
अज्ञातवास का वह कठिन वर्ष था। पाण्डव विराट नगर में छद्मवेश धारण किए हुए थे। द्रौपदी 'सैरंध्री' के नाम से रानी सुदेष्णा की दासी बनकर रह रही थीं। वह द्रौपदी, जो कभी इन्द्रप्रस्थ की महारानी थी। विराट नगर में सेनापति कीचक का वर्चस्व था। वह मत्स्य नरेश का साला था। बलशाली था, और उसी अहंकार में डूबा था जो सत्ता और शक्ति मिलकर किसी पुरुष में भरते हैं। सैरंध्री की सुंदरता देखकर उसकी दृष्टि कलुषित हो गई। उसने अपनी बहन सुदेष्णा को माध्यम बनाया। सैरंध्री को अपने भवन में संदेश लेकर भेजा। वहां पहुंचते ही कीचक ने उन पर बलात आसक्ति प्रकट की।
द्रौपदी ने प्रतिकार किया, दौड़ी, किन्तु विराट की सभा में जब उन्होंने राजा से न्याय मांगा तो राजा मौन रहा क्योंकि कीचक उसकी शक्ति था। कीचक ने सभा के बीच द्रौपदी को लात मारी। युधिष्ठिर धर्म की बेड़ियों में बंधे रहे। भीम की भुजाएं फड़फड़ाईं, किन्तु अज्ञातवास के संकट ने उन्हें रोके रखा। रात को द्रौपदी भीम के पास आईं। टूटी नहीं थीं, क्रोध में जल रही थीं। उन्होंने कहा, 'वल्लभ, यदि तुम मेरी रक्षा नहीं कर सकते, तो मैं विष लेकर स्वयं कीचक के पास जाऊंगी।'
भीम ने संकल्प किया। नृत्यशाला में छद्मवेश से द्रौपदी के माध्यम से कीचक को बुलाया गया। अंधेरे में भीम ने कीचक को पकड़ा और उसे इस प्रकार मर्दित किया कि उसके अंग-प्रत्यंग की पहचान शेष न रही। कीचक की मृत्यु हो गई। यह न्याय का वह रूप था, जो राजसभाएं नहीं दे पाई थीं। कीचक वध की कथा केवल एक बलशाली दुर्जन के संहार की कथा नहीं है। यह उस सामाजिक संरचना का दर्पण है जिसमें स्त्री की पीड़ा, सत्ता की उदासीनता और पुरुष के धर्मसंकट, तीनों एक साथ उपस्थित होते हैं।
राजा विराट की सभा में जो हुआ, वह इतिहास की सबसे पुरानी त्रासदियों में से एक है, जब संस्था चुप रह जाती है। कीचक ने सभा के समक्ष एक स्त्री पर प्रहार किया। राजा ने देखा, सभासदों ने देखा। किसी ने हस्तक्षेप नहीं किया। कारण स्पष्ट था कि कीचक उस राज्य की सैन्यशक्ति था। संस्थाएं तब मौन हो जाती हैं जब अपराधी उनकी आवश्यकता बन चुका होता है। यह केवल विराट नगर की कमजोरी नहीं थी। यह हर उस समाज की कमजोरी है जो न्याय को सुविधा की तराजू पर तौलता है।
महाभारत में द्रौपदी को प्रायः पीड़िता के रूप में देखा जाता है, किन्तु यह अधूरा पाठ है। द्रौपदी का चरित्र प्रतिरोध की नैतिकता का उदाहरण है। वह टूटी नहीं, उन्होंने मांगा, लड़ी, और जब न्याय नहीं मिला तो स्वयं उसका मार्ग खोला। उसका यह कहना कि 'मैं विष लेकर जाऊंगी', यह आत्मघात की धमकी नहीं, यह एक स्त्री का वह अंतिम विद्रोह है जब व्यवस्था ने उसे पूर्णतः निराश कर दिया हो। उपनिषदों में आत्मा की अजेयता का जो भाव है, नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि, वह द्रौपदी में जीवंत दिखता है। शरीर को अपमानित किया जा सकता है, किन्तु जो चेतना अपने अधिकार को जानती है, उसे पराजित नहीं किया जा सकता।
भीम का द्वंद्व इस कथा का सबसे गहरा दार्शनिक प्रश्न है। युधिष्ठिर का धर्म कह रहा था कि अज्ञातवास का नियम तोड़ा तो सब व्यर्थ हो जाएगा। किन्तु भीम का हृदय कह रहा था कि जब कोई नियम किसी स्त्री के अपमान को चुपचाप देखने का आदेश दे, तो वह नियम नहीं, बंधन है। यहां महाभारत एक अत्यंत सूक्ष्म बात कहता है कि धर्म स्थिर नहीं है, वह संदर्भ-सापेक्ष है। भीम ने जो किया वह नियम का उल्लंघन था, किन्तु न्याय की स्थापना थी। गीता में कृष्ण जब स्वधर्म की बात करते हैं, तो वह इसी बोध की ओर संकेत करते हैं कि बाह्य विधान से ऊपर एक आंतरिक विधान होता है जो आत्मा की आवाज से निर्देशित होता है।
कीचक केवल एक व्यक्ति नहीं, अपितु एक मानसिकता है। वह मानसिकता जो यह मान लेती है कि सत्ता, धन और बाहुबल किसी भी स्त्री को वस्तु में रूपांतरित कर सकते हैं। उसका अंत इसीलिए इतना प्रतीकात्मक है। अंधेरे में, अकेले, उस पहचान के साथ जिसे मिटाकर भीम ने यह संदेश दिया कि जो शरीर किसी पर अत्याचार करता है, उसका नाम-रूप भी नहीं बचता। यह कथा आज भी उतनी ही प्रासंगिक है। जब राजसभाएं मौन रहती हैं, जब द्रौपदियां न्याय मांगकर लौट आती हैं, और जब कोई भीम यह तय करता है कि इस बार नियम नहीं, न्याय बोलेगा।
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