
महाभारत के आदि पर्व में द्रोणाचार्य, अर्जुन और एकलव्य की कथा है। पितामह भीष्म ने कौरवों और पाण्डवों को आचार्य द्रोण को शिष्य के रूप में सौंप दिया था। द्रोणाचार्य ने एक दिन शिष्यों से कहा कि मेरे मन में एक कार्य करने की इच्छा है। अस्त्र शिक्षा प्राप्त कर लेने के बाद तुम लोगों को मेरी वह इच्छा पूरी करनी होगी। आचार्य की यह बात सुनकर सब कौरव चुप रह गये, परंतु अर्जुन ने वह सब कार्य पूर्ण करने की प्रतिज्ञा ली। तभी द्रोणाचार्य ने अर्जुन को हृदय से लगा लिया।
आचार्य द्रोण के निर्देशन में पाण्डव और कौरव धनुर्विद्या सीख रहे थे। परंतु अर्जुन में अलग ही लगन थी। वे रात में भी धनर्विद्या का अभ्यास करने लगे। उनके धनुष की प्रत्यंचा का टंकार द्रोण ने सोते समय सुना। तब वे उठकर अर्जुन के पास गए और उन्हें हृदय से लगाकर बोले- अर्जुन! मैं ऐसा करने का प्रयत्न करूंगा, जिससे इस संसार में दूसरा कोई धनुर्धर तुम्हारे समान न हो।
द्रोणाचार्य का वह अस्त्र कौशल सुनकर धनुर्वेद की शिक्षा लेने की चाह रखने वाले राजकुमारों का तांता लग गया। निषादराज हिरण्यधनु के पुत्र एकलव्य भी आए। परंतु उसे निषाद पुत्र समझकर धर्मज्ञ आचार्य ने धनुर्विद्या का शिष्य नहीं बनाया। एकलव्य ने द्रोणाचार्य के चरण में मस्तक रखकर प्रणाम किया और वन में लौटकर उनकी मिट्टी की मूर्ति बनायी तथा उसी में द्रोणाचार्य की परम उच्च भावना रखकर धनुर्विद्या का अभ्यास प्रारम्भ किया।
एक दिन समस्त कौरव और पाण्डव आचार्य द्रोण की अनुमति से रथों पर बैठकर शिकार खेलने निकले। इस कार्य के लिए आवश्यक सामग्री सामग्री लेकर कोई मनुष्य अपनी इच्छा से अकेला ही पाण्डवों के पीछे-पीछे चला। उसने साथ में एक कुत्ता भी ले रखा था। वे सब अपना-अपना काम पूरा करने की इच्छा से वन में इधर-उधर विचर रहे थे। उनका वह मूढ़ कुत्ता वन में घूमता-घामता निषाद पुत्र एकलव्य के पास जा पहुंचा।
निषाद पुत्र को इस रूप में देखकर वह कुत्ता निरंतर भौंकने लगा। यह देख एकलव्य ने उस कुत्ते के मुख में एक ही साथ सात बाण मारे। उसका मुंह बाणों से भर गया और वह उसी अवस्था में पाण्डवों के पास आया। उसे देखकर पाण्डव बड़े विस्मय में पड़ गए। पाण्डव ढूंढते हुए एकलव्य के पास पहुंचे। एकलव्य तब धनुर्विद्या का अभ्यास कर रहे थे। उनका यह अभ्यास देख पाण्डव और भी चकित हो गए। उन्होंने एकलव्य से उनका परिचय पूछा और द्रोणाचार्य के पास चले गए। सभी ने द्रोणाचार्य से एकलव्य की बड़ी प्रशंसा की।
तभी अर्जुन ने एकांत में द्रोणाचार्य को उनके दिए गए वचन की याद दिलाई। उन्होंने द्रोणाचार्य से कहा कि आपने तो कहा था कि मुझसे बढ़कर शिष्य कोई नहीं होगा, तो एकलव्य इतना पराक्रमी कैसे हुआ? तब द्रोणाचार्य ने एकलव्य के पास जाकर कहा कि अगर तुम मेरे शिष्य हो तो मुझे गुरु दक्षिणा दो। एकलव्य ने द्रोण की मांग पर बहुत प्रसन्नता से अपने दाहिने हाथ का अंगूठा काटकर दे दिया। एकलव्य की विशाल हृदयता देखकर द्रोणाचार्य ने संकेतों में उसे बताया कि बिना अंगूठे के तर्जनी और मध्यमा उंगलियों के संयोग से कैसे धनुष चलाते हैं। एकलव्य कटे अंगूठे से भी बाण चलाने लगे, लेकिन पहले जैसी फूर्ति नहीं रही।
