
Story of the होली केवल रंग और गुलाल का उत्सव नहीं, यह भारतीय चिंतन की वह परंपरा है जो पौराणिक कथाओं के माध्यम से मनुष्य को जीवन के गूढ़ सत्य सिखाती है। होली से जुड़ी पांच प्रमुख कथाएं एक-दूसरे से भिन्न होते हुए भी एक ही सूत्र में बंधी हैं- बुराई पर अच्छाई की विजय, प्रेम की शक्ति, और समाज की सामूहिक चेतना का उत्सव।
सबसे प्रसिद्ध कथा है हिरण्यकश्यप और उसके पुत्र प्रह्लाद की। हिरण्यकश्यप ने अपने को ईश्वर घोषित कर दिया था और चाहता था कि सब उसी की पूजा करें। किंतु प्रह्लाद विष्णु-भक्ति से विचलित नहीं हुए। हिरण्यकश्यप ने अपनी बहन होलिका के साथ मिलकर प्रह्लाद को अग्नि में जलाने का षड्यंत्र रचा। होलिका को वरदान था कि वह अग्नि में नहीं जलेगी, किंतु वरदान का उपयोग दुर्भावना से करने पर वही जल गई और निर्दोष प्रह्लाद बच गए।
यह कथा राजनीतिक दर्शन की दृष्टि से अत्यंत प्रासंगिक है। जब सत्ता अहंकार में डूबकर मनुष्य की आस्था और विवेक को कुचलने की कोशिश करती है, तब समाज में प्रतिरोध की वह चिनगारी जन्म लेती है जो अंततः सत्य की विजय करती है। होलिका दहन इसीलिए केवल एक धार्मिक क्रिया नहीं, बल्कि हर वर्ष यह याद दिलाने का अनुष्ठान है कि अन्याय चाहे कितना भी शक्तिशाली हो, उसका अंत निश्चित है।
यह कथा होली के रंगों और उल्लास का आध्यात्मिक आधार मानी जाती है। जब भगवान शिव तारकासुर के वध के लिए समाधि में थे, तब देवताओं ने कामदेव से उनकी तपस्या भंग करने का अनुरोध किया। कामदेव ने शिव पर पुष्प-बाण चलाया, जिससे क्रोधित होकर शिव ने अपनी तीसरी आंख खोली और कामदेव को भस्म कर दिया। कामदेव की पत्नी रति के विलाप पर शिव ने कामदेव को पुनर्जीवित किया। इसी खुशी में लोगों ने रंग खेले। फाल्गुन में कामदेव की पूजा और होली का उत्सव इसी कथा से जुड़ा है।
इस कथा का दार्शनिक संदेश गहरा है। काम अर्थात् इच्छा, मनुष्य के जीवन का अनिवार्य हिस्सा है, किंतु वह जब नियंत्रण से बाहर हो जाए तो विनाशकारी बन जाती है। शिव का कामदेव को भस्म करना यह सिखाता है कि बाह्य प्रलोभन और आसक्ति मनुष्य की चेतना को भटका सकते हैं। साथ ही, कामदेव का पुनर्जीवन यह भी बताता है कि जीवन में प्रेम और सृजन की शक्ति को पूर्णतः नष्ट नहीं किया जा सकता, उसे केवल संयमित और दिशा-निर्देशित किया जाना चाहिए। होली का वसंत-उत्सव इसी संतुलन का उद्घोष है।
ब्रज, मथुरा और वृंदावन की होली का आधार यही कथा है। कृष्ण अपने सांवले रंग को लेकर मां यशोदा से शिकायत करते थे कि राधा इतनी गोरी क्यों हैं। यशोदा ने हंसते हुए कहा कि राधा के मुख पर जो रंग चाहो लगा दो। कृष्ण ने राधा और गोपियों के साथ रंग खेला और तब से ब्रज की होली परंपरा बन गई। बरसाना की लट्ठमार और नंदगांव की फूलों की होली इसी परंपरा के रूप हैं।
सामाजिक दृष्टि से यह कथा रंग-भेद और वर्ण-व्यवस्था के विरुद्ध एक सूक्ष्म संदेश देती है। जब सभी एक-दूसरे पर रंग लगाते हैं, तो कोई छोटा-बड़ा नहीं रहता, सब एक रंग में रंग जाते हैं। होली का यही लोकतांत्रिक चरित्र उसे भारत के सबसे समावेशी त्योहारों में से एक बनाता है। लट्ठमार होली में स्त्रियां पुरुषों पर लाठी मारती हैं और पुरुष हंसते हुए सहते हैं। यह स्त्री-शक्ति के उत्सव का एक अनोखा रूप है।
यह कथा मुख्यतः राजस्थान में प्रचलित है। पृथु नामक राजा के राज्य में ढुंढी नाम की राक्षसी बच्चों को परेशान करती थी। उसे शिव का वरदान था कि वह देवताओं, अस्त्र-शस्त्र और ठंड-गर्मी से नहीं मरेगी, लेकिन खेलते हुए बच्चों के शोर और गालियों से उसकी शक्ति नष्ट होगी। फाल्गुन पूर्णिमा को गांव के बच्चों ने शोर मचाकर उसे भगा दिया। इसीलिए होली पर बच्चों का उछल-कूद और गाँवों में गाली-गीत गाने की परंपरा है।
यह कथा सामाजिक दर्शन की कसौटी पर खरी उतरती है। कभी-कभी वे शक्तियां जिन्हें बड़े-बड़े अस्त्र नहीं हरा सकते, उन्हें समाज की सामूहिक हंसी और एकता हरा देती है। ढुंढी वस्तुतः उस नकारात्मकता का प्रतीक है जो समाज में बच्चों की निश्छलता और उत्साह को मारती है। होली पर गांवों में गाए जाने वाले लोकगीत और बच्चों की उछल-कूद इसी परंपरा की जीवंत अभिव्यक्ति हैं।
पांचवीं कथा कोई पौराणिक आख्यान नहीं, यह स्वयं प्रकृति की कथा है। वैदिक काल से फाल्गुन पूर्णिमा पर नई फसल की बालियां अग्नि में भूनकर देवताओं को अर्पित करने की परंपरा थी। यही होलिका दहन का मूल रूप है।
यह परंपरा मनुष्य और प्रकृति के बीच उस गहरे संवाद को दर्शाती है जो आज की उपभोक्तावादी संस्कृति में लगभग खो गया है। जब किसान अपनी पहली फसल अग्नि को अर्पित करता था, तो वह केवल पूजा नहीं करता था, वह यह स्वीकार करता था कि उसकी समृद्धि उसकी अकेली उपलब्धि नहीं, बल्कि पृथ्वी, जल, सूर्य और वायु का सामूहिक उपहार है।
इन पांचों कथाओं को एक साथ देखें तो होली का व्यापक दार्शनिक अर्थ उभरता है। यह त्योहार सिखाता है कि अहंकार और अन्याय का दहन आवश्यक है, इच्छाओं का संयम जरूरी है, प्रेम में रंग-भेद का कोई स्थान नहीं, समाज की सामूहिक हंसी बड़ी से बड़ी बुराई को परास्त कर सकती है, और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता ही सच्ची समृद्धि का आधार है।
होली इसीलिए केवल एक दिन का उत्सव नहीं, यह जीने का एक दर्शन है। जब हम एक-दूसरे पर रंग डालते हैं, तो क्षण भर के लिए हम अपने बीच के सारे विभेद भूल जाते हैं। यही वह क्षण है जब भारत अपने सबसे मौलिक और उदार स्वरूप में दिखाई देता है- रंगों में घुला, हंसता हुआ, एक।
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