
कुरुक्षेत्र का युद्ध अभी दूर था, किंतु उसकी आहट स्वर्ग तक पहुंच चुकी थी। देवराज इंद्र जानते थे कि उनके पुत्र अर्जुन का सबसे बड़ा शत्रु एक ही है- अंगराज कर्ण। जिसके शरीर पर जन्म से ही दिव्य कवच और कुंडल हैं। जब तक वे सुरक्षित हैं, कर्ण को युद्ध में मारना असंभव है। इंद्र ने निश्चय किया कि ब्राह्मण वेश में कर्ण से उसका सुरक्षा-कवच ही मांग लिया जाए। परंतु सूर्यदेव ने यह छल भांप लिया। वह स्वप्न में कर्ण के पास आए और सावधान किया, 'पुत्र, इंद्र भिक्षु के वेश में आएगा। कवच-कुंडल मत देना। यही तुम्हारा प्राण-रक्षक है।'
कर्ण ने पिता को प्रणाम किया और विनम्रता से कहा, 'तात, कर्ण के द्वार से कोई याचक रिक्त हाथ नहीं लौटता। यदि इंद्र स्वयं मांगने आएं, तो भी नहीं।' सूर्य मौन हो गए। वह जानते थे कि यह दान-व्रत उनके पुत्र का प्राण है, और प्राण देकर भी वह इसे नहीं तोड़ेगा। इंद्र ब्राह्मण वेश में आए। कर्ण ने उन्हें पहचाना। उनकी दिव्य आभा छुप न सकी। फिर भी कर्ण ने पूछा, 'आपको क्या चाहिए, देव?' इंद्र ने कवच-कुंडल मांगे। कर्ण ने अपने शरीर से वह दिव्य आवरण काटकर, रक्त से सने हाथों से, देवराज को सौंप दिया। इंद्र लज्जित हुए और बदले में अपनी अमोघ एकघ्नी शक्ति प्रदान की, जो एक बार प्रयोग होकर लक्ष्य को अवश्य भेदती थी।
भगवद्गीता में दान की तीन कोटियां बताई गई हैं। इनमें सात्विक दान के बारे में कहा गया है- दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे। देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम्॥ अर्थात, जो दान बिना प्रतिफल की आशा के, उचित देश-काल-पात्र में दिया जाए, वह सात्विक है। कर्ण का दान इस परिभाषा से भी ऊपर है। उसने न केवल बिना प्रतिफल की आशा के दिया, बल्कि तब दिया जब वह जानता था कि यही दान उसके प्राण का अंत करेगा। यहां दान केवल धर्म नहीं, आत्मोत्सर्ग है।
इस कथा का सबसे असुविधाजनक प्रश्न यह है कि देवराज को छल क्यों करना पड़ा? क्योंकि वे सीधे नहीं मांग सकते थे। कर्ण से सीधे मांगते तो वह देता भी, किंतु तब देवत्व पर प्रश्न उठता। इसलिए वेश बदला गया। यह प्रतीक अत्यंत गहरा है।
समाज में जब कोई व्यक्ति इतना नैतिक रूप से बलशाली हो जाता है कि उसे सीधे पराजित करना संभव न हो, तो व्यवस्था छल का सहारा लेती है। कवच-कुंडल छीनना केवल एक दिव्य आवरण छीनना नहीं था, यह कर्ण की अजेयता का, उसके आत्मविश्वास का, उसकी पहचान का हरण था। आज भी जब कोई ईमानदार व्यक्ति किसी संस्था में असुविधाजनक हो जाता है, तो उसे सीधे नहीं हटाया जाता, अपितु पद, संसाधन, विश्वसनीयता रूपी उसके 'कवच' छीने जाते हैं।
सूर्यदेव ने चेतावनी दी। यह प्रेम था। किंतु कर्ण ने नहीं माना। यह स्वभाव था। यहां एक गहरी सामाजिक सच्चाई है कि माता-पिता, शुभचिंतक चेतावनी देते हैं, परंतु चरित्र अपना मार्ग स्वयं चुनता है। कर्ण के लिए दान-व्रत तोड़ना मृत्यु से बड़ा पतन था। इसी को हम आज 'मूल्य-निष्ठा' कहते हैं, वह नैतिक आधार जिसे छोड़ने पर व्यक्ति जीवित तो रहता है, किंतु 'स्वयं' नहीं रहता।
इंद्र ने कवच-कुंडल तो प्राप्त किए, परंतु उन्हें एकघ्नी शक्ति देनी पड़ी। यह छल की विडंबना है। छल से जो मिलता है, उसका मूल्य चुकाना पड़ता है। इंद्र जानते थे कि वे नैतिक रूप से पराजित हुए हैं। इसीलिए शक्ति दी। यह प्रतिदान नहीं, प्रायश्चित्त था।
आज के समय में कर्ण का यह प्रसंग उन लोगों की कथा है जो व्यवस्था में 'बहुत ईमानदार' हो जाते हैं। उनके विरुद्ध कोई खुला आरोप नहीं लगता, उनके संसाधन, उनके मंच, उनके संबंध धीरे-धीरे छीन लिए जाते हैं। दानवीर को हराने के लिए उसका दान ही उसका अस्त्र बनाया जाता है। यही इस कथा की कालजयी पीड़ा है और यही उसकी महानता भी।
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