
कुंतीभोज के राजभवन में एक किशोरी राजकुमारी थीं- पृथा। इन्हें बाद में कुंती के नाम से जाना गया। बचपन में ही उन्हें महर्षि दुर्वासा की सेवा का दायित्व सौंपा गया था। दुर्वासा अपने क्रोध के लिए प्रसिद्ध थे। उनकी प्रसन्नता और अप्रसन्नता दोनों असाधारण फल देती थीं। कुंती ने श्रद्धा और निष्ठा से उनकी सेवा की। प्रसन्न होकर दुर्वासा ने उसे एक दिव्य मंत्र दिया, जिसके उच्चारण मात्र से कोई भी देवता उनके सम्मुख प्रकट हो सकते थे और उनसे पुत्र की प्राप्ति हो सकती थी।
यहीं से कथा का वह मोड़ आता है जो संपूर्ण महाभारत को प्रभावित करता है। कुंती उस समय किशोरी थीं- जिज्ञासु, चंचल, और संसार के परिणामों से अनभिज्ञ। मन में एक विचार उठा, 'क्या यह मंत्र सच में काम करता है?' बिना किसी गहरे विचार के, केवल बाल-जिज्ञासा में, उन्होंने उगते हुए सूर्य की ओर मुख करके मंत्र का उच्चारण कर दिया।
सूर्यदेव प्रकट हुए- तेजस्वी, दिव्य, अप्रतिम। उन्होंने कहा, 'मंत्र उच्चारण हो चुका है, अब यह व्यर्थ नहीं जा सकता। मुझे अपना वचन पूरा करना होगा।' कुंती घबरा गईं। उन्होंने कहा, 'मुझे क्षमा करें, मैंने यह जानते-बूझते नहीं किया, यह तो केवल जिज्ञासा थी।' परंतु ब्रह्मांड के नियम व्यक्तिगत पश्चाताप से नहीं बदलते। सूर्यदेव ने कर्ण को जन्म दिया- कवचकुंडल धारण किए, तेज से दीप्त।
कुंती अविवाहित थीं। समाज के भय से, कुल की मर्यादा की रक्षा के लिए उन्होंने नवजात को एक मंजूषा में रखकर नदी में प्रवाहित कर दिया। वह शिशु आगे चलकर महादानी कर्ण बने- महाभारत के सबसे त्रासद नायक। जीवनभर वह अपनी पहचान के लिए तरसते रहे। उन्हें सूतपुत्र कहकर अपमानित किया गया। अर्जुन का सबसे बड़ा प्रतिद्वंद्वी बने। और अंततः कुरुक्षेत्र में उन्हीं मां के पुत्रों के हाथों मारा गए जिन्होंने उन्हें जन्म दिया था। कुंती जीवनभर यह रहस्य हृदय में दबाए रहीं। वह मां जो पांच पुत्रों की मां कहलाईं, वह जानती थीं कि उनका छठा पुत्र शत्रु पक्ष में खड़ा है। परंतु वह कुछ नहीं कर सकीं।
यह कथा कर्म के शाश्वत सिद्धांत की सबसे मार्मिक अभिव्यक्ति है। अज्ञानता कर्म को निष्फल नहीं करती। कुंती ने जानबूझकर कुछ नहीं किया, फिर भी परिणाम उतने ही गहरे हुए जितने किसी सुनियोजित कृत्य के होते। भारतीय दर्शन यही कहता है- क्रिया हुई, तो प्रतिक्रिया होगी। चाहे नींद में पत्थर उठाकर फेंकें, वह गिरेगा ही। अज्ञानता मंशा को शुद्ध कर सकती है, कर्म को नहीं।
कुंती ने जो क्षण भर में किया, उसका प्रायश्चित वह अंतिम सांस तक करती रही। यह दिखाता है कि जीवन के कुछ निर्णय, विशेषकर वे जो दूसरों के जीवन को प्रभावित करें, कितने दूरगामी होते हैं। आधुनिक समाज में भी हम ऐसे अनेक निर्णय लेते हैं जिनके परिणाम हम नहीं सोचते। एक अनुचित शब्द से रिश्ता टूट जाता है, उपेक्षापूर्ण व्यवहार से बचपन बिखर जाता है।
कर्ण का जीवन यह प्रश्न उठाता है कि क्या एक व्यक्ति को उस जन्म के लिए दंडित किया जाना चाहिए जो उसने चुना नहीं? वह सूतपुत्र था, इसलिए द्रोणाचार्य ने शिक्षा देने से इनकार किया, इसलिए द्रौपदी के स्वयंवर में अपमानित किया गया। जन्म से तय होती हुई योग्यता समाज का वह घाव है जो आज भी पूरी तरह भरा नहीं।
कुंती जानती थी कि कर्ण उनका पुत्र है। जब महाभारत का युद्ध सुनिश्चित हो गया, तब उन्होंने कर्ण से भेंट की। परंतु तब, जब बहुत देर हो चुकी थी। उन्होंने वचन लिया कि 'पांच पुत्र तो रहेंगे ही।' यह मां का प्रेम था या कूटनीति? यह प्रश्न आज भी अनुत्तरित है।
व्यास यह नहीं कहते कि कुंती बुरी थीं। वे यह कहते हैं कि जीवन में जिज्ञासा भी उत्तरदायित्व मांगती है। हर मंत्र के उच्चारण से पहले सोचिए, हर निर्णय के पहले रुकिए। क्योंकि ब्रह्मांड आपकी मंशा नहीं, आपका कर्म देखता है। और जो कर्म एक बार हो जाए, उसकी छाया जीवनभर साथ चलती है।
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