
वनवास के उन दारुण दिनों में जब पाण्डव काम्यकवन में निवास कर रहे थे, सूर्यदेव ने युधिष्ठिर को एक अक्षयपात्र प्रदान किया था। ऐसा पात्र जो प्रतिदिन असंख्य अतिथियों को भोजन कराने में सक्षम था। किन्तु नियम यह था कि जिस दिन द्रौपदी स्वयं भोजन कर लेतीं, उस दिन पात्र रिक्त हो जाता था। उसी संधिकाल में दुर्योधन के मित्र और कौरवों के प्रिय ऋषि दुर्वासा, जो अपने क्रोध और शाप के लिए त्रिलोक में विख्यात थे, दस सहस्र शिष्यों के साथ पाण्डवों के आश्रम में पधारे। समय ऐसा था कि द्रौपदी भोजन कर चुकी थीं और पात्र शून्य हो चुका था।
दुर्वासा ने कहा, 'हम स्नान करके लौटेंगे, तब तक भोजन प्रस्तुत करो।' द्रौपदी का हृदय कांप उठा। दस सहस्र क्षुधित ऋषियों के लिए अन्न कहां से आए? दुर्वासा का कोप तो प्रलय से कम न था। द्रौपदी ने एकाग्र चित्त से श्रीकृष्ण का स्मरण किया। न याचना में, न रुदन में, बल्कि उस अटूट विश्वास में जो भक्ति का मूल स्वर है। कृष्ण तत्क्षण प्रकट हुए और पात्र में लगे एक शाक के कण को ग्रहण किया। वह एक कण जगत्-तृप्ति बन गया। दुर्वासा और उनके शिष्य नदी में ही तृप्त अनुभव करने लगे और भोजन के लिए द्रौपदी के पास लौटे बिना ही चले गए। संकट टल गया। पात्र रिक्त था, फिर भी सब तृप्त थे।
यह सतह पर एक चमत्कार की कथा प्रतीत होती है। भूखे ऋषि, रिक्त पात्र, और कृष्ण का अलौकिक हस्तक्षेप। किन्तु महाभारत कभी केवल चमत्कार नहीं कहता। वह हर आख्यान में एक दार्शनिक प्रश्न छुपाता है। यहां प्रश्न यह है कि संकट के चरम क्षण में मनुष्य क्या करता है?
द्रौपदी का कृष्ण-स्मरण याचना नहीं था। वह उस चेतना की अभिव्यक्ति थी जो संकट में भी अपने केन्द्र से नहीं डिगती। भक्ति का मनोविज्ञान यही है। भय में मनुष्य बिखरता है, श्रद्धा में वह एकाग्र होता है। द्रौपदी रोईं नहीं, घबराईं नहीं, राज्य की याद कर विलाप नहीं किया। उन्होंने बस पुकारा और उस पुकार में समग्रता थी।
गीता में भगवान ने कहा है, 'अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।' जो अनन्य भाव से स्मरण करते हैं, उनका योगक्षेम मैं स्वयं वहन करता हूं। द्रौपदी की भक्ति ठीक इसी अनन्यता का प्रमाण थी।
दुर्वासा को केवल एक क्रोधी ऋषि मानना उनके प्रतीकात्मक महत्त्व को खो देना है। महाभारत में दुर्वासा वह शक्ति हैं जो अकारण नहीं आती, वह सदा किसी परीक्षा-बिन्दु पर प्रकट होते हैं। कुन्ती को मन्त्र देना, पाण्डवों के वनवास में आना, ये सब संयोग नहीं, व्यास की सोची हुई नाटकीयता है जो जीवन के उस सत्य को दिखाती है कि परीक्षा सदा तब आती है जब हम सबसे अधिक असुरक्षित होते हैं। परिस्थितियों, व्यक्तियों, संस्थाओं के रूप में समाज में भी ऐसे दुर्वासा होते हैं, जो उस क्षण दबाव बनाते हैं जब हमारे पास साधन न्यूनतम हों। प्रश्न यह नहीं कि दबाव आया क्यों? प्रश्न यह है कि उस दबाव में हमारी आन्तरिक अवस्था क्या होती है।
अक्षयपात्र एक सुन्दर रूपक है। वह शक्ति जो तब तक अक्षय है जब तक हम उसे अहंकार की भूख से नहीं मांगते। जिस क्षण द्रौपदी ने स्वयं भोजन कर लिया अर्थात जिस क्षण व्यक्तिगत तृप्ति सेवा-भाव के आगे आई, पात्र रिक्त हो गया। यह महाभारत की नैतिक सूक्ष्मता है, जो अपने लिए भोगता है वह सीमित है, जो परमार्थ के लिए समर्पित रहता है वह असीम शक्ति का माध्यम बनता है।
सामाजिक धरातल पर यह कथा नेतृत्व की उस नैतिकता की ओर संकेत करती है जहां नेता अन्त में खाता है। जो संस्था या व्यक्ति पहले दूसरों की चिन्ता करता है, उसका संसाधन किसी अदृश्य शक्ति से पुनः भरता रहता है, चाहे वह सामाजिक विश्वास हो, संस्थागत प्रतिष्ठा हो, या मनुष्यों का सहयोग।
कथा का सबसे गहरा दर्शन उस एक शाक-कण में है जिसे कृष्ण ने ग्रहण किया। जब परमचेतना तृप्त होती है, तो समस्त सृष्टि तृप्त हो जाती है। यह केवल आस्था की बात नहीं, यह उस सिद्धान्त का काव्यात्मक प्रकटन है कि जब स्रोत को तृप्त किया जाए, तो धारा स्वयं बहती है। जब हम किसी संकट में प्रबन्धन और नियन्त्रण के सारे उपाय थका लेते हैं, तब भी एक मार्ग शेष रहता है- समर्पण का, विश्वास का, उस अक्षय शक्ति के स्मरण का जो प्रत्येक संकट में उपस्थित है। द्रौपदी ने यही किया। और पात्र रिक्त होते हुए भी, सब तृप्त हो गए।
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