
पांचों पाण्डव वनवास की पीड़ा झेल रहे थे। राजसभा की अपमानजनक स्मृतियां अभी भी ताजी थीं। द्रौपदी का चीरहरण, धर्म का उपहास, शकुनि के पासों की धोखेबाज खनखनाहट। युधिष्ठिर जानते थे कि बारह वर्ष का वन और एक वर्ष का अज्ञातवास पूरा होने के बाद जो युद्ध आएगा, वह साधारण नहीं होगा। महर्षि व्यास की सलाह पर अर्जुन दिव्यास्त्रों की प्राप्ति के लिए हिमालय की ओर चले। अकेले, निःशस्त्र नहीं, अपितु संकल्प से परिपूर्ण।
हिमालय की उस दुर्गम शिला पर अर्जुन ने इन्द्र को, फिर शिव को, तपस्या से प्रसन्न करने का निश्चय किया। पत्ते खाए, फिर जल पिया, फिर वायुभक्षण किया। दोनों भुजाएं ऊपर उठाए, एक पैर पर खड़े होकर, ध्यान में स्थिर। यह वह तपस्या थी जो केवल शरीर की नहीं, आत्मा की भी परीक्षा थी। महाभारत के वन पर्व में इस दृश्य का वर्णन मानो पत्थर पर उकेरे चित्र की भांति स्थिर है।
इसी समय दुर्योधन ने मूक नामक असुर को एक वराह (सूअर) का रूप धरकर अर्जुन को मारने भेजा। उस घने वन में वह वराह अर्जुन की ओर झपटा। अर्जुन ने धनुष उठाया और बाण छोड़ा। किन्तु उसी क्षण अलग दिशा से एक और बाण भी उस वराह को लगा। वराह धराशायी हो गया। तभी एक किरात प्रकट हुआ। पर्वतीय वेश में, धनुष हाथ में, साथ में एक सुंदर स्त्री। उसने दावा किया कि वराह उसने मारा। अर्जुन ने प्रतिवाद किया। शब्दों से विवाद बढ़ा, फिर वह संग्राम में परिवर्तित हो गया।
अर्जुन ने तरकश के सारे बाण उस किरात पर छोड़ दिए, परंतु सब निष्फल। धनुष उठाकर प्रहार किया और वह टूट गया। तलवार उठाई और वह भी खण्डित हो गई। फिर मुष्टियों से युद्ध किया और अन्त में थककर भूमि पर गिर पड़े। अर्जुन जो सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर था, वह इस किरात के सामने असहाय था। यहीं वह क्षण आया जो इस कथा का हृदय है।
अर्जुन ने मिट्टी से शिव की एक प्रतिमा बनाई। पास में पड़े वन-पुष्प एकत्र किए और उस प्रतिमा पर अर्पित किए। किन्तु वह माला सीधे उस किरात के कंधों पर जा पड़ी। अर्जुन ने समझ लिया कि यह साधारण किरात नहीं है। वे उस किरात के चरणों में झुक गए। शिव प्रकट हुए। उन्होंने अर्जुन की शक्ति लौटाई और उन्हें पाशुपतास्त्र प्रदान किया। वह अस्त्र जो सृष्टि को ही भस्म कर सकता था।
भगवद्गीता के चतुर्थ अध्याय में कृष्ण ने इसी सिद्धान्त को स्पष्ट किया है-
जो जिस प्रकार मेरी शरण आते हैं, मैं उन्हें उसी प्रकार फल देता हूं।
यह कथा एक गहरे दार्शनिक सत्य की वाहक है कि परमेश्वर पात्रता की परीक्षा लेते हैं, और परीक्षा प्रायः वेश बदलकर आती है। अर्जुन को यह नहीं पता था कि किरात कौन है। यदि पता होता, तो वह तुरन्त नमन करते। परन्तु तब परीक्षा का अर्थ ही न रहता। शिव ने वेश बदला ताकि अर्जुन का वास्तविक स्वभाव, उनका साहस, उनकी जिजीविषा, उनकी पराजय को स्वीकार करने की क्षमता, और अन्ततः समर्पण प्रकट हो सके।
सामाजिक धरातल पर भी यह कथा उतनी ही प्रासंगिक है। निराशा, पराजय, अपमान- हम जीवन में जो परीक्षाएं भोगते हैं, वे अक्सर उसी परमसत्ता की योजना का हिस्सा होती हैं। जो उनसे टूटता नहीं, जो अन्त में अहंकार त्यागकर समर्पण की ओर मुड़ता है, उसे ही वह पुरस्कार मिलता है जिसकी वह योग्यता रखता है। अर्जुन की असली विजय युद्धभूमि पर नहीं, उस वन में हुई, जब उन्होंने माना कि वे अकेले पर्याप्त नहीं हैं।
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