Story of the day आज की कथा : शकुनि और पासे का खेल- छल से मिली जीत अंततः विनाश का कारण बनती है

Story of the day: हस्तिनापुर के राजदरबार में उस दिन एक ऐसा खेल खेला गया, जिसने न केवल एक राजवंश को मिटाया, बल्कि धर्म, न्याय और मानवीय गरिमा की परिभाषा को भी चुनौती दी। यह कथा है गांधार के राजकुमार शकुनि की, जिसने अपनी बहन गांधारी के अपमान का बदला लेने के लिए छल को अपना धर्म बना लिया।

Naveen Kumar Pandey
अपडेटेड12 Mar 2026, 03:23 PM IST
आज की कथा: शकुनि का छल और कौरवों का विनाश। (AI Generated Image)
आज की कथा: शकुनि का छल और कौरवों का विनाश। (AI Generated Image)(Nano Banana)

महाभारत की कथा : शकुनि और पासे का खेल

गांधार की राजकुमारी गांधारी का विवाह जब अंधे धृतराष्ट्र से तय हुआ, तो गांधार के राजपरिवार ने इसे अपना अपमान माना। शकुनि के मन में इस अपमान की आग धधकती रही। उसने प्रतिज्ञा की कि वह कुरुवंश को भीतर से नष्ट करेगा। शकुनि ने दुर्योधन की महत्वाकांक्षा को अपना हथियार बनाया। वह जानता था कि दुर्योधन के भीतर पांडवों के प्रति ईर्ष्या की एक अनंत नदी बहती है। उसने उसी नदी में अपने षड्यंत्र की नाव उतारी। युधिष्ठिर को द्यूत-क्रीड़ा यानी जुए का निमंत्रण भिजवाया गया। राजधर्म और आतिथ्य की मर्यादा में बंधे युधिष्ठिर इनकार न कर सके।

जुए के उस खेल में शकुनि के पासे साधारण नहीं थे। कहा जाता है कि उन्हें उसने अपने पिता की अस्थियों से बनाया था, जिनमें उसकी प्रतिशोध की आत्मा समाई थी। हर बार पासा फेंका गया, हर बार युधिष्ठिर हारते गए। राज्य गया, धन गया, भाई गए, और अंत में द्रौपदी, एक राजमहिषी, को दांव पर लगाया गया।

भरी सभा में द्रौपदी का चीरहरण का प्रयास हुआ। धृतराष्ट्र मौन रहे, भीष्म पितामह धर्म की दुहाई देते हुए निष्क्रिय रहे। शकुनि ने अपना पासा जीत लिया था। कम-से-कम उसे ऐसा लगा।

किंतु उसी सभा में द्रौपदी के आंसुओं ने जो ज्वाला प्रज्वलित की, वह एक दिन कुरुक्षेत्र बनी। अठारह दिनों के युद्ध में कौरव वंश का नामोनिशान मिट गया। शकुनि स्वयं सहदेव के हाथों मारा गया। उसकी छल से सजाई बाजी, अंततः उसी के विनाश का कारण बनी।

छलपूर्ण पासे का खेल का संदेश

महाभारत की यह कथा मात्र एक ऐतिहासिक आख्यान नहीं है, अपितु यह मानव मनोविज्ञान और नैतिकता का गहन दर्पण है। इसमें कई तत्व हैं जिनका विवरण यूं समझ सकते हैं।

प्रतिशोध की आग

शकुनि का सारा जीवन एक प्रतिशोध की भेंट चढ़ गया। उसने अपनी बौद्धिक प्रतिभा, कूटनीतिक कुशलता और जीवन के सर्वोत्तम वर्ष एक पुरानी पीड़ा को जीवित रखने में लगा दिए। दर्शनशास्त्र कहता है कि जो व्यक्ति बीते हुए घाव को ही अपनी पहचान बना लेता है, वह वर्तमान में जीना भूल जाता है। शकुनि ने जीता नहीं, वह केवल बदला लेता रहा।

छल और अधर्म का चक्र

कर्म के सिद्धांत के अनुसार, जो ऊर्जा हम संसार में भेजते हैं, वही लौटकर आती है। शकुनि ने छल बोया, समाज में अविश्वास और अन्याय की फसल उगाई और उसी फसल की आग में स्वयं जल गया। यह संयोग नहीं, सृष्टि का नियम है।

संस्थाओं की विफलता

इस कथा का सबसे गहरा सामाजिक संदेश यह है कि शकुनि अकेला दोषी नहीं था। धृतराष्ट्र की पुत्रमोह में अंधी आंखें, भीष्म की निष्क्रिय धर्मनिष्ठा, और द्रोण जैसे ज्ञानियों की चुप्पी, इन सबने मिलकर अधर्म को संभव बनाया। जब समाज के स्तंभ मौन हो जाते हैं, तो शकुनि जैसे षड्यंत्रकारियों को मंच मिल जाता है।

शकुनियों से बचकर

आज भी शकुनि हमारे बीच हैं- किसी संस्थान में, किसी राजनीतिक गलियारे में, किसी व्यापारिक मेज पर। वे पासे फेंकते हैं जो दिखने में न्यायसंगत लगते हैं, पर भीतर से छल से भरे होते हैं। और युधिष्ठिर भी हमारे बीच हैं, जो नियम और मर्यादा के नाम पर अन्याय को स्वीकार करते जाते हैं।

जीत का आभास और सच्ची जीत

महाभारत हमें सिखाती है कि सच्ची जीत वह नहीं जो पासे जिता दे, अपितु सच्ची जीत वह है जो अंतरात्मा को संतुष्ट करे। छल से मिला राज्य, रेत के महल जैसा होता है- जितना बड़ा बनाओ, उतनी तेज गिरता है। शकुनि का पासा आज भी एक चेतावनी है कि नफरत को जब जीवन का उद्देश्य बना लिया जाए, तो विजेता और पराजित की चिताएं साथ ही सजती हैं।

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