
बारह वर्ष के वनवास के पश्चात् पांडवों के सामने सबसे कठिन परीक्षा थी तेरहवां वर्ष। इस वर्ष उन्हें ऐसे अज्ञातवास में रहना था कि यदि कौरव उन्हें पहचान लें, तो वनवास का पूरा चक्र फिर से आरंभ हो जाए। दुर्योधन की सहस्र आंखें चारों दिशाओं में बिछी थीं। युधिष्ठिर ने मत्स्य देश के राजा विराट का दरबार चुना। वे स्वयं 'कंक' नाम से राजा के द्यूत-सहायक बने। भीम 'बल्लव' के रूप में राजमहल का रसोइया और मल्ल बने। वही भीम जिनकी गदा से पर्वत कांपते थे, आज चूल्हे के पास खड़े थे।
अर्जुन 'बृहन्नला' बनकर राजकुमारी उत्तरा को नृत्य और संगीत सिखाने लगे। गाण्डीव थाम चुकीं वे अंगुलियां अब वीणा के तार छेड़ रही थीं। नकुल 'ग्रंथिक' बनकर अश्वशाला का दायित्व संभाले रहे और सहदेव 'तंत्रिपाल' के नाम से गोशाला का। द्रौपदी ने सबसे कठिन भूमिका निभाई। वह 'सैरंध्री' के रूप में रानी सुदेष्णा की दासी बनीं। जो सभा में अपमानित हुई थीं, जो राजमहिषी थीं, वह आज किसी की केश-सज्जा करती थीं।
किंतु विधि ने और परीक्षा ली। कीचक ने द्रौपदी पर कुदृष्टि डाली। भीम ने रात्रि के अंधकार में उसका वध किया, पर पहचान न हो इसका पूरा यत्न किया। जब राजा विराट के गोधन पर कौरवों ने आक्रमण किया, तब अर्जुन को 'बृहन्नला' का आवरण छोड़ना पड़ा। किंतु तब तक तेरहवां वर्ष पूर्ण हो चुका था। धर्म की विजय हुई। न शस्त्र से, न बल से, बल्कि धैर्य, संयम और छद्म वेश की अटूट साधना से।
मनुष्य का सबसे बड़ा अहंकार क्या है? उसकी पहचान, उसका नाम, उसका पद, उसकी प्रतिष्ठा। हम जो हैं, उसे दूसरे जानें, यह भीतरी आकांक्षा इतनी गहरी होती है कि उसे छोड़ना मृत्यु-तुल्य लगता है। विराट नगर की कथा इसी अहंकार के विसर्जन की कथा है। युधिष्ठिर धर्मराज थे। राजाओं के राजा।
किंतु विराट के दरबार में वे केवल एक चतुर द्यूत-खिलाड़ी थे। उन्होंने यह भूमिका न अनिच्छा से, न विवशता में स्वीकार की, अपितु पूर्ण चेतना और धर्मबोध के साथ। उपनिषद् कहते हैं, 'अहं ब्रह्मास्मि।' किंतु इस महावाक्य का अर्थ यह नहीं कि मेरा नाम, मेरा रूप, मेरी सत्ता ही ब्रह्म है। ब्रह्म तो वह है जो नाम-रूप से परे है। विराट नगर में पांडवों ने यही साधना की। नाम-रूप को गिराकर भी भीतर से वही रहे जो थे।
समाज प्रायः 'छल' और 'कुशलता' में भेद नहीं कर पाता। पांडवों का छद्म वेश नैतिक पाखंड नहीं था। वह एक रणनीतिक बुद्धिमत्ता थी। चाणक्य ने कहा, 'यो ध्रुवाणि परित्यज्य अध्रुवाणि निषेवते। ध्रुवाणि तस्य नश्यन्ति अध्रुवं नष्टमेव च।' अर्थात, जो स्थायी को छोड़कर अस्थायी के पीछे भागता है, वह दोनों खोता है।
पांडवों ने धर्म, कर्तव्य, अंतिम लक्ष्य जैसे स्थायी भाव को थामे रखा और पहचान, पद, यश जैसे अस्थायी भाव को सहजता से छोड़ दिया। आधुनिक जीवन में यह दर्शन अत्यंत प्रासंगिक है। एक कुशल नेता जानता है कि कब अपनी शक्ति को छुपाना है और कब प्रकट करना है। जो हर परिस्थिति में अपना पूरा रूप दिखाने पर अड़ा रहता है, वह न तो संघर्ष में टिकता है, न कूटनीति में।
भीम की कथा इस प्रसंग में सबसे मार्मिक है। जिन भुजाओं में हिडिंब और बकासुर का वध करने की शक्ति थी, वे भुजाएं रसोई में काम आ रही थीं। कीचक ने द्रौपदी पर अत्याचार किया, तब भीम का क्रोध ज्वालामुखी था, फिर भी उन्होंने पहचान छुपाई। रात्रि में वध किया, चुपचाप लौट आए।
यह बाहरी संयम नहीं, आंतरिक अनुशासन था। गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं, 'यस्य सर्वे समारम्भाः कामसंकल्पवर्जिताः।' अर्थात जिसके सभी कार्य कामना और अहंकार से रहित हैं। भीम का वह वध भी 'मैंने किया' के अहंकार से मुक्त था। वह धर्म की रक्षा थी, पराक्रम का प्रदर्शन नहीं।
द्रौपदी का अज्ञातवास सबसे गहरी सामाजिक टिप्पणी है। जो स्त्री पांच राजाओं की पत्नी थी, जो महारानी थी, वह किसी की दासी बनकर रहे? यह कथा स्त्री-शक्ति के दमन की नहीं, बल्कि उस अदम्य आत्मबल की कथा है जो परिस्थिति को स्वीकार करते हुए भी अपनी अस्मिता को भीतर जीवित रखता है। द्रौपदी झुकी, पर टूटी नहीं।
समाज में आज भी लाखों स्त्रियां ऐसी हैं जो अपनी वास्तविक क्षमता से बहुत नीचे की भूमिकाओं में जीने को विवश हैं। द्रौपदी का चरित्र उन्हें यह संदेश देता है कि परिस्थिति तुम्हारी परिभाषा नहीं है।
विराट नगर का अज्ञातवास हमें सिखाता है कि निष्क्रियता और धैर्य में अंतर है। पांडव बैठे नहीं थे। वे प्रतीक्षा कर रहे थे, प्रस्तुत हो रहे थे। जैसे बीज मिट्टी में छुपकर वृक्ष बनने की तैयारी करता है। वह दिखता नहीं, पर काम करता रहता है। जीवन में वही जीतता है जो अपने समय का अनुशासन जानता हो। न अकाल में टूटे, न अकाल में प्रकट हो। धैर्यं सर्वापदामौषधम्, अर्थात धैर्य ही सभी विपदाओं की औषधि है।
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