
भूमंडल पर व्याप्त समस्त ज्ञान-राशि में महर्षि व्यास रचित महाभारत केवल एक महाकाव्य नहीं, अपितु मानवीय चेतना के अंतर्द्वंद्वों का शाश्वत दर्पण है। इस महाग्रंथ के उद्योगपर्व में अंकित महेंद्र पर्वत का वह दृश्य अत्यंत मर्मस्पर्शी और झकझोर देने वाला है, जहां गुरु-शिष्य की एक महान परंपरा छल के सूक्ष्म कुहासे में विलीन हो जाती है। जब भगवान परशुराम की जंघा पर सिर रखकर विश्राम करते हुए सूत-पुत्र कर्ण की देह को एक तीक्ष्ण वज्रकीट काटने लगता है, तब गुरु की निद्रा भंग न हो, इस उदात्त भाव से कर्ण उस दारुण पीड़ा को मौन रहकर सहन कर जाता है।
रक्त की उष्ण धार जब भार्गव के अंगों को स्पर्श करती है, तब उनकी चेतना जाग्रत होती है और वह क्षत्रियवत अदम्य सहनशीलता को देखकर स्तब्ध रह जाते हैं। इस मिथ्या आवरण के अनावृत होते ही परशुराम के मुख से निकला वह वज्रपात सदृश वाक्य आज भी मानवीय महत्त्वाकांक्षाओं के प्राचीर को कंपा देता है, 'तस्मात्त्वया सक्तमवैदिकं च, यल्लध्मसच्छास्त्रमविद्ययैव। तद् वै विस्मरिष्यति कालवेला, न ह्यसत्यं सुप्रतिष्ठितं भवति।' मिथ्याचरण और छद्म वेश धारण करके जो ज्ञान तुमने मुझसे अर्जित किया है, वह अंतकाल में तुम्हारे किसी काम नहीं आएगा और अंत समय में तुम इसे पूर्णतः भूल जाओगे क्योंकि असत्य की नींव पर कभी कोई सत्य सुप्रतिष्ठित नहीं हो सकता।
यह कथा वस्तुतः सत्य की बलिवेदी पर आत्म-प्रमाण की खोज में भटके एक महानायक की आत्मिक त्रासदी है। सूत-पुत्र होने के सामाजिक दंश से पीड़ित कर्ण जब संपूर्ण आर्यावर्त में धनुर्विद्या का सर्वोत्कृष्ट शिखर छूने के लिए व्याकुल होता है, तब द्रोणाचार्य द्वारा अस्वीकार किए जाने पर वह महेंद्र पर्वत की ओर प्रस्थान करता है। वहां ब्रह्मास्त्र के ज्ञाता भगवान परशुराम केवल ब्राह्मणों को ही अपनी विद्या प्रदान करते थे, अतः कर्ण स्वयं को भार्गव गोत्रीय ब्राह्मण बताकर उनका शिष्यत्व ग्रहण कर लेता है। वर्षों की कठिन तपस्या और अटूट सेवा के उपरांत वह गुरु का अत्यंत प्रिय पात्र बन जाता है तथा दिव्य अस्त्रों के संधान की गुप्त विद्याओं में पारंगत हो जाता है।
किंतु नियति का क्रूर विधान उस दिन क्रियाशील होता है जब गुरु विश्राम कर रहे होते हैं और कर्ण के भीतर का अदम्य शौर्य ही उसके छद्म का शत्रु बन जाता है। परशुराम तत्काल ताड़ जाते हैं कि इतनी भयंकर शारीरिक वेदना को अविचल भाव से सहने की क्षमता केवल किसी क्षत्रिय रक्त में ही हो सकती है। भय और लज्जा से कांपते कर्ण के मुख से सत्य का प्रकटीकरण होते ही क्रोधाग्नि में जलते भार्गव उसे शाप दे देते हैं कि जिस ज्ञान को उसने असत्य के आधार पर प्राप्त किया है, वही ज्ञान उसके जीवन के अंतिम और सबसे निर्णायक युद्ध में विस्मृत हो जाएगा।
