
पाण्डवों का बारह वर्ष का वनवास और एक वर्ष का अज्ञातवास पूर्ण हो चुका था। अब समय था अपना राज्य मांगने का। युधिष्ठिर का हृदय शांति का अभिलाषी था; वे जानते थे कि युद्ध केवल विजय नहीं लाता, अपितु वह कुलों को, माताओं को, धर्म को भी लील जाता है। द्रुपद के पुरोहित को पहले हस्तिनापुर भेजा गया। संदेश स्पष्ट था, 'आधा राज्य दो, रक्तपात से बचो।' दुर्योधन ने सुई की नोक के बराबर भूमि देने से भी इनकार कर दिया। तब स्वयं श्रीकृष्ण शांतिदूत बनकर हस्तिनापुर पहुंचे।
कृष्ण ने भीष्म, द्रोण, विदुर और धृतराष्ट्र की सभा में तर्क, नीति और करुणा, तीनों का प्रयोग किया। उन्होंने कहा, 'पांच गांव दो, युद्ध टल जाएगा। पांच भाइयों का जीवन, लाखों सैनिकों की मृत्यु से कहीं अधिक मूल्यवान है।' यहां तक कि युधिष्ठिर की ओर से उन्होंने कुशस्थली, वृकस्थल, माकंदी, वारणावत और एक अन्य, कुल पांच ग्राम मांगे।
दुर्योधन अडिग रहा। उसने कृष्ण को बंदी बनाने का षड्यंत्र रचा। तब श्रीकृष्ण ने विराट रूप दिखाया- न क्रोध में, न प्रतिशोध में, अपितु इसलिए कि मूढ़ को यह स्मरण दिलाया जाए कि जिसे वह बंदी बनाना चाहता है, वह सृष्टि का नियंता है। शांति का हर द्वार बंद हो चुका था। कृष्ण खाली हाथ लौटे और कुरुक्षेत्र की अनिवार्यता निश्चित हो गई।
महाभारत की यह घटना कृष्ण का शांतिदूत बनकर हस्तिनापुर जाना, केवल एक राजनयिक प्रसंग नहीं है। यह मानव सभ्यता की उस चिरंतन पीड़ा का दर्पण है जिसमें विवेक और अहंकार आमने-सामने खड़े होते हैं, और अंततः अहंकार जीत जाता है। परंतु उस जीत की कीमत सभ्यता चुकाती है।
महाभारत में युद्ध से पहले संवाद के तीन स्तर दिखते हैं- पुरोहित का दूत बनकर जाना, स्वयं कृष्ण का जाना, और अंत में कर्ण से कृष्ण का एकांत वार्तालाप। यह क्रम बताता है कि भारतीय परंपरा में संघर्ष से पहले समझौते के हर स्तर को आजमाना अनिवार्य माना गया। यह केवल रणनीति नहीं, यह धर्म की शर्त है।
जो बिना संवाद के शस्त्र उठाता है, वह अधर्मी घोषित होता है। आज के लोकतांत्रिक और अंतरराष्ट्रीय संदर्भ में यह सिद्धांत और भी प्रासंगिक हो जाता है। संसद से लेकर संयुक्त राष्ट्र तक, हर संस्था का आधार यही है कि युद्ध अंतिम विकल्प है, पहला नहीं।
दुर्योधन का चरित्र मनोवैज्ञानिक दृष्टि से अत्यंत सटीक रूप से गढ़ा गया है। वह मूर्ख नहीं था, वह अंधा था। अहंकार की वह विशेष अंधता जिसमें व्यक्ति परिणाम देख सकता है, परंतु स्वीकार नहीं कर सकता। 'मैं जानता हूँ यह अधर्म है, तथापि मैं इसे नहीं छोड़ सकता'। यह दुर्योधन का स्वीकारोक्ति वाक्य है जो महाभारत में दर्ज है।
यह मनुष्य की उस दुर्बलता को उजागर करता है जिसे आधुनिक मनोविज्ञान cognitive dissonance कहता है, अर्थात जानते हुए भी गलत दिशा में चलते रहना। सत्ता में बैठा व्यक्ति जब सुनना बंद कर देता है, भीष्म की बात, विदुर की नीति, गांधारी की ममता, यहां तक कि कृष्ण का विराट रूप, तब सब व्यर्थ हो जाते हैं। क्योंकि सुनने के लिए विनम्रता चाहिए, और विनम्रता के लिए आत्मज्ञान।
पांच ग्राम की मांग रणनीतिक रूप से युधिष्ठिर को नैतिक उच्चभूमि पर स्थापित करती है। जब युद्ध होता है, तो इतिहास जानता है कि किसने समझौते का प्रयास किया और किसने अस्वीकार किया। नैतिक वैधता किसी भी संघर्ष में उतनी ही महत्त्वपूर्ण है जितनी सैन्य शक्ति।
आधुनिक संदर्भ में देखें तो गांधी का नमक सत्याग्रह, नेल्सन मंडेला की वार्ता की पेशकश, या किसी श्रम आंदोलन में यूनियन की बातचीत की अपील, सभी उसी परंपरा के उत्तराधिकारी हैं जो महाभारत में कृष्ण की शांतियात्रा से आती है।
समाज में जब भी दो पक्ष टकराते हैं, परिवार में, संस्था में, राष्ट्रों के बीच तब महाभारत यही सिखाती है कि पहले संवाद, फिर मध्यस्थता, फिर न्यूनतम मांग पर समझौते का प्रस्ताव, और अंत में यदि सब विफल हो तभी कठोर निर्णय।
परंतु इस कथा का सबसे गहरा संदेश यह है कि कृष्ण जानते थे कि दुर्योधन नहीं मानेगा, तब भी वे गए। क्योंकि प्रयास करना धर्म है, चाहे परिणाम सुनिश्चित हो। फल की चिंता किए बिना कर्तव्य का पालन, यही गीता है, और यही कृष्ण की शांतियात्रा का अंतरतम दर्शन। युद्ध अंतिम विकल्प इसलिए नहीं कि हम कायर हैं, अपितु इसलिए कि हम सभ्य हैं।
आज की कथा और आज का सुविचार पढ़ने के लिए क्लिक करें।
Catch all the Business News, Market News, Breaking News Events and Latest News Updates on Live Mint. Download The Mint News App to get Daily Market Updates.
MoreOops! Looks like you have exceeded the limit to bookmark the image. Remove some to bookmark this image.