कथा का आरंभ ही एक दार्शनिक तथ्य से होता है। द्रोणाचार्य ने शिष्यों से कहा कि शिक्षा पूर्ण होने पर उन्हें एक कार्य करना होगा। सभी कौरव चुप रहे, परंतु अर्जुन ने प्रतिज्ञा ली। यहां मूल प्रश्न यह है कि क्या मौन तटस्थता है या दायित्व से पलायन? अर्जुन का वचन लेना केवल उत्साह नहीं था, यह एक नैतिक संकल्प था- गुरु के प्रति पूर्ण समर्पण का। इसी क्षण द्रोणाचार्य ने उन्हें हृदय से लगाया। भारतीय गुरु-शिष्य परंपरा में यह 'हृदयालिंगन' प्रतीकात्मक है- यह शरीर की नहीं, आत्मा की स्वीकृति है। द्रोण ने अर्जुन में केवल कुशल धनुर्धर नहीं, एक वचनबद्ध आत्मा देखी। यही वह आधार है जिस पर आगे की पूरी कथा टिकी है।
एकलव्य को द्रोणाचार्य ने शिक्षा देने से इनकार कर दिया। परंतु एकलव्य ने हार नहीं मानी। उसने वन में द्रोणाचार्य की मिट्टी की प्रतिमा बनाई और उसी के सामने एकांत साधना आरंभ की। यहां पहला दार्शनिक प्रश्न उठता है- क्या ज्ञान का वास्तविक स्रोत गुरु है या साधक की अपनी इच्छाशक्ति?
भारतीय दर्शन में गुरु को 'माध्यम' कहा गया है, 'स्रोत' नहीं। उपनिषदों में भी कहा गया है कि आत्मज्ञान किसी को दिया नहीं जा सकता, केवल जागृत किया जा सकता है। एकलव्य ने इसी सिद्धांत को व्यावहारिक रूप दिया। उसने एक प्रतीक को गुरु बनाया अर्थात् वह गुरु की भौतिक उपस्थिति नहीं, गुरु के विचार की उपस्थिति को आत्मसात कर रहा था। यह 'निर्गुण उपासना' के समान था, जहां साकार मूर्ति केवल एकाग्रता का माध्यम है, परम लक्ष्य नहीं।
एकलव्य की सबसे बड़ी दार्शनिक उपलब्धि यह है कि उसने सिद्ध किया कि गुरु वह नहीं जो सामने हो, बल्कि वह जो भीतर जाग्रत हो। उसने मिट्टी की मूर्ति को गुरु माना, परंतु वास्तव में उसने अपनी चेतना को ही गुरु बनाया। यह कांट के 'Autonomy of Will' के सिद्धांत से मिलता-जुलता है, जहां नैतिक और ज्ञान-संबंधी निर्णय की शक्ति व्यक्ति के भीतर ही निहित है। एकलव्य को किसी ने नहीं कहा कि वह सर्वश्रेष्ठ बनेगा। यह संकल्प उसका अपना था और यही उसकी महानता का स्रोत था।
एकलव्य की प्रतिभा का उद्घाटन किसी प्रतियोगिता या परीक्षा में नहीं, बल्कि एक सामान्य घटना में हुआ- भूंकते कुत्ते के मुंह में सात बाण। यह प्रसंग दार्शनिक रूप से इस बात का प्रतीक है कि सच्ची सिद्धि का परिचय जीवन की सहज परिस्थितियों में मिलता है, किसी मंच पर नहीं। कुत्ते को हानि पहुंचाए बिना उसका मुंह बंद कर देना, यह केवल शारीरिक कौशल नहीं, विवेक और संयम का भी प्रमाण है। पाण्डव इसे देखकर 'बड़े विस्मय में पड़ गए।' यह विस्मय महत्त्वपूर्ण है, यह स्थापित ज्ञान-तंत्र का उस प्रतिभा से साक्षात्कार है जो उसके दायरे से बाहर जन्मी थी।
जब अर्जुन ने एकलव्य की असाधारण धनुर्विद्या देखी, तो वे व्याकुल हो गए। उन्हें द्रोणाचार्य ने वचन दिया था कि वे उन्हें 'सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर' बनाएंगे। अब एक ऐसा व्यक्ति उभरा था जो बिना किसी संस्थागत प्रशिक्षण के उस वचन को चुनौती दे रहा था।
