आज की कथा : द्रुपद का प्रतिशोध और द्रोण- घमंड और प्रतिशोध की आग

Story of the day : घमंड और प्रतिशोध की जोड़ी किसी एक युग की नहीं, यह मानव स्वभाव की स्थायी दुर्बलता है। जब तक सत्ता अहंकार को जन्म देती रहेगी और अपमान प्रतिशोध को, तब तक यह कथा दोहराती रहेगी।

Naveen Kumar Pandey
अपडेटेड2 Apr 2026, 07:49 AM IST
महाभारत से आज की कथा : द्रुपद और द्रोण (एआई निर्मित सांकेतिक तस्वीर)
महाभारत से आज की कथा : द्रुपद और द्रोण (एआई निर्मित सांकेतिक तस्वीर)(Nano Banana)

महाभारत की कथा : द्रुपद का प्रतिशोध और द्रोण

बहुत पुरानी बात है। गुरु भरद्वाज के आश्रम में दो बालक साथ पढ़ते थे। एक था द्रोण, ब्राह्मण पुत्र, निर्धन किंतु प्रतिभाशाली; दूसरा था द्रुपद, पांचाल-नरेश का राजकुमार, वैभवशाली और अभिमानी। बचपन की मित्रता में दोनों ने प्रतिज्ञा की थी, 'जो मेरा है, वह तुम्हारा भी है।' द्रुपद ने कहा था, 'जब मैं राजा बनूंगा, तो आधा राज्य तुम्हारा होगा, मित्र।'

समय बीता। द्रुपद राजसिंहासन पर बैठा। शक्ति, सेना और सम्पदा से परिपूर्ण। द्रोण दरिद्रता में जीता रहा। पत्नी कृपी थी और पुत्र अश्वत्थामा। पर घर में दूध तक न था। एक दिन अश्वत्थामा ने देखा कि अन्य बच्चे दूध पी रहे हैं। द्रोण का हृदय टूट गया। तब द्रोण को बचपन की वह मित्रता याद आई। वे द्रुपद के दरबार में पहुंचे और कहा, 'मित्र, मुझे स्मरण है तुम्हारी प्रतिज्ञा। मेरा पुत्र भूखा है।'

द्रुपद ने अट्टहास किया। उसने दंभ में कहा, 'मित्रता समान लोगों में होती है, राजा और भिखारी में नहीं। तुम कौन होते हो मुझे 'मित्र' कहने वाले?' वह अपमान केवल शब्द नहीं था, वह एक आग थी जो द्रोण के भीतर जल उठी। द्रोण हस्तिनापुर पहुंचे। कौरव-पांडव राजकुमारों के गुरु बने। जब शिक्षा पूर्ण हुई, तो गुरुदक्षिणा मांगी, 'पांचाल नरेश द्रुपद को बंदी बनाकर मेरे समक्ष प्रस्तुत करो।'

अर्जुन ने वह दक्षिणा चुकाई। द्रुपद बंधा हुआ द्रोण के सामने खड़ा था। द्रोण मुस्कुराए, 'अब हम समान हैं, मित्र। आधा राज्य मैं तुम्हें लौटाता हूं। शेष आधे का मैं स्वामी हूं। अब मित्रता हो सकती है।' पर द्रुपद का अहंकार टूटा नहीं, वह पिघला नहीं, और जम गया। उसने पुत्र-प्राप्ति के लिए महायज्ञ किया। उस यज्ञ से जन्म लिए धृष्टद्युम्न, जो द्रोण का वध करेगा, और द्रौपदी, जो महाभारत के महासंग्राम का केंद्र बनेंगी। प्रतिशोध ने प्रतिशोध को जन्म दिया।

अहंकार का स्वरूप

इस कथा की परतें बहुत गहरी हैं। पहली परत अहंकार के स्वरूप का है। द्रुपद का घमंड सत्ता-जनित था। सिंहासन पर बैठते ही उसने मित्रता की परिभाषा बदल दी। यह केवल उसकी व्यक्तिगत दुर्बलता नहीं थी, यह शक्ति की एक शाश्वत प्रवृत्ति है। जब मनुष्य को सत्ता मिलती है, तो वह पुराने संबंधों को नए तराजू पर तौलने लगता है। जो कल बराबर था, वह आज छोटा दिखने लगता है।

प्रतिशोध का चक्र

दूसरी परत प्रतिशोध के चक्र की है। द्रोण का अपमान न्यायोचित था, पर उसका प्रतिकार क्या? उन्होंने अर्जुन जैसे शिष्य का उपयोग व्यक्तिगत बदले के लिए किया। गुरुदक्षिणा, जो ज्ञान का पवित्रतम प्रतिदान है, उसे प्रतिशोध का हथियार बना दिया। इससे सिद्ध होता है कि जब अपमान की आग भीतर जलती है, तो श्रेष्ठ मनुष्य भी अपने आदर्शों से च्युत हो जाते हैं।

सामाजिक विषमता

तीसरी परत है सामाजिक विषमता की। यह कथा वर्ग-संघर्ष की भी कथा है। द्रोण कितना भी विद्वान हों, निर्धन ब्राह्मण की समाज में क्या स्थिति थी? और द्रुपद, राजा होने मात्र से उसका अहंकार वैध माना गया। समाज की यह संरचना ही मित्रता को असंभव बना देती है जब दो पक्षों के बीच शक्ति का असंतुलन हो।

प्रतिशोध की संतानें

चौथी परत है प्रतिशोध की संतानों की। सबसे गहरी बात यह है कि द्रुपद का प्रतिशोध केवल उसका नहीं रहा, उसने दो संतानों को जन्म दिया जो महाभारत की धुरी बने- धृष्टद्युम्न और द्रौपदी। ये दोनों यज्ञ की अग्नि से उत्पन्न हुए, दोनों का जन्म ही विध्वंस के निमित्त था। स्पष्ट है कि प्रतिशोध स्वयं नहीं मरता, वह अगली पीढ़ी में स्थानांतरित हो जाता है।

घमंड और प्रतिशोध का दुष्चक्र

महाभारत यहां एक गहरा प्रश्न छोड़ता है कि क्या द्रोण क्षमा कर सकते थे? क्या द्रुपद विनम्र हो सकता था? दोनों नहीं हुए। और इसीलिए दोनों का अंत त्रासद हुआ। घमंड और प्रतिशोध की यह जोड़ी किसी एक युग की नहीं, यह मानव स्वभाव की स्थायी दुर्बलता है। जब तक सत्ता अहंकार को जन्म देती रहेगी और अपमान प्रतिशोध को, तब तक यह कथा दोहराती रहेगी।

आज की कथा और आज का सुविचार पढ़ने के लिए क्लिक करें।

Get Latest real-time updates

Catch all the Business News, Market News, Breaking News Events and Latest News Updates on Live Mint. Download The Mint News App to get Daily Market Updates.

होमट्रेंड्सआज की कथा : द्रुपद का प्रतिशोध और द्रोण- घमंड और प्रतिशोध की आग
More