
युद्ध से एक रात पहले, जब कुरुक्षेत्र की धरती पर शस्त्रों की धार तेज हो रही थी, एक मां अपने पुत्र के शिविर की ओर चली जा रही थी। यह मां थीं कुन्ती, और पुत्र था वह जिसे उन्होंने जन्म देकर त्याग दिया था- कर्ण। सूर्यपुत्र, अंगराज, राधेय। कुन्ती ने कर्ण के सामने अपना परिचय दिया। उन्होंने कहा कि वे उसकी जन्मदात्री हैं, कि पांचों पांडव उसके सहोदर हैं। उन्होंने याचना की कि वह इस युद्ध में अपने भाइयों के विरुद्ध अस्त्र न उठाए। कर्ण के हृदय में उस क्षण कैसी तरंगें उठी होंगी, यह केवल वही जानते थे।
कर्ण ने मां का सम्मान किया। पर उन्होंने यह भी कहा कि वह दुर्योधन के साथ की अपनी मित्रता और कृतज्ञता से विमुख नहीं हो सकते। तब उन्होंने एक वचन दिया कि वह अर्जुन को छोड़ शेष किसी पांडव का वध नहीं करेगा। युधिष्ठिर, भीम, नकुल और सहदेव जब भी उसके सामने आएंगे, वह उन्हें जीवित छोड़ देंगे। उन्होंने कहा, 'तुम्हारे पांच पुत्र तो पांच ही रहेंगे, माते। या तो अर्जुन रहेगा या मैं।'
युद्ध के मध्य में यह वचन परीक्षित हुआ। भीम, युधिष्ठिर, नकुल, सहदेव, चारों कर्ण के सामने आए। कर्ण ने प्रत्येक को पराजित किया। प्रत्येक को लज्जित किया। पर प्रत्येक को जीवित जाने दिया। एक मां को दिया वचन उन्होंने निभाया, रणभूमि की उत्तेजना में भी, शत्रु-सन्मुख होते हुए भी। क्या दानवीरता केवल स्वर्ण और अन्न का दान है? या उससे भी बड़ा दान है शत्रु को जीवन देना, तब जब उसे नष्ट करने की शक्ति और अधिकार दोनों हों?
कर्ण का यह वचन महाभारत के सर्वाधिक मार्मिक प्रसंगों में से एक है। इसे यदि केवल कथा-स्तर पर पढ़ें तो यह एक वीर की उदारता की कथा है। पर इसके भीतर उतरें तो यह मनुष्य के उस स्वभाव की कथा बन जाती है जो जानता है कि उसे क्या मिलना चाहिए था और क्या मिला, फिर भी वह टूटता नहीं, बल्कि उदार होता जाता है।
कर्ण को सारा जीवन अस्वीकृति मिली। द्रुपद की स्वयंवर-सभा में उन्हें रोका गया। द्रोणाचार्य ने उन्हें शिष्य नहीं माना। जन्म से ही उनकी पहचान छीनी गई। फिर भी जब कुन्ती उनके पास आईं, तब नहीं जब वह शिशु था, अपितु तब जब उसे केवल हथियार की तरह उपयोग करना था, तब भी कर्ण ने प्रतिशोध का मार्ग नहीं चुना। उन्होंने कहा कि मां का अनुरोध वह पूर्णतः नहीं मान सकते, पर उन्हें रिक्तहस्त भी नहीं लौटाएंगे। यह वचन उन्होंने किसी भय से नहीं दिया, किसी प्रतिफल की आशा से नहीं दिया। उन्होंने दिया क्योंकि यही उनका स्वभाव था।
गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं, 'श्रेयान् स्वधर्मो विगुणः परधर्मात् स्वनुष्ठितात्' अर्थात अपना धर्म, चाहे कितना भी दोषपूर्ण लगे, दूसरे के सुसम्पन्न धर्म से श्रेष्ठ है। कर्ण का धर्म क्या था? वह मित्रता की निष्ठा और वचन का पालन था। उसने दुर्योधन से मित्रता का धर्म निभाया और कुन्ती को दिया वचन भी निभाया। इन दोनों के बीच का संतुलन उसने असाधारण विवेक से साधा।
सामाजिक दृष्टि से यह प्रसंग एक गहरा प्रश्न उठाता है। जो समाज किसी व्यक्ति को बारंबार अपमानित करता है, उस व्यक्ति से यह अपेक्षा रखना कि वह अपने उत्पीड़कों के प्रति उदार रहे, यह कितना उचित है? पर कर्ण ने यह उदारता दिखाई। इसका अर्थ यह नहीं कि अपमान सहन करना श्रेष्ठता की कसौटी है। इसका अर्थ यह है कि कर्ण की महानता बाह्य परिस्थितियों से नहीं, उनके आंतरिक संकल्प से आई। समाज ने उन्हें जो दिया, उन्होंने उससे ऊपर उठकर अपना मानदंड स्वयं निर्मित किया।
मनोवैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो यह वचन कर्ण की आत्म-पहचान की परिपक्वता को दर्शाता है। वह जानते थे कि पांडव उनके भाई हैं। इस सत्य ने उन्हें भीतर से विचलित किया होगा। पर उन्होंने इस विचलन को न तो छुपाया, न उसमें डूबे। उन्होंने मध्यमार्ग खोजा जो उनके दोनों दायित्वों को स्वीकार करता था। यह परिपक्व नैतिक विवेक (mature moral reasoning) का उदाहरण है।
उपनिषदों की दृष्टि से यह कहा जा सकता है कि कर्ण का यह कार्य निष्काम कर्म के निकट है। उन्होंने यह वचन किसी स्वार्थ से नहीं दिया। स्वर्ग की आशा नहीं थी, यश की लालसा नहीं थी, और सफलता तो थी ही नहीं क्योंकि अर्जुन के हाथों उनकी मृत्यु तो लिखी ही थी। फिर भी उन्होंने वचन दिया और निभाया। यही वह बिंदु है जहां कर्ण केवल एक योद्धा नहीं रहते, वह एक दार्शनिक बन जाते हैं।
और आज? आज भी ऐसे कर्ण हैं जो अस्वीकृत हैं, उपेक्षित हैं, प्रतिभावान हैं पर पहचाने नहीं गए। उनके सामने प्रश्न यही है कि क्या अपमान का उत्तर और अधिक क्रूरता से देना है, या अपने भीतर के धर्म से? कर्ण ने उत्तर दिया था। यही उनकी सबसे बड़ी विरासत है।
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