महाभारत के कर्ण की कथा
कुंती अभी कुंवारी राजकुमारी थीं। पिता के घर में, जहां ऋषि दुर्वासा कुछ काल के लिए ठहरे थे। कुंती ने उनकी इतनी श्रद्धा और सेवा से देखभाल की कि प्रसन्न होकर दुर्वासा ने उन्हें एक मंत्र दिया, जिससे वह किसी भी देवता का आह्वान कर उनसे पुत्र प्राप्त कर सकती थीं। कुंती युवा थीं, जिज्ञासु थीं। मंत्र की शक्ति परखने के लिए उन्होंने सूर्यदेव का आह्वान किया। सूर्य प्रकट हो गए- तेजस्वी, दीप्तिमान। उनके आशीर्वाद से कुंती के गर्भ से एक शिशु का जन्म हुआ। वह बालक अद्भुत था। जन्म से ही कवच और कुंडल धारण किए हुए, जो उसे अमर बनाते थे। उसके मुख पर सूर्य का तेज था।
किंतु कुंती अविवाहित थीं। समाज की दृष्टि में यह पुत्र उनके लिए कलंक था। भय और लोकलाज के कारण उन्होंने एक कठोर निर्णय लिया। उस नवजात शिशु को जो अभी मां की गोद का भी सुख नहीं जान पाया था, एक टोकरी में रखकर नदी में बहा दिया। वह टोकरी बहती रही। गंगा से अधिरथ नाम के सारथी ने उसे उठाया। उसकी पत्नी राधा ने उस बालक को पुत्रवत् पाला। बालक का नाम पड़ा- वसुषेण, और मां के नाम पर राधेय। परंतु इतिहास ने उसे जाना कर्ण के नाम से।
कर्ण बड़ा हुआ। सूर्यपुत्र था, किंतु समाज में सूतपुत्र कहलाया। जब वह द्रोणाचार्य के पास शिक्षा मांगने गया, तो ठुकराया गया। जब कुरुक्षेत्र की रंगभूमि में उसने अर्जुन को ललकारा, तो कृपाचार्य ने पूछा, 'तुम्हारा कुल क्या है?' उस दिन कर्ण के पास उत्तर नहीं था। दुर्योधन ने उसे अंग देश का राजा बनाया। परंतु यह दान भी उसकी पहचान की भूख नहीं मिटा सका। कर्ण पहचान की इसी अनिश्चितता से जीवनभर लड़ता रहा।
दार्शनिक-सामाजिक व्याख्या
कर्ण की कथा केवल एक पौराणिक आख्यान नहीं है, यह उस व्यक्ति की कथा है जो जन्म से पहले ही समाज द्वारा अस्वीकृत कर दिया जाता है।
कर्ण का अपराध क्या था?
कर्ण ने जन्म लेने का निर्णय स्वयं नहीं किया था, न उसने मां चुनी, न परिस्थिति। फिर भी उसे पूरे जीवन उस जन्म की सजा भोगनी पड़ी। यह आधुनिक दर्शन का वह प्रश्न है जिसे सार्त्र ने 'being thrown into existence' कहा। यानी, हम एक ऐसी दुनिया में फेंके जाते हैं जिसे हमने नहीं चुना, और फिर उस दुनिया के नियमों से जूझते हैं।
कुंती का त्याग : मातृत्व बनाम समाज
कुंती का निर्णय क्रूर था, किंतु उसे केवल नैतिक दृष्टि से नहीं देखा जाना चाहिए। वह एक ऐसी स्त्री थी जिसे समाज ने दो विकल्प दिए थे- या तो पुत्र को बचाओ, या अपनी प्रतिष्ठा को। जब समाज स्त्री को इतने संकीर्ण विकल्पों में बांध देता है, तो दोष कुंती का नहीं, उस व्यवस्था का है जो स्त्री की स्वायत्तता को नष्ट करती है।
जाति और पहचान
कर्ण का सबसे बड़ा संघर्ष उसकी योग्यता और उसकी सामाजिक पहचान के बीच की खाई था। वह अर्जुन से कम नहीं था, शायद श्रेष्ठ था। किंतु सूतपुत्र का लेबल उसे शिक्षा, सम्मान और न्याय से वंचित रखता था। यह वर्ण व्यवस्था की वह क्रूरतम सच्चाई है जो आज भी जाति-आधारित भेदभाव के रूप में जीवित है। कर्ण का जीवन इस बात का प्रमाण है कि जब समाज व्यक्ति को उसके जन्म से परिभाषित करता है, तो प्रतिभा का गला घोंटा जाता है।
कर्ण की महानता
इतने अपमान के बाद भी कर्ण ने दानवीरता नहीं छोड़ी। इंद्र ने छल से उसके कवच-कुंडल मांगे। उसने दे दिए। कुंती मां बनकर आईं और पांच पुत्रों का जीवन मांगा। उसने वचन दिया। यह स्टोयिक दर्शन का चरम है- परिस्थितियां हम नहीं चुन सकते, किंतु अपनी प्रतिक्रिया हम चुन सकते हैं। कर्ण ने अपनी पीड़ा को दानशीलता में बदला।
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