
युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में समस्त भारतवर्ष के राजा उपस्थित थे। यज्ञ की पूर्णाहुति से पूर्व अग्रपूजा का प्रश्न उठा। सभा में सर्वप्रथम किसे सम्मानित किया जाए? भीष्म ने निर्विवाद रूप से श्रीकृष्ण का नाम लिया। चेदिराज शिशुपाल यह सहन न कर सका। वह कृष्ण का ममेरा भाई था, किंतु जन्म से ही शत्रु। जन्म के समय आकाशवाणी हुई थी कि इस बालक की मृत्यु उसी के हाथों होगी जो इसे गोद में उठाए। कृष्ण ने उसे गोद उठाया और माता को वचन दिया, 'मैं इसके सौ अपराध क्षमा करूंगा।'
राजसूय सभा में शिशुपाल ने कृष्ण को भरी सभा के सामने गालियां दीं, उनके चरित्र पर प्रश्न उठाए, उनकी बाल-लीलाओं को अपराध बताया, यादवकुल को नीच कहा। कृष्ण मुस्कुराते रहे, धैर्य धारण करते रहे। उन्होंने सभा के समक्ष प्रत्येक अपराध को गिनते हुए क्षमा करते रहे। एक... दस... पचास... निन्यानवे।
और जब शिशुपाल ने सौवां अपराध किया, कृष्ण का सुदर्शन चक्र चल पड़ा। एक ही पल में शिशुपाल का मस्तक धड़ से अलग हो गया। सभा स्तब्ध रह गई। किंतु आश्चर्य कि शिशुपाल की देह से एक दिव्य ज्योति निकली और कृष्ण के चरणों में समा गई। घृणा भी, जब इतनी तीव्र और एकाग्र हो, तो मुक्ति का मार्ग बन जाती है।धर्म ने प्रतीक्षा की। वचन निभाया। और जब सीमा पूर्ण हुई तो दंड अपरिहार्य हो गया।
इस कथा का केंद्रबिंदु एक वाक्य है जो भारतीय नैतिकता के हृदय में धड़कता है। वह वाक्य है- धर्म की सीमा होती है। क्षमा असीमित नहीं होती। सहिष्णुता अनंत नहीं होती। और यह सीमा कोई दुर्बलता की निशानी नहीं, बल्कि धर्म की परिपक्वता की पहचान है।
कृष्ण का सौ बार क्षमा करना निष्क्रियता नहीं थी। यह एक सुचिंतित, सचेत नैतिक अभ्यास था। प्रत्येक क्षमा के साथ वे शिशुपाल को अवसर दे रहे थे लौट आने का, बोध प्राप्त करने का। भारतीय दर्शन में क्षमा को बल का गुण माना गया है, दुर्बलता का नहीं। क्षमा वीरस्य भूषणम्। किंतु वही दर्शन यह भी जानता है कि जब क्षमा का दुरुपयोग होने लगे, जब वह अहंकार को और पोषित करे, जब वह अन्याय का संरक्षण बन जाए, तब क्षमा स्वयं अधर्म हो जाती है।
कृष्ण ने माता को वचन दिया था। यह वचन उनके लिए बंधन था। किंतु वचन की एक शर्त भी थी, सौ अपराध तक ही क्षमा। यहां महाभारत एक सूक्ष्म दार्शनिक संदेश देता है कि हर वचन की, हर प्रतिज्ञा की, हर क्षमा की एक अंतर्निहित सीमा होती है। असीमित वचन, असीमित दायित्व का भार वहन नहीं कर सकता। जो वचन किसी भी परिस्थिति में, किसी भी मूल्य पर निभाया जाए, वह वचन नहीं, दासता है।
आज के समाज में यह कथा अत्यंत प्रासंगिक है। हम अक्सर दो अतियों के बीच झूलते हैं या तो असीमित सहनशीलता, जो अन्याय को पोषण देती है; या तत्काल प्रतिक्रिया, जो विवेक को नष्ट करती है। शिशुपाल वध बताता है कि धर्म का मार्ग इन दोनों अतियों के बीच से गुजरता है। प्रतीक्षा करो, किंतु अंधी प्रतीक्षा नहीं। सहो, किंतु सीमा जानो। क्षमा करो, किंतु वह क्षमा गणनायुक्त हो, सचेत हो, उद्देश्यपूर्ण हो।
कृष्ण का सुदर्शन चक्र चलाना एक आवेगपूर्ण क्रोध नहीं था। वह एक व्यवस्थित, तर्कसंगत, धर्मसम्मत निर्णय था। और इसीलिए उस दंड के बाद शिशुपाल की आत्मा को मुक्ति मिली। दंड तब पवित्र होता है जब वह विधि से, विवेक से, और अंतिम उपाय के रूप में दिया जाए। यही न्यायशास्त्र का मूल तत्त्व है। दंड धर्म की रक्षा के लिए होता है, प्रतिशोध के लिए नहीं।
कथा का सबसे विलक्षण पक्ष है शिशुपाल की मुक्ति। जिसने जीवनभर कृष्ण से घृणा की, वह मृत्यु के क्षण कृष्ण में ही समा गया। यह भारतीय अध्यात्म की वह गहराई है जहां द्वैत समाप्त होता है। भक्ति और द्वेष, दोनों एकाग्र चित्त की अवस्थाएं हैं। और एकाग्र चित्त, चाहे किसी भी मार्ग से हो, अंततः उसी केंद्र की ओर लौटता है।
तो धर्म की सीमा एक वर्जना नहीं है। वह एक परिपक्वता है। वह यह जानना है कि कब रुकना है, कब क्षमा करनी है, और कब अनिवार्य रूप से न्याय को उसका अधिकार देना है।
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