
मगध का राजा जरासंध महाबली था। शरीर से अजेय, अहंकार में अंधा। उसने असंख्य राजाओं को बंदी बना रखा था, ताकि एक सौ राजाओं की बलि देकर वह रुद्र को प्रसन्न कर सके। उसने मनुष्यों को यज्ञ-पशु बनाने की सोची। यह केवल राजनीतिक वर्चस्व नहीं, एक धार्मिक अपराध था।
युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ की सिद्धि के लिए यह आवश्यक था कि जरासंध का दर्प चूर हो। श्रीकृष्ण ने कूटनीति चुनी। युद्ध नहीं, द्वंद्व। भीम, अर्जुन और कृष्ण ब्राह्मण वेश में मगध पहुंचे। जरासंध ने अतिथि-धर्म निभाया, पर जब उन्होंने अपना परिचय दिया और भीम से मल्लयुद्ध का आह्वान किया, तो जरासंध ने भीम को चुना।
तेरह दिन और तेरह रात तक मल्लयुद्ध चला। जरासंध अद्भुत था। उसका शरीर दो भागों में चीरने पर भी जुड़ जाता था, क्योंकि जन्म से ही उसके दो टुकड़े राक्षसी जरा ने जोड़े थे। भीम जब-जब उसे चीरते, वह जुड़ जाता। तब कृष्ण ने एक तिनका उठाया। उसे बाईं से दाईं ओर नहीं, बल्कि विपरीत दिशाओं में फेंक दिया। संकेत मिला। भीम ने जरासंध को उठाया, पैरों से चीरा और दोनों भागों को विपरीत दिशाओं में फेंक दिया। जरासंध जुड़ नहीं सका।
अत्याचारी का अंत हुआ। बंदी राजा मुक्त हुए। धर्म की नींव रखी गई। जरासंध की कथा केवल एक मल्लयुद्ध की गाथा नहीं है। यह उस शाश्वत प्रश्न का उत्तर है जो प्रत्येक सभ्यता के मर्म में धड़कता है कि क्या अत्याचारी का नाश धर्म है, या हिंसा?
जरासंध की शक्ति व्यक्तिगत नहीं थी, वह एक व्यवस्था थी। उसने राजाओं को बंदी बनाया, अर्थात समाज के उन स्तंभों को, जो जनता की रक्षा के लिए नियुक्त थे। जब रक्षक ही बंधन में हो, तो प्रजा का क्या होगा? महाभारत यहां एक गहरी राजनीतिक सत्य की ओर संकेत करता है कि सत्ता जब धर्म से नहीं, भय से चलती है, तो वह पूरी व्यवस्था को विषाक्त कर देती है।
सौ राजाओं की बलि देने का जरासंध का संकल्प सत्ता का वह रूप है जो मनुष्य को साधन मान लेता है, साध्य नहीं। कांट का वह सूत्र यहां प्रासंगिक है कि मनुष्य सदा साध्य है, कभी केवल साधन नहीं। जरासंध ने इसी मर्यादा का उल्लंघन किया था।
युद्ध में कृष्ण का तिनका वाला संकेत सतही रूप से एक चालाकी लगता है, किंतु गहराई में यह ज्ञान का प्रतीक है। भीम के पास बल था, पर दिशा नहीं। कृष्ण ने केवल दिशा दी। यह महाभारत का केंद्रीय दर्शन है। बल तभी सार्थक होता है जब वह विवेक के साथ संयुक्त हो। बिना विवेक का बल जरासंध है; बिना बल का विवेक निरर्थक है। यह संयोग नहीं कि इस कथा में तीन पात्र हैं- कृष्ण (ज्ञान), भीम (शक्ति), अर्जुन (कौशल)। तीनों मिलकर धर्म-स्थापना करते हैं। अकेला कोई भी पर्याप्त नहीं।
जो प्रश्न इस कथा के हृदय में है, वह कृष्ण का वह शाश्वत संदेश है कि क्या अत्याचारी को सहन करना भी एक प्रकार की हिंसा नहीं? महाभारत का उत्तर स्पष्ट है। जरासंध को जीवित रखना उन सौ राजाओं और उनकी प्रजाओं के प्रति अन्याय होता। अहिंसा तब तक सद्गुण है जब तक वह निर्दोषों की रक्षा करे। जब अहिंसा स्वयं अत्याचार की सहायक बन जाए, तब वह धर्म नहीं, कायरता है। गीता में कृष्ण ने इसी को क्षात्र-धर्म कहा- रक्षा के लिए संघर्ष करना, भोग के लिए नहीं।
आज के संदर्भ में जरासंध केवल एक राजा नहीं, वह हर उस व्यवस्था का प्रतीक है जो न्यायपालिका, पत्रकारिता, शिक्षा जैसी संस्थाओं को बंदी बना लेती है। जब संस्थाएं स्वतंत्र नहीं, तो समाज जरासंध की कारागार में है, और तब समाज को भीम चाहिए। वह भीम जो बोले, जो लड़े, जो तोड़े उस जकड़न को। पर साथ में कृष्ण भी चाहिए। वह विवेक जो बताए कि तोड़ना किस दिशा में है। अत्याचार का नाश धर्म है, परंतु वह धर्म तब पूर्ण होता है जब उसके पीछे न क्रोध हो, न स्वार्थ। केवल न्याय की इच्छा हो।
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