
वनवास का बारहवां वर्ष था। पाण्डव द्वैतवन में निवास कर रहे थे। एक दिन एक ब्राह्मण का मृग उनके अरणि-काष्ठ लेकर भाग गया। धर्मराज युधिष्ठिर के नेतृत्व में पांचों पाण्डव उस मृग का पीछा करते-करते घने वन में भटक गए। श्रम और तृषा से व्याकुल होकर वे एक सरोवर के निकट पहुंचे। नकुल पहले जल लेने गए।
सरोवर के तट पर एक दिव्य वाणी गूंजी, 'यह सरोवर मेरा है। पहले मेरे प्रश्नों का उत्तर दो, तब जल लो।' नकुल ने वाणी की उपेक्षा की, जल स्पर्श किया और मूर्च्छित होकर गिर पड़े। एक-एक करके सहदेव, अर्जुन और भीम भी वहीं गए। वही वाणी, वही चेतावनी, वही उपेक्षा और वही परिणाम। चारों वीर भूमि पर निष्प्राण से पड़े थे।
अंतिम में युधिष्ठिर पहुंचे। चारों भाइयों को भूमि पर देख उनका हृदय विदीर्ण हो गया। वे सरोवर के निकट पहुंचे तो वही दिव्य वाणी फिर उठी। इस बार सरोवर के ऊपर एक विशाल बक का रूप प्रकट हुआ। वस्तुतः यह यक्ष था, धर्म का साक्षात् स्वरूप, जो स्वयं युधिष्ठिर के पिता यमराज थे। युधिष्ठिर ने विनम्रतापूर्वक कहा, 'पूछिए, मैं उत्तर दूंगा।'
यक्ष ने एक के बाद एक प्रश्न पूछे। युधिष्ठिर ने प्रत्येक का उत्तर दिया-
यक्ष ने पूछा, 'सूर्य को कौन ऊंचा उठाता है?' युधिष्ठिर बोले, 'ब्रह्म।'
'मनुष्य का सच्चा मित्र कौन है?' — 'धैर्य।'
'मनुष्य को जीवित रखने वाला क्या है?' — 'प्राण नहीं, अपितु आशा।'
'धर्म से बड़ा क्या है?' — 'दया।'
'किसे वश में करने से दुःख नहीं होता?' — 'मन को।'
'सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है?' युधिष्ठिर का उत्तर अमर हो गया — 'प्रतिदिन असंख्य प्राणी मृत्यु को प्राप्त होते हैं, फिर भी जो जीवित है वह सोचता है कि वह कभी नहीं मरेगा। यही सबसे बड़ा आश्चर्य है।'
अंत में यक्ष ने कहा, 'मैं तुम्हारे केवल एक भाई को जीवित करूंगा। किसे चुनते हो?' युधिष्ठिर ने कहा, 'नकुल को।' यक्ष चकित हुआ। भीम और अर्जुन जैसे महाबली भाइयों को छोड़कर नकुल क्यों? युधिष्ठिर बोले, 'माता कुन्ती का एक पुत्र जीवित है- मैं। माता माद्री का भी एक पुत्र जीवित रहे नकुल। यही धर्म है।'
यक्ष प्रसन्न हुआ। उसने चारों भाइयों को जीवित कर दिया और अपना वास्तविक रूप प्रकट किया। वे स्वयं धर्मराज यमराज थे, युधिष्ठिर के पिता। उन्होंने पुत्र को आशीर्वाद दिया और अन्तर्धान हो गए।
महाभारत में यक्ष-प्रश्न का प्रसंग केवल एक कथा नहीं, अपितु यह एक दार्शनिक परीक्षागृह है जहां व्यास ने मनुष्य की समस्त ज्ञान-परम्पराओं को एक क्षण में केन्द्रित कर दिया है। भीम की भुजाओं में असीम बल था, अर्जुन के गाण्डीव में अपराजेय शक्ति थी, नकुल और सहदेव में अद्वितीय कौशल था, किन्तु वे सब सरोवर के तट पर निष्प्राण पड़े थे। जिसने उन्हें गिराया, वह शत्रु का शस्त्र नहीं था। वह था प्रश्न की उपेक्षा। यक्ष ने यह सिद्ध किया कि जो ज्ञान के प्रश्न को अनसुना करता है, वह मृत्यु को निमंत्रण देता है। यह महाभारत का सबसे सूक्ष्म और सबसे गहरा दार्शनिक संदेश है।
