
भगवान राम ने शिवधनुष भंग किया और राजा जनक की प्रतिज्ञा पूरी हो गई और सीता ने राम को अपना वर स्वीकार किया। पूरी मिथिला नगरी उत्सव में डूब गई। राजमहल में वैदिक रीति से विवाह की तैयारियां प्रारंभ हुईं। ऋषि-मुनियों ने शुभ मुहूर्त निर्धारित किया, जबकि राजा जनक ने अयोध्या के महाराज दशरथ को सपरिवार विवाह में सम्मिलित होने का निमंत्रण भेजा।
महर्षि वशिष्ठ और गुरुजनों के साथ महाराज दशरथ अपने पुत्र भरत और शत्रुघ्न सहित विशाल बारात लेकर मिथिला पहुंचे। दोनों राजवंशों का भव्य स्वागत हुआ। राजा जनक और महाराज दशरथ ने एक-दूसरे का सम्मानपूर्वक अभिवादन किया। यह केवल दो परिवारों का नहीं, बल्कि दो महान राजवंशों और उनकी सांस्कृतिक परंपराओं का मिलन था।
इसी दौरान राजा जनक के छोटे भाई कुशध्वज भी अपने परिवार के साथ मिथिला पहुंचे। विचार-विमर्श के बाद यह निर्णय लिया गया कि केवल राम और सीता ही नहीं, बल्कि चारों राजकुमारों का विवाह एक साथ संपन्न होगा। सीता का विवाह राम से, उर्मिला का विवाह लक्ष्मण से, मांडवी का विवाह भरत से और श्रुतकीर्ति का विवाह शत्रुघ्न से निश्चित हुआ। इससे दोनों कुलों का संबंध और भी गहरा हो गया।
निर्धारित शुभ मुहूर्त में ऋषि वशिष्ठ, विश्वामित्र और शतानंद सहित अनेक ऋषियों की उपस्थिति में वैदिक मंत्रों के साथ चारों विवाह संपन्न हुए। राजा जनक ने कन्यादान करते हुए अपनी पुत्रियों को धर्म, मर्यादा और कर्तव्य का पालन करने का उपदेश दिया। विवाह के बाद मिथिला में कई दिनों तक उत्सव, दान और मंगलगान का वातावरण बना रहा। अंततः विदाई के साथ अयोध्या की ओर प्रस्थान हुआ, जहां आगे चलकर रामायण का नया अध्याय प्रारंभ होता है।
आज 'स्वयंवर' शब्द को अक्सर केवल विवाह प्रतियोगिता के रूप में समझा जाता है, जबकि रामायण में इसका व्यापक सामाजिक अर्थ दिखाई देता है। सीता स्वयंवर के बाद तुरंत विवाह नहीं होता; पहले दोनों राजवंशों के बीच संवाद, सहमति और वैदिक विधियों का पालन होता है। इससे स्पष्ट होता है कि विवाह व्यक्तिगत निर्णय के साथ-साथ सामाजिक और पारिवारिक संस्था भी था।
राम और सीता का विवाह तो पहले से निश्चित था, लेकिन चारों भाइयों और चारों राजकुमारियों के विवाह ने कोशल और मिथिला के संबंधों को स्थायी रूप से मजबूत कर दिया। प्राचीन भारत में ऐसे वैवाहिक संबंध केवल पारिवारिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और राजनयिक सहयोग का माध्यम भी बनते थे। हालांकि आधुनिक राष्ट्र-राज्य की राजनीति से इसकी सीधी तुलना उचित नहीं होगी, क्योंकि उस समय की सामाजिक संरचना भिन्न थी।
राजा जनक केवल सीता के पिता नहीं, बल्कि एक दार्शनिक राजा के रूप में भी प्रसिद्ध हैं। विवाह के समय उनका व्यवहार विजेता और पराजित जैसा नहीं, बल्कि समान सम्मान वाले संबंध का प्रतीक है। वे दशरथ का स्वागत एक सहयोगी राजा के रूप में करते हैं। इससे यह संदेश मिलता है कि स्थायी संबंध शक्ति प्रदर्शन से नहीं, बल्कि परस्पर सम्मान और विश्वास से बनते हैं।
राम–सीता, लक्ष्मण–उर्मिला, भरत–मांडवी और शत्रुघ्न–श्रुतकीर्ति, ये चारों विवाह रामायण में अलग-अलग आदर्श प्रस्तुत करते हैं। राम और सीता मर्यादा के, लक्ष्मण और उर्मिला त्याग के, भरत और मांडवी कर्तव्यनिष्ठा के तथा शत्रुघ्न और श्रुतकीर्ति शांत सेवा के प्रतीक माने जाते हैं। यह व्याख्या उत्तरवर्ती परंपराओं में अधिक विकसित हुई है, इसलिए इसे मूल वाल्मीकि रामायण का प्रत्यक्ष कथन नहीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक परंपरा की व्यापक समझ के रूप में देखना चाहिए।
सीता स्वयंवर का यह प्रसंग बताता है कि किसी भी संबंध की सफलता केवल प्रारंभिक आकर्षण या उपलब्धि पर निर्भर नहीं होती। उसके पीछे परिवारों का विश्वास, सामाजिक उत्तरदायित्व, साझा मूल्य और दीर्घकालिक प्रतिबद्धता भी महत्वपूर्ण होती है।
आधुनिक समाज में विवाह की अवधारणाएं बदल चुकी हैं, फिर भी पारस्परिक सम्मान, संवाद और उत्तरदायित्व जैसे मूल्य आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं। यही कारण है कि सीता स्वयंवर केवल एक वैवाहिक प्रसंग नहीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक इतिहास में सामाजिक समन्वय और मर्यादा का महत्वपूर्ण अध्याय माना जाता है।
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