
जन्मेजय महाभारत के एक महत्वपूर्ण पात्र हैं। वे अभिमन्यु के पुत्र परीक्षित के पुत्र थे और कुरु वंश के महान राजा थे। जन्मेजय के पिता राजा परीक्षित, अर्जुन के पौत्र और अभिमन्यु के पुत्र थे। परीक्षित की मृत्यु तक्षक नाग के दंश से हुई थी, जो एक श्राप का परिणाम था। जब जन्मेजय को पता चला कि उनके पिता परीक्षित की मृत्यु तक्षक नाग के काटने से हुई, तो उन्होंने सम्पूर्ण नाग जाति को नष्ट करने का संकल्प लिया।
जन्मेजय ने एक विशाल यज्ञ आयोजित किया जिसे 'सर्पसत्र' कहते हैं। इस यज्ञ की अग्नि में मंत्रों के प्रभाव से सभी सर्प स्वतः खिंचे चले आते थे और भस्म हो जाते थे। हजारों नाग इस यज्ञ में जल गए। नागमाता वासुकी की बहन जरत्कारु के पुत्र आस्तीक मुनि ने इस यज्ञ को रोका। आस्तीक एक ब्राह्मण थे जिन्होंने अपनी विद्वत्ता और वाक्पटुता से जन्मेजय को प्रसन्न किया। जन्मेजय ने उन्हें वरदान देने का वचन दिया, और आस्तीक ने यज्ञ रोकने की मांग की। इस प्रकार नाग जाति का नाश रुका।
जन्मेजय की कथा का एक और महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि महाभारत की संपूर्ण कथा उन्हीं को सुनाई गई थी। ऋषि वैशम्पायन ने जन्मेजय को महाभारत की कथा सुनाई, जो मूलतः वेद व्यास द्वारा रचित थी। इसी कारण महाभारत का यह पाठ 'जनमेजय संवाद' के रूप में भी जाना जाता है।
जन्मेजय की कथा केवल एक राजा के प्रतिशोध की गाथा नहीं है- यह मनुष्य के भीतर छिपे क्रोध, सत्ता, न्याय और करुणा के शाश्वत संघर्ष का रूपक है। जब जन्मेजय को पिता की मृत्यु का समाचार मिला, तो उनकी पीड़ा स्वाभाविक थी। किन्तु एक साधारण मनुष्य की पीड़ा जब राजसत्ता से जुड़ती है, तो वह व्यक्तिगत नहीं रहती, वह सामूहिक विनाश का उपकरण बन जाती है। सर्पसत्र यज्ञ इसी का प्रतीक है।
तक्षक एक नाग था, परन्तु दंड सम्पूर्ण नाग जाति को मिल रहा था। यहां महाभारत एक गहरा सामाजिक सत्य उद्घाटित करता है- सत्ताधारी का निजी क्षोभ प्रायः सामूहिक दमन का रूप ले लेता है। इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण हैं जब एक शासक की व्यक्तिगत पीड़ा ने पूरे समुदाय, वर्ग या जाति को भोगना पड़ा।
जन्मेजय अपने कृत्य को न्याय समझ रहे थे, किन्तु वह वस्तुतः प्रतिशोध था। न्याय और प्रतिशोध में एक मूलभूत अंतर है- न्याय विवेक से जन्मता है, प्रतिशोध वेदना से। जन्मेजय का यज्ञ किसी अपराधी को दंड देने का प्रयास नहीं था, वह एक सम्पूर्ण प्रजाति के निर्मूलन का उद्यम था। दार्शनिक दृष्टि से यह सामूहिक दंड की नैतिक अग्राह्यता का प्रश्न उठाता है कि क्या किसी एक के अपराध के लिए उसके समूह को दोषी ठहराया जा सकता है?
आस्तीक मुनि का हस्तक्षेप केवल एक धार्मिक घटना नहीं है। वे उस नागरिक विवेक का प्रतिनिधित्व करते हैं जो सत्ता के सामने खड़े होकर कहता है, 'यह अन्याय है।' आस्तीक न तो नाग थे, न कुरु वंशज, वे दोनों के बीच की कड़ी थे। यह संकेत करता है कि सामाजिक न्याय की आवाज अक्सर उन्हीं लोगों से उठती है जो दो संस्कृतियों, दो वर्गों के संधिस्थल पर खड़े होते हैं।
आज के संदर्भ में यह कथा उतनी ही प्रासंगिक है। जब भी कोई समाज किसी एक घटना के आधार पर किसी पूरे वर्ग, धर्म या जाति को दोषी ठहराता है, तो वह जन्मेजय का यज्ञ ही दोहराता है। और जब कोई विवेकशील व्यक्ति उस भीड़ के सामने खड़ा होकर प्रश्न उठाता है, तो वह ऋषि आस्तीक बन जाता है। जन्मेजय की कथा का अंतिम संदेश यही है- शक्ति का संयम ही सच्ची महानता है, और करुणा ही वह यज्ञ है जो समाज को जोड़ता है, तोड़ता नहीं।
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