भारतीय दर्शन में प्रश्न को सदैव ज्ञान का आरम्भ माना गया है। उपनिषदों की समस्त यात्रा प्रश्न से प्रारम्भ होती है। 'कस्मिन्नु भगवो विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं भवति'। हे भगवन्, किसे जान लेने से यह सब जाना जाता है? यह मुण्डकोपनिषद का आरम्भिक प्रश्न है जो समस्त वैदिक ज्ञान-परम्परा का बीज है। यक्ष-प्रसंग इसी परम्परा का कथा-रूप है। भीम ने प्रश्न सुना और अनसुना किया क्योंकि उनके लिए तृषा की तात्कालिक पीड़ा, ज्ञान की दीर्घकालिक साधना से बड़ी थी। यह केवल भीम की कमजोरी नहीं है, यह उस मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति है जो तत्काल समाधान चाहता है और मूल प्रश्न से बचता है। युधिष्ठिर ने रुककर सुना। और यही रुकना, यही सुनना, ज्ञान का प्रथम चरण था।
यक्ष के प्रश्नों के युधिष्ठिर के उत्तर भारतीय नीति, आध्यात्म और मनोविज्ञान का संघनित सार हैं। जब यक्ष ने पूछा कि मनुष्य को जीवित कौन रखता है, तो युधिष्ठिर ने कहा, 'आशा।' यह उत्तर चिकित्सकीय दृष्टि से भी उतना ही सत्य है जितना आध्यात्मिक दृष्टि से। आधुनिक मनोविज्ञान में Viktor Frankl ने अपने जीवन-अनुभव से सिद्ध किया कि जिस मनुष्य के पास जीने का अर्थ है, वह मृत्यु के निकटतम परिस्थितियों में भी जीवित रहता है। युधिष्ठिर ने यही बात सहस्राब्दी पूर्व एक शब्द में कह दी थी- आशा।
जब यक्ष ने पूछा कि धर्म से बड़ा क्या है, तो युधिष्ठिर ने कहा, 'दया।' यह उत्तर अत्यंत क्रांतिकारी है। धर्म की परम्परागत व्याख्या में अनुष्ठान, विधि, और कर्तव्य आते हैं। किन्तु युधिष्ठिर ने कहा कि दया। उन्होंने कहा कि करुणा, सहानुभूति, दूसरे के कष्ट को अनुभव करने की क्षमता धर्म से भी श्रेष्ठ है। बौद्ध दर्शन में करुणा को बोधिचित्त का आधार माना गया है। ईसाई दर्शन में प्रेम को सर्वोच्च गुण कहा गया है। और युधिष्ठिर ने महाभारत के वन-पर्व में यह स्थापित किया कि जहां धर्म और दया में संघर्ष हो, वहां दया का पक्ष लेना ही सच्चा धर्म है।
महाभारत के वनपर्व में कहा गया है, 'अहन्यहनि भूतानि गच्छन्तीह यमालयम्। शेषाः स्थावरमिच्छन्ति किमाश्चर्यमतः परम्।।' प्रतिदिन प्राणी मृत्यु को प्राप्त होते हैं, फिर भी जो शेष बचे हैं वे स्थायी रहना चाहते हैं, इससे बड़ा आश्चर्य क्या है? यह श्लोक भारतीय दर्शन के सबसे गहरे अनुभव को व्यक्त करता है। हेइडेगर ने इसे 'मृत्यु की ओर उन्मुख अस्तित्व' (being-towards-death)। उनका कहना था कि मृत्यु की वास्तविक स्वीकृति ही मनुष्य को प्रामाणिक जीवन जीने की शक्ति देती है। युधिष्ठिर का यह उत्तर उसी सत्य को छूता है। मृत्यु की उपेक्षा करना, जैसा भीम और अर्जुन ने यक्ष की चेतावनी की उपेक्षा करके किया, एक प्रकार का अज्ञान है। और मृत्यु को जानते हुए भी धर्म पर चलते रहना, जैसा युधिष्ठिर करते रहे, यही ज्ञान की परिणति है।