इस प्रसंग का मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक विश्लेषण मानवीय अहंकार और पहचान के संकट की गहन परतों को उघाड़ता है। कर्ण का यह कृत्य केवल एक सामान्य झूठ नहीं था, बल्कि अपनी सामाजिक स्थिति से उपजा वह गहरे आत्म-प्रमाण का अंतर्विरोध था जो व्यक्ति को किन्हीं भी साधनों द्वारा श्रेष्ठता सिद्ध करने की अंधी दौड़ में धकेल देता है। उपनिषदों की अद्वैत दृष्टि कहती है कि सत्य ही ब्रह्म है और असत्य का आश्रय लेना अपनी ही आत्मा के वास्तविक स्वरूप से विमुख होना है। जब कर्ण छद्म वेश धारण करता है, तब वह अपनी तात्कालिक महत्त्वाकांक्षा के लिए अपने आंतरिक 'स्व' की आहुति दे देता है।
कर्ण की यह ऐतिहासिक नियति वर्तमान भारतीय समाज के एक अत्यंत संवेदनशील और विचारणीय यथार्थ के रूप में प्रतिध्वनित होती है। आज समकालीन भारत में ऐसे अनेक प्रसंग दिखाई देते हैं जहां कतिपय व्यक्ति अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति (SC/ST) के कूट-रचित और मिथ्या प्रमाणपत्रों का निर्माण करवाकर लोक-सेवाओं में नियुक्तियाँ प्राप्त कर लेते हैं। यह कृत्य अध्यात्म और नीतिशास्त्र की दृष्टि से ठीक वैसा ही छद्म है जैसा कर्ण ने ब्राह्मण का वेश धरकर किया था। जब कोई व्यक्ति समाज के वंचित और शोषित वर्ग के लिए आरक्षित अधिकारों को कपटपूर्वक छीनता है, तो वह न केवल देश के संविधान के साथ विश्वासघात करता है, बल्कि उस वास्तविक पात्र के अवसरों की हत्या भी करता है जो इस संरक्षण का न्यायसंगत अधिकारी था।
ऐसे मिथ्या आचरण से प्राप्त पद, प्रतिष्ठा और आजीविका व्यक्ति को तात्कालिक रूप से भौतिक संपन्नता तो दे सकती है, परंतु आंतरिक चेतना के स्तर पर वह सदैव एक भय और अपराधबोध से ग्रसित रहता है। न्याय की देवी जब अपना विधान करती है, तब वह अवैध रूप से अर्जित किया गया पद और समाज में स्थापित प्रतिष्ठा कानून और प्रारब्ध के चक्रव्यूह में उसी प्रकार विलीन हो जाती है जैसे कुरुक्षेत्र के मैदान में कर्ण के रथ का पहिया धरती में धँस गया था। भगवद्गीता में श्रीकृष्ण का यह कथन कि "श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्" अर्थात् दूसरों के अधिकारों और स्वरूप को छीनकर किया गया आचरण भयानक और आत्मघाती होता है, इसी परम सत्य की पुष्टि करता है।
इस संपूर्ण विमर्श का निचोड़ यही है कि सत्य की उपेक्षा करके अर्जित की गई कोई भी उपलब्धि अंततः आत्म-विनाश का कारण बनती है। कर्ण एक अत्यंत दानवीर और पराक्रमी योद्धा था, किंतु उसके चरित्र का यह एक दोष उसके संपूर्ण जीवन के पुण्यों पर भारी पड़ गया। परशुराम का शाप केवल एक क्रुद्ध ऋषि की वाणी नहीं था, बल्कि वह प्रकृति का वह सार्वभौमिक नियम था जो यह निर्धारित करता है कि अपवित्र साधनों से कभी पवित्र साध्य की प्राप्ति नहीं हो सकती।
आज के युग में जब मनुष्य अपनी पहचान के संकट से जूझ रहा है, तब उसे यह समझना होगा कि छद्म और झूठ के सहारे पाई गई सफलता एक ऐसी मरीचिका है जो प्यास बुझाने के बजाय अंततः मरुस्थल की अंतहीन दाह की ओर ले जाती है। क्या आज का आधुनिक समाज इस शाश्वत सत्य को स्वीकार करने के लिए तत्पर है, या हम सब भी अपने-अपने छद्म आवरणों में किसी न किसी निर्णायक पराजय की प्रतीक्षा कर रहे हैं?
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