Story of the day आज की कथा : महाभारत में संजय को मिली दिव्य दृष्टि- हम धृतराष्ट्र हैं और संजय भी

संजय की दिव्य दृष्टि की कथा केवल एक चमत्कार की कहानी नहीं है अपितु यह एक दर्पण है जो हमें दिखाता है कि हम स्वयं कितने देख पाते हैं। सत्य सदा उपस्थित है। प्रश्न यह है कि हमारी आंतरिक दृष्टि कितनी निर्मल है। जो मोह, भय, स्वार्थ से मुक्त होकर देखता है, वही संजय है। उसे ही दिव्य दृष्टि प्राप्त होती है।

Naveen Kumar Pandey
अपडेटेड16 Mar 2026, 08:28 PM IST
संजय और धृतराष्ट्र (AI Generated Image)
संजय और धृतराष्ट्र (AI Generated Image)(Nano Banana)

महाभारत की कथा: संजय की दिव्य दृष्टि

हस्तिनापुर का राजमहल। कुरुक्षेत्र का युद्ध आरंभ होने वाला है। जन्म से नेत्रहीन राजा धृतराष्ट्र वृद्ध हैं। अपने सिंहासन पर बैठे हैं, व्याकुल और चिंतित। उनका हृदय जानता है कि उनके पुत्रों ने जो अधर्म का बीज बोया है, उसकी फसल विनाशकारी होगी। परंतु देखने में असमर्थ वे पूछते हैं, 'संजय, कुरुक्षेत्र में क्या हो रहा है? मुझे बताओ।'

तब इस महाकाव्य के रचयिता हैं और दिव्य शक्तियों के स्वामी महर्षि वेदव्यास धृतराष्ट्र के पास आते हैं। वे कहते हैं, 'राजन्, मैं तुम्हें दिव्य दृष्टि दे सकता हूं जिससे तुम युद्ध का दृश्य स्वयं देख सको।' किन्तु धृतराष्ट्र मना कर देते हैं। वे अपने पुत्रों का वध अपनी आंखों से नहीं देख सकते। तब व्यास जी यह दिव्य दृष्टि धृतराष्ट्र के विश्वस्त सारथी और मंत्री संजय को प्रदान करते हैं।

यह दिव्य दृष्टि साधारण नेत्रों की शक्ति नहीं थी। इसके माध्यम से संजय कुरुक्षेत्र की हर घटना, हर शब्द, हर प्रहार, हर मृत्यु, हर भाव को हस्तिनापुर में बैठकर प्रत्यक्ष देख और सुन सकते थे। दूरी उनके लिए अर्थहीन हो गई। समय की सीमा टूट गई। और इसी दिव्य दृष्टि के माध्यम से संजय ने धृतराष्ट्र को वह सब सुनाया जो श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कहा। वही बनी श्रीमद्भगवद्गीता। गीता का आरंभ ही इस वाक्य से होता है- धृतराष्ट्र उवाच- धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे... और फिर संजय कहते हैं, 'हे राजन्, मैंने श्रीकृष्ण और अर्जुन का यह अद्भुत संवाद सुना। यह स्मरण करके मैं बार-बार हर्षित होता हूं।'

दिव्य दृष्टि का रहस्य

इस प्रसंग से एक गहरा दार्शनिक प्रश्न उठता है कि संजय को दिव्य दृष्टि मिली, धृतराष्ट्र ने उसे अस्वीकार किया। इसका क्या अर्थ है? धृतराष्ट्र का मना करना केवल भावनात्मक दुर्बलता नहीं थी, बल्कि यह एक गहरी सत्य-विमुखता थी। जो व्यक्ति सत्य देखना ही नहीं चाहता, उसे दृष्टि मिले तो भी क्या लाभ? दिव्य दृष्टि का वास्तविक अर्थ है- सत्य को उसकी सम्पूर्णता में स्वीकार करने का साहस।

दिव्यदृष्टि यानी ज्ञान-चक्षु

भारतीय दर्शन में इस आंतरिक दृष्टि को प्रज्ञा, विवेक और ज्ञान-चक्षु कहा गया है। मुण्डकोपनिषद में कहा गया है- न चक्षुषा गृह्यते नापि... यानी परम सत्य को बाहरी नेत्रों से नहीं, शुद्ध अंतःकरण से देखा जाता है। संजय की विशेषता यह थी कि वे निष्पक्ष और धर्मनिष्ठ थे। उनमें न कौरवों के प्रति पक्षपात था, न पाण्डवों के प्रति। यही निर्मलता उन्हें उस दिव्य संवाद का माध्यम बनाती है जो आज भी मानवता का मार्गदर्शन करता है।

धृतराष्ट्र के पास आंखें नहीं थीं, पर यदि होतीं तो भी वे सत्य नहीं देख पाते क्योंकि मोह, अहंकार और स्वार्थ की परतें सत्य को ढक देती हैं। इसके विपरीत, संजय की बाहरी दृष्टि साधारण थी, किन्तु उनकी आत्मिक निर्मलता ने उन्हें दिव्यता का पात्र बनाया। यही संदेश है, जो व्यक्ति अपने भीतर के मोह, द्वेष और पूर्वाग्रह को साफ कर लेता है, उसे किसी दिव्य दृष्टि की प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती। सत्य स्वयं उसके सामने प्रकट हो जाता है।

भरे पड़े हैं संजय और धृतराष्ट्र

आज के समाज में धृतराष्ट्र और संजय दोनों हमारे चारों ओर हैं। जो नेता जनता का दुःख देखते हुए भी सत्ता के मोह में अंधे रहते हैं, वे धृतराष्ट्र हैं। जो पत्रकार, विचारक, या साधारण नागरिक बिना भय और पक्षपात के सत्य को सामने रखता है, वह संजय है।

आज सूचना का युग है। समाचार, विचार और तथ्यों की बाढ़ है। परंतु अधिकांश लोग वही देखते हैं जो वे देखना चाहते हैं- अपने पूर्वाग्रहों की पुष्टि करने वाला सत्य। यह आधुनिक धृतराष्ट्र की अंधता है। दिव्य दृष्टि का अर्थ है- निष्पक्षता से देखने का साहस। जो व्यक्ति अपनी मान्यताओं को चुनौती देने वाला सत्य भी स्वीकार कर सके, वही वास्तव में दृष्टिसंपन्न है। परिवार में भी यही होता है कि माता-पिता अपनी संतान की गलतियां मोह के कारण नहीं देख पाते। मित्र, मित्र की कमजोरियां नहीं देखते। यह सब धृतराष्ट्र की वृत्ति है।

कभी हम संजय होते हैं तो कभी धृतराष्ट्र

लेकिन नेता हों या पत्रकार या कोई और, जब कोई अपने पक्ष के सत्य को स्वीकार करते हुए, अपने विरोध के सत्य हो ठुकरा दे तो वह समय-समय पर संजय और धृतराष्ट्र की भूमिका की अदला-बदली करने लगता है। आधुनिक समाजशास्त्र ने इसे Confirmation Bias कहा है।

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