यहां कथा एक गहरे दार्शनिक प्रश्न को छूती है- किसी व्यक्ति की प्रतिभा को 'व्यवस्था की अनुमति' की आवश्यकता है? प्रतिभा स्वयंभू होती है, परंतु समाज उसे तभी स्वीकार करता है जब वह स्थापित मार्गों से गुजरे। एकलव्य ने वह मार्ग नहीं चुना वह 'स्व-निर्मित' था। यह द्वंद्व आज भी प्रासंगिक है। जब भी कोई साधारण प्रतिभा बिना किसी संस्थागत स्वीकृति के उभरती है, व्यवस्था उसे किसी न किसी रूप में 'सीमित' करने का प्रयास करती है।
अर्जुन ने एकांत में द्रोणाचार्य को उनका वचन याद दिलाया। यह क्षण कथा का दार्शनिक केंद्र-बिंदु है। यहां दो सत्य आमने-सामने हैं। पहला सत्य- द्रोणाचार्य का अर्जुन को दिया वचन, जो एक व्यक्तिगत प्रतिबद्धता थी। दूसरा सत्य- एकलव्य की अर्जित सिद्धि, जो बिना किसी प्रत्यक्ष शिक्षा के केवल श्रद्धा और परिश्रम से प्राप्त हुई। द्रोणाचार्य के सामने एक नैतिक दुविधा थी- क्या गुरु का वचन निभाना उस शिष्य के प्रति न्याय है जो गुरु-स्वीकृत भी नहीं था? यह गुरु-धर्म और न्याय-धर्म का टकराव है। द्रोणाचार्य ने गुरु-धर्म को प्राथमिकता दी।
द्रोणाचार्य ने एकलव्य से अंगूठा मांगा। एकलव्य ने 'बहुत प्रसन्नता से' दे दिया। मूल पाठ में यह 'प्रसन्नता' अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। इसे पीड़ा का अभाव नहीं, समर्पण की परिपूर्णता समझना चाहिए। एकलव्य के लिए यह लेन-देन नहीं था- यह उस गुरु-भाव की पराकाष्ठा थी जो उसने स्वयं ही अपने भीतर पाला था। यहां एक और दार्शनिक पहलू है जिसे अक्सर अनदेखा किया जाता है।
द्रोणाचार्य ने अंगूठा लेने के बाद एकलव्य को बिना अंगूठे के धनुष चलाने की शिक्षा 'संकेतों में' दी। यह 'संकेत-शिक्षा' गहरे अर्थ की वाहक है। जो ज्ञान कभी प्रत्यक्ष नहीं दिया गया, वह परोक्ष रूप से मिला और एकलव्य ने उसे भी ग्रहण किया। यह दर्शाता है कि ज्ञान का संचरण केवल शब्दों से नहीं, संकेत, श्रद्धा और पात्रता से भी होता है।
एकलव्य की कथा हमें यह नहीं पूछने को कहती कि उसके साथ न्याय हुआ या अन्याय? वह हमें यह पूछने को विवश करती है- क्या हम उस चेतना को जीवित रख सकते हैं जो बिना अनुमति के भी जागती है, बिना प्रशंसा के भी बढ़ती है, और बिना पुरस्कार के भी समर्पित रहती है? एकलव्य का अंगूठा कट गया। परंतु उसकी साधना, उसका संकल्प, और उसका समर्पण- वे अमर हैं। यही महाभारत का संदेश है- बाह्य सीमाएं प्रतिभा को रोक सकती हैं, परंतु आत्मा की साधना को कभी नहीं।
इस कथा में तीन चरित्र तीन भिन्न दार्शनिक सत्यों के प्रतीक हैं।
अर्जुन उस साधक का प्रतीक है जो व्यवस्था के भीतर रहकर श्रेष्ठता प्राप्त करता है- लगन, वचन और गुरु-निकटता के बल पर।
एकलव्य उस साधक का प्रतीक है जो व्यवस्था की सीमाओं के बाहर खड़े होकर श्रेष्ठता प्राप्त करता है- केवल श्रद्धा और संकल्प के बल पर।
द्रोणाचार्य उस गुरु का प्रतीक है जो एक साथ दो दायित्वों के बीच खड़ा है- दिए गए वचन का और सामने खड़ी प्रतिभा का। उनका समाधान पूर्ण न्याय नहीं था, परंतु पूर्णतः अनैतिक भी नहीं क्योंकि उन्होंने लिया भी और दिया भी।
महाभारत का यह प्रसंग हमें यह शिक्षा देता है कि ज्ञान, वचन और धर्म, ये तीनों एक साथ निभाना सबसे कठिन कार्य है। और जहां यह त्रिभुज टूटता है, वहीं से महाभारत जैसी त्रासदी जन्म लेती है।
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