यक्ष का अंतिम प्रश्न इस प्रसंग का सामाजिक शिखर है। जब युधिष्ठिर ने भीम और अर्जुन को छोड़कर नकुल को चुना, तो उन्होंने एक ऐसा नैतिक सिद्धान्त प्रतिपादित किया जो राज्य और परिवार दोनों के लिए आज भी प्रासंगिक है। उनका तर्क था कि माता कुन्ती की संतान तो वे स्वयं जीवित हैं, किन्तु माता माद्री की संतान में से कोई न बचे, यह न्यायसंगत नहीं। यहां युधिष्ठिर ने व्यक्तिगत प्रेम और सार्वजनिक न्याय के बीच वह संतुलन स्थापित किया जो एक आदर्श राजधर्म की आत्मा है। भीम और अर्जुन उनके अधिक प्रिय थे, अधिक उपयोगी भी थे युद्ध की दृष्टि से, किन्तु न्याय की दृष्टि से नकुल का अधिकार समान था। आधुनिक लोकतांत्रिक राजनीति में यही सिद्धान्त समानता और प्रतिनिधित्व का आधार है। यह विचार कि शासक का दायित्व केवल बहुमत के प्रति नहीं, अपितु प्रत्येक वर्ग के प्रति समान है।
व्यास ने यक्ष को धर्म का साक्षात स्वरूप बताया है, जो वस्तुतः युधिष्ठिर के पिता यमराज हैं। यह प्रतीक अत्यंत सार्थक है। यमराज मृत्यु के देवता हैं और मृत्यु ही वह अंतिम परीक्षक है जिसके समक्ष मनुष्य का समस्त अहंकार, बल, और कौशल निरर्थक हो जाता है। भीम का बल, अर्जुन का कौशल, सब यमराज के प्रश्न के सामने असफल रहे। केवल ज्ञान और धर्म ने उत्तीर्णता पाई। यह व्यास का वह सन्देश है जो महाभारत के प्रत्येक पृष्ठ पर गूंजता है कि शक्ति का अंत होता है, धर्म का नहीं।
आज का मनुष्य भी प्रतिदिन यक्ष के सरोवर के सामने खड़ा है। जब कोई महत्त्वपूर्ण निर्णय लेना होता है करियर, परिवार, नीति, या नैतिकता का, तो एक प्रश्न अवश्य उठता है। और अधिकांश लोग उस प्रश्न को अनसुना करके आगे बढ़ जाते हैं, जैसे भीम ने किया। वे तत्काल समाधान चुनते हैं। तात्कालिक लाभ चुनते हैं। परिणाम वही होता है जो सरोवर के तट पर हुआ, एक प्रकार की आत्मिक मूर्च्छा। न्यूजरूम में एक सम्पादक जब टीआरपी के दबाव में सत्य को दरकिनार करता है, वह यक्ष की चेतावनी को अनसुना करता है। एक नेता जब न्याय की जगह अपनी सत्ता को प्राथमिकता देता है, वह यक्ष की चेतावनी को अनसुना करता है। युधिष्ठिर का मार्ग कठिन था- रुकना, सुनना, विचार करना, और फिर धर्म के अनुसार उत्तर देना। किन्तु यही मार्ग जीवन देता है स्वयं को भी और अपने भाइयों को भी।
इस प्रसंग का एक और आयाम है जो प्रायः अनदेखा रह जाता है। युधिष्ठिर के पिता स्वयं धर्मराज यमराज थे और पुत्र की परीक्षा लेने वाले भी वही थे। यह एक गहरा प्रतीक है। परम्परागत भारतीय दृष्टि में पिता का दायित्व केवल पालन-पोषण नहीं है। वह पुत्र का पहला गुरु भी है, और अंतिम परीक्षक भी। जब यमराज ने युधिष्ठिर को आशीर्वाद दिया, तो यह केवल एक परीक्षा का समापन नहीं था, यह एक पिता का अपने पुत्र को यह प्रमाण देना था कि वह धर्म के योग्य है। और युधिष्ठिर ने यह प्रमाण किसी शस्त्र से नहीं, किसी बल से नहीं, अपने विवेक, करुणा और न्यायबोध से अर्जित किया।
यक्ष-प्रश्न का प्रसंग समाप्त होता है, किन्तु एक प्रश्न शेष रह जाता है कि क्या हम अपने जीवन के यक्ष-प्रश्नों को सुनते हैं? जब विवेक बोलता है, जब नैतिकता पूछती है, जब न्याय प्रश्न करता है तो क्या हम रुकते हैं? या भीम की भांति अनसुना करके जल पीने लगते हैं? युधिष्ठिर की महानता यह नहीं थी कि उनके पास सभी उत्तर थे। उनकी महानता यह थी कि उन्होंने प्रश्न सुना। और जो प्रश्न सुनता है, वही जीवित रहता है, देह से भी और आत्मा से भी।
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