
हस्तिनापुर के राजप्रासाद में उस दिन एक नया सूर्योदय हुआ था, जब द्रोणाचार्य ने पाण्डवों और कौरवों को शस्त्र-शिक्षा समाप्त होने पर बुलाया। उनके नेत्रों में स्नेह था, पर वाणी में एक पुराना घाव था। उन्होंने कहा, 'तुम सब मेरे शिष्य हो। गुरुदक्षिणा में मुझे एक ही वस्तु चाहिए। पाञ्चाल-नरेश द्रुपद को बंदी बनाकर मेरे समक्ष उपस्थित करो।'
द्रुपद और द्रोण एक समय मित्र थे, सहपाठी थे। परंतु राजसिंहासन पर बैठते ही द्रुपद ने द्रोण को दरिद्र ब्राह्मण कहकर अपमानित कर दिया था। वह अपमान द्रोण के हृदय में वर्षों से जलता रहा। गुरुदक्षिणा की यह मांग प्रतिशोध नहीं, धर्म-परीक्षा थी।
कौरवों ने पहले प्रयास किया। वे पराजित हुए। तब अर्जुन ने धनुष उठाया। उन्होंने अकेले पाञ्चाल-सेना से युद्ध किया, द्रुपद को परास्त किया और जीवित पकड़कर गुरु के चरणों में समर्पित कर दिया। द्रोणाचार्य ने द्रुपद को आधा राज्य लौटा दिया क्योंकि वे दण्ड नहीं, स्वाभिमान-पुनर्स्थापना चाहते थे। उस क्षण गुरु के नेत्र सजल थे। शिष्य ने जो कर दिखाया, वह केवल युद्ध-कौशल नहीं, श्रद्धा का प्रकटीकरण था।
भारतीय परम्परा में गुरुदक्षिणा को कभी मूल्य की भाषा में नहीं समझा गया। यह कोई शुल्क नहीं है, कोई व्यापार नहीं है। यह उस ऋण की स्वीकृति है जिसे शब्दों में नहीं चुकाया जा सकता। तैत्तिरीय उपनिषद में आचार्य कहते हैं, 'मातृदेवो भव, पितृदेवो भव, आचार्यदेवो भव'। माता-पिता और गुरु देव-तुल्य हैं। जब देव के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की जाती है, तो वह भेंट नहीं होती, वह भाव-अर्पण होता है। द्रोण ने जो मांगा, वह स्वर्ण नहीं था, भूमि नहीं थी, वह था अपने शिष्य से सिद्धि का प्रमाण। और अर्जुन ने वह प्रमाण युद्धभूमि पर लिख दिया।
द्रोण के मन को समझना हो तो यह जानना आवश्यक है कि वे एक विरोधाभासी पात्र हैं। एक ओर वे धनुर्विद्या के सर्वश्रेष्ठ आचार्य हैं, दूसरी ओर उनके भीतर एक आहत अहंकार है जो द्रुपद के उस वाक्य से आज तक कसकता है। यह अहंकार दुर्बलता नहीं, उस मनुष्य की वेदना है जिसने मित्रता को पवित्र माना था और विश्वासघात पाया था। उन्होंने यह दक्षिणा मांगकर दो कार्य एक साथ किए। अपने शिष्यों की परीक्षा ली और अपनी आत्मा को उस घाव से मुक्त करने का द्वार खोला। द्रुपद को आधा राज्य लौटाना यही सिद्ध करता है कि द्रोण का लक्ष्य विनाश नहीं, संतुलन था। वे न्यायप्रिय थे, यद्यपि पीड़ित भी थे।
अर्जुन की महानता यहां केवल धनुर्विद्या में नहीं है। उनकी महानता यह है कि उन्होंने गुरु के आदेश को समझा, केवल शब्दों में नहीं, भाव में भी। कौरवों ने भी युद्ध किया, परंतु पराजित हुए। क्यों? क्योंकि उनके लिए यह एक कार्य था, एक दायित्व था। अर्जुन के लिए यह श्रद्धा की अभिव्यक्ति थी। गीता के तेरहवें अध्याय में कहा गया है, 'अमानित्वम् अदम्भित्वम् अहिंसा क्षान्तिरार्जवम्। आचार्योपासनम् शौचं स्थैर्यम आत्मविनिग्रह:।' गुरु की उपासना स्वयं एक दिव्य गुण है। अर्जुन इसी गुण की जीवन्त प्रतिमा हैं।
आज के युग में मेंटर और मेंटी की बात होती है, परंतु यह सम्बन्ध अधिकांशतः व्यावसायिक हो चुका है। जो मिला उसे ले लो, आगे बढ़ जाओ। द्रोण-अर्जुन का प्रसंग यह प्रश्न उठाता है कि क्या हम जानते हैं कि हमारे गुरु के भीतर कौन सा घाव है? क्या हमने कभी यह सोचा कि उन्हें क्या चाहिए? सच्चा शिष्य वह नहीं जो केवल ज्ञान ग्रहण करे, अपितु वह है जो गुरु की आवश्यकता को अपनी शक्ति से पूर्ण कर सके। यही गुरुदक्षिणा का सनातन अर्थ है।
अंत में यह विचार शेष रहता है कि द्रोण ने जब द्रुपद को मुक्त किया और उसे आधा राज्य लौटाया, तो उस क्षण उनके भीतर का वह दशकों पुराना दंश भी मुक्त हो गया। शिष्य ने गुरु की मुक्ति का मार्ग प्रशस्त किया। यह केवल युद्ध-कथा नहीं, आत्मा की कथा है। और यह प्रश्न हम सबके लिए खुला है कि क्या हमने अपने गुरु के लिए वह किया जो हम कर सकते थे?
आज की कथा और आज का सुविचार पढ़ने के लिए क्लिक करें।
Catch all the Business News, Market News, Breaking News Events and Latest News Updates on Live Mint. Download The Mint News App to get Daily Market Updates.
MoreOops! Looks like you have exceeded the limit to bookmark the image. Remove some to bookmark this image.