
महाभारत के वन पर्व में यह प्रसंग आता है। जब पांडव वनवास में थे और युद्ध की आहट दूर थी, तब देवराज इंद्र ने एक कूटनीतिक षड्यंत्र रचा। कर्ण के पास जन्म से ही दिव्य कवच और कुंडल थे। जब तक ये उसके शरीर पर थे, वह अवध्य था। इंद्र जानते थे कि बिना इन्हें छीने, अर्जुन की रक्षा असंभव है। इंद्र के इस मनसूबे को कर्ण के पिता सूर्यदेव ने भांप लिया। उन्होंने स्वप्न में कर्ण को दर्शन दिए और स्पष्ट चेतावनी दी, 'पुत्र, शीघ्र ही एक वृद्ध ब्राह्मण तुमसे भिक्षा मांगने आएंगे। वह और कोई नहीं, छद्मवेश में इंद्र होंगे। वह तुम्हारे कवच और कुंडल मांगेंगे। उन्हें मत देना। यह दान नहीं, तुम्हारे प्राणों का अपहरण है।'
कर्ण ने पिता को प्रणाम किया, उनकी वेदना को समझा, किंतु विनम्रता से कहा, 'तात, मेरे द्वार से कोई याचक खाली नहीं लौटा। यदि इंद्र स्वयं मांगने आए, तो भी मैं इनकार नहीं कर सकता। यही मेरा धर्म है।' सूर्यदेव मन में पीड़ा लिए लौट गए। कालांतर में इंद्र ब्राह्मण वेश में आए। कर्ण ने उन्हें पहचान लिया, मुस्कुराए, और फिर भी कवच-कुंडल काटकर दे दिए। रक्त से सना वह दान महाभारत का सबसे करुण दृश्य है।
सूर्यदेव का यह स्वप्न-संदेश केवल एक पिता की व्यग्रता नहीं है, अपितु यह उस शाश्वत सत्य की अभिव्यक्ति है जो हर पीढ़ी के माता-पिता जानते हैं और हर पीढ़ी के संतान भूल जाते हैं- अनुभव की चेतावनी, प्रेम की भाषा में होती है। सूर्य सर्वज्ञ हैं। वे जगत के साक्षी हैं। असत्य उनसे छिपता नहीं। फिर भी उन्होंने कर्ण को आदेश नहीं दिया, आग्रह किया। यह वैदिक परंपरा का वह गहरा बोध है जहां पिता पुत्र का स्वामी नहीं, मार्गदर्शक होता है। उपनिषदों में गुरु और शिष्य का, पिता और पुत्र का संबंध सदा संवाद पर टिका है, दमन पर नहीं।
कर्ण ने सूर्य की बात सुनी। समझी भी। किंतु नहीं मानी। यहां समाज एक बड़ी भूल करता है। वह कर्ण के इस निर्णय को वीरता कहता है। परंतु दार्शनिक दृष्टि से यह स्वयं के प्रति की गई हिंसा है। कर्ण की पीड़ा यह नहीं थी कि उन्हें इंद्र का छद्म नहीं दिखा। पीड़ा यह थी कि उन्होंने अपनी पहचान, दानवीर कर्ण, को इतना केंद्रीय बना लिया था कि उससे अलग होना उसे अपनी मृत्यु लगती थी। माता-पिता जब चेतावनी देते हैं, तब वे हमें हम से ही बचा रहे होते हैं। उस अहंकार से हमें बचाते हैं जिसे हम अपनी पहचान समझ बैठे होते हैं।
आज के समाज में माता-पिता की बात को पुराणपंथी कहकर नकारने की प्रवृत्ति बढ़ी है। युवा पीढ़ी अपने निर्णयों को स्वतंत्रता का प्रमाण मानती है। किंतु कर्ण-प्रसंग यह प्रश्न उठाता है कि क्या अनुभव को नकारना स्वतंत्रता है, या एक और प्रकार की दासता?
सूर्य की चेतावनी में केवल वात्सल्य नहीं था, उसमें जगत का ज्ञान था, काल की समझ थी, षड्यंत्र की पहचान थी। माता-पिता जो देखते हैं, वह केवल अपने अनुभव से नहीं, वे संतान को बाहर से देखते हैं, और इसीलिए वह देख पाते हैं जो संतान स्वयं नहीं देख पाती।
यहां एक और सूक्ष्म सत्य है। सूर्य ने कर्ण को भय दिखाकर नहीं रोका, उन्होंने सत्य बताया। 'यह इंद्र होंगे, यह छल है' यह जानकारी थी, धमकी नहीं। श्रेष्ठ माता-पिता वे हैं जो संतान को परिणाम बताते हैं, निर्णय नहीं थोपते। और श्रेष्ठ संतान वह है जो इस जानकारी को तौलती है, उड़ाती नहीं।
कर्ण का दुर्भाग्य यह था कि उनके जीवन में सही समय पर सही माता-पिता का आशीर्वाद नहीं मिला। कुंती ने त्यागा, अधिरथ ने पाला पर सच छिपाया, और सूर्य जब आए तब बहुत देर हो चुकी थी। यह महाभारत का वह करुण स्वर है जो बताता है कि संतान को माता-पिता की चेतावनी तब सुननी चाहिए जब वह सुनाई दे, क्योंकि जब वह चेतावनी सिद्ध होती है, तब सुनने का अवसर नहीं बचता।
आज की कथा और आज का सुविचार पढ़ने के लिए क्लिक करें।
Catch all the Business News, Market News, Breaking News Events and Latest News Updates on Live Mint. Download The Mint News App to get Daily Market Updates.
MoreOops! Looks like you have exceeded the limit to bookmark the image. Remove some to bookmark this image.