
पिछले प्रसंग में महर्षि वशिष्ठ के परामर्श पर महाराज दशरथ ने श्रीराम के राजतिलक का निर्णय लिया था। यह समाचार पूरे अयोध्या में बिजली की तरह दौड़ गया। राजमहल से लेकर सामान्य नागरिकों तक, हर ओर उल्लास था। नगर को ध्वज-पताकाओं, पुष्पों और दीपों से सजाया जाने लगा। प्रजा को विश्वास था कि राम के राज्यारोहण से अयोध्या का स्वर्णिम युग प्रारंभ होगा।
इसी समय रानी कैकेयी की दासी मंथरा ने महल की तैयारियां देखीं। उसे जैसे ही ज्ञात हुआ कि अगले दिन राम का राजतिलक होने वाला है, उसके मन में ईर्ष्या और भय उत्पन्न हुआ। उसे लगा कि राम के राजा बनने पर कौशल्या का प्रभाव बढ़ जाएगा और कैकेयी तथा भरत का महत्व घट जाएगा। उसने यह भी आशंका व्यक्त की कि भविष्य में भरत को राजसत्ता से दूर कर दिया जाएगा।
मंथरा तुरंत कैकेयी के पास पहुंची। प्रारंभ में कैकेयी अत्यंत प्रसन्न थीं। उन्होंने राम के राजतिलक को अपना ही सौभाग्य बताया, क्योंकि वे राम से भरत के समान ही स्नेह करती थीं। किंतु मंथरा ने धीरे-धीरे उनके मन में संदेह के बीज बोने शुरू किए। उसने कहा कि राजा दशरथ ने भरत की अनुपस्थिति में जानबूझकर यह निर्णय लिया है ताकि भविष्य में भरत कभी सिंहासन का अधिकारी न बन सके।
बार-बार भय, भविष्य की आशंकाओं और सत्ता के संभावित परिवर्तन का चित्र खींचते-खींचते मंथरा ने कैकेयी का मन विचलित कर दिया। अंततः उसने कैकेयी को याद दिलाया कि देवासुर संग्राम में प्रसन्न होकर दशरथ ने उन्हें दो वरदान देने का वचन दिया था। उसने सलाह दी कि समय आ गया है जब उन वरदानों का उपयोग किया जाए। यहीं से राम के वनवास और भरत के राज्याभिषेक की योजना की नींव पड़ गई।
लोककथाओं में मंथरा को अक्सर समस्त संकट की जड़ माना जाता है, लेकिन यह व्याख्या अधूरी है। यदि केवल किसी एक व्यक्ति की बात सुनकर वर्षों से निर्मित विश्वास टूट जाए, तो इसका अर्थ है कि समस्या केवल बाहरी नहीं, बल्कि मन के भीतर भी मौजूद थी। मंथरा ने कोई नई शक्ति उत्पन्न नहीं की; उसने केवल कैकेयी के मन में पहले से संभव असुरक्षा को सक्रिय किया। इसलिए यह प्रसंग मानव मन की ग्रहणशीलता का भी अध्ययन है।
मंथरा ने कैकेयी को प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं दिए, बल्कि संभावित भविष्य का भय दिखाया। आधुनिक राजनीति, कॉरपोरेट प्रतिस्पर्धा और सामाजिक जीवन में भी अनेक निर्णय वास्तविक तथ्यों से अधिक आशंकाओं पर आधारित होते हैं। मनुष्य जब भविष्य के काल्पनिक संकट को वर्तमान का सत्य मान लेता है, तब उसके निर्णय बदल जाते हैं। रामायण इस मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया को अत्यंत सूक्ष्मता से प्रस्तुत करती है।
घटना केवल यह थी कि राम का राजतिलक होने वाला था। यह एक तथ्य था। मंथरा ने उसी तथ्य की ऐसी व्याख्या प्रस्तुत की जिससे उसका अर्थ पूरी तरह बदल गया। यही अंतर सूचना (Information) और उसकी व्याख्या (Interpretation) का है। किसी भी समाज में गलत सूचना से अधिक प्रभावशाली कभी-कभी पक्षपाती व्याख्या होती है। इसलिए विवेक केवल तथ्य जानने में नहीं, बल्कि उसकी निष्पक्ष व्याख्या करने में भी आवश्यक है।
कैकेयी सामान्य परिस्थितियों में बुद्धिमान और साहसी रानी थीं। उन्होंने युद्धभूमि में दशरथ का प्राण भी बचाया था। फिर भी भावनात्मक असंतुलन के क्षण में वे ऐसी सलाह के प्रभाव में आ गईं, जिसने पूरे राजवंश का भविष्य बदल दिया। यह संकेत देता है कि नेतृत्व केवल अधिकार का नहीं, बल्कि भावनात्मक आत्मनियंत्रण का भी विषय है। जितनी बड़ी जिम्मेदारी होती है, उतना ही अधिक विवेक अपेक्षित होता है।
यह प्रसंग केवल प्राचीन राजमहल की कथा नहीं है। परिवारों में रिश्तों का टूटना, संस्थानों में गुटबाजी, कार्यस्थलों पर अविश्वास और राजनीति में ध्रुवीकरण, इन सभी में अक्सर कोई 'मंथरा' नहीं, बल्कि भय, अफवाह, अधूरी जानकारी या स्वार्थपूर्ण सलाह सक्रिय होती है। साथ ही, यह भी ध्यान रखना चाहिए कि हर असहमति या चेतावनी को 'मंथरा' कहकर खारिज कर देना भी उचित नहीं होगा; कभी-कभी सलाह वास्तविक जोखिम की ओर भी संकेत करती है। इसलिए विवेकपूर्ण नेतृत्व का अर्थ है कि प्रत्येक सूचना को अनेक स्रोतों से परखना, भावनाओं और तथ्यों में अंतर करना तथा निर्णय से पहले उसके दीर्घकालिक परिणामों पर विचार करना। रामायण का यह प्रसंग इसी मानवीय चुनौती को कालातीत रूप में सामने रखता है।
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