूल जाती है।
भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य- ये सब ज्ञानी थे, नीतिवान थे। फिर भी चुप रहे। क्योंकि वे सब किसी न किसी रूप में व्यवस्था के ऋणी थे। भीष्म हस्तिनापुर की राजसत्ता के लिए प्रतिबद्ध थे- द्रोण शिष्यों के प्रति। धृतराष्ट्र पुत्र-मोह में अंधे थे। यह मौन कायरता नहीं, बल्कि संस्थागत भ्रष्टता का प्रतीक है। जब व्यक्ति जानते हुए भी बोलने में असमर्थ हो जाते हैं क्योंकि उनका स्वार्थ, भय या निष्ठा उन्हें बांधे रहती है। आज भी न्यायालय, संसद, विश्वविद्यालय, हर संस्था में ऐसी सभाएं भरी हैं जहां लोग जानते हैं, पर बोलते नहीं।
युधिष्ठिर 'धर्मराज' थे, पर उन्होंने द्रौपदी को दांव पर लगाया। यहां दार्शनिक बिंदु यह है कि नियम का पालन करना और धर्म का पालन करना एक नहीं होता। जुए के नियमों के अनुसार, शायद वे दांव लगा सकते थे, पर मानवीय गरिमा के धर्म के अनुसार यह अक्षम्य था। जब कोई व्यक्ति विधि के अक्षर में उलझकर उसकी आत्मा को भूल जाता है, वहीं से अधर्म प्रारंभ होता है।
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यह केवल आस्था का क्षण नहीं, बल्कि मानव-सत्ता की पराजय और दिव्य-सत्ता की स्वीकृति का क्षण है। जब तक द्रौपदी स्वयं अपने वस्त्र थामे रहीं, वह मनुष्यों पर, व्यवस्था पर भरोसा कर रही थीं। जिस क्षण उन्होंने हाथ छोड़े और ईश्वर को पुकारा, उन्होंने यह स्वीकार किया कि कुछ संकट ऐसे होते हैं जहां मनुष्य की सीमाएं समाप्त हो जाती हैं।
यह भारतीय दर्शन का केंद्रीय सूत्र है- शरणागति। अहंकार का विसर्जन और समर्पण। भगवद्गीता में कृष्ण कहते हैं- 'सर्वधर्मान् परित्यज्य माम् एकं शरणं व्रज।' द्रौपदी ने यही किया, उस चरम क्षण में।
यह कथा हमें बताती है कि स्त्री की गरिमा किसी पुरुष की सम्पत्ति नहीं। युधिष्ठिर ने उसे 'दांव' समझा, यही उसकी सबसे बड़ी भूल थी। द्रौपदी ने सभा में जो प्रश्न उठाया, वह आज भी प्रासंगिक है कि क्या एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति की स्वायत्तता पर अधिकार जता सकता है? उत्तर तब भी 'नहीं' था, आज भी 'नहीं' है।
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