
लाक्षागृह से बचकर निकले पांचों पाण्डव जब वन के अंधेरे में भटक रहे थे, तब उनके पास न राज्य था, न सेना, न भविष्य का कोई स्पष्ट मार्ग। कुन्ती के साथ थके-हारे वे वन की गहराइयों में छुपते फिर रहे थे। ऐसी ही एक रात, जब भीम अपनी माता और भाइयों को कंधे पर उठाकर चल रहे थे, उनका सामना हिडिम्बा नामक राक्षसी से हुआ।
हिडिम्बा के भाई हिडिम्ब ने पाण्डवों को मारने के लिए उसे भेजा था, किन्तु भीम का तेज और रूप देखकर हिडिम्बा के हृदय में प्रेम का उदय हो गया। उसने भीम को वस्तुस्थिति बता दी। क्रुद्ध हिडिम्ब जब युद्ध के लिए आया, तो भीम ने उसका वध किया। इसके पश्चात् कुन्ती की अनुमति से भीम ने हिडिम्बा से विवाह किया। यह विवाह किसी उत्सव में नहीं, वन के भय और अनिश्चितता के बीच हुआ।
उसी मिलन से जो पुत्र उत्पन्न हुआ, वह था- घटोत्कच। जन्म के साथ ही वह पूर्णतः युवा हो गया। माया और दिव्य शक्तियां उसे जन्मजात प्राप्त थीं। माता और पिता दोनों को प्रणाम कर उसने कहा, 'मुझे आज्ञा दें, मैं आपके संकट में सदा उपस्थित रहूंगा।' और वन में अदृश्य हो गया। पाण्डवों के जीवन में उस क्षण उनके पास खोने को तो सब कुछ था, पर पाने में एक असाधारण पुत्र की प्राप्ति हुई।
भर्तृहरि ने नीतिशतक में महापुरुषों के स्वाभाविक गुणों का वर्णन करते हुए लिखा है-
विपत्ति में धैर्य, समृद्धि में क्षमाशीलता, सभा में वचन-कौशल, युद्ध में शौर्य, ये गुण महापुरुषों में स्वभाव से ही सिद्ध होते हैं। इस श्लोक की कसौटी पर घटोत्कच-प्रसंग को परखें तो एक गहरा सत्य उजागर होता है। कुन्ती ने विपत्ति में धैर्य रखा, भीम ने संकट में भी अपना पराक्रम नहीं छोड़ा, और हिडिम्बा ने शत्रु के बीच प्रेम को पहचानने का साहस दिखाया। यही तीनों गुण मिलकर एक ऐसे योद्धा के जन्म का कारण बने, जो कुरुक्षेत्र में अपरिहार्य सिद्ध हुआ।
भारतीय दर्शन यह कभी नहीं कहता कि विपत्ति अच्छी होती है। वह यह कहता है कि जो विपत्ति में भी अपने स्वभाव से नहीं डिगते, उनके जीवन में संकट भी किसी सृजन की भूमिका बन जाता है। यदि पाण्डव राजमहल में होते, वैभव में होते, तो शायद भीम का हिडिम्बा से यह असाधारण मिलन कभी न होता। लाक्षागृह की वह आग जो दुर्योधन ने विनाश के लिए लगाई थी, उसी ने पाण्डवों को उस वन की ओर धकेला, जहां एक ऐसे योद्धा का बीजारोपण होना था जो कर्ण के अमोघ शक्ति-अस्त्र को अपने ऊपर लेकर अर्जुन के प्राण बचाएगा।
उद्योगपर्व में महात्मा विदुर धृतराष्ट्र को पण्डितबुद्धि पुरुष का लक्षण बताते हुए कहते हैं-
जो अप्राप्य के लिए लालायित नहीं होते, जो खोई हुई वस्तु के लिए शोक नहीं करते, और जो आपत्तियों में भी विचलित नहीं होते, वही पण्डितबुद्धि पुरुष हैं।
लाक्षागृह से भागते हुए पाण्डवों की मनःस्थिति इस श्लोक की जीवन्त व्याख्या है। उन्होंने न खोए हुए राज्य का विलाप किया, न अप्राप्य प्रतिशोध की चाह में व्यग्र हुए। वे वन में जीवित रहे, सतर्क रहे, और जो संयोग सामने आया, उसे उन्होंने उसकी सम्पूर्णता में स्वीकार किया। यही स्वीकृति घटोत्कच के जन्म का मूल कारण बनी।
गीता में भगवान कहते हैं, 'नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः', अर्थात जो है, वह नष्ट नहीं होता; जो नहीं है, वह उत्पन्न नहीं होता। घटोत्कच की शक्ति तो थी ही, बस उसे प्रकट होने के लिए वह विशेष परिस्थिति चाहिए थी, जो केवल संकट में संभव थी।
इस कथा का एक अत्यन्त आधुनिक आयाम भी है। हिडिम्बा वन की राक्षसी थी। समाज के हाशिये पर, तथाकथित 'सभ्य' संस्कृति के बाहर। किन्तु कुन्ती ने उसे पुत्रवधू के रूप में स्वीकार किया। यह स्वीकृति केवल औदार्य नहीं थी, यह एक दूरदर्शी नेतृत्व का निर्णय था। कुन्ती ने जाना कि शक्ति केवल कुलीन वंशों में नहीं होती। जो समाज केवल अपने जैसों से गठबन्धन करता है, वह सीमित रहता है। जो समाज विभिन्न पृष्ठभूमियों की शक्तियों को पहचानकर उन्हें जोड़ता है- वह विस्तृत और अजेय बनता है।
घटोत्कच न पूरी तरह मानव था, न पूरी तरह राक्षस। वह दोनों संस्कृतियों का संगम था। और इसीलिए उसमें वह क्षमता थी जो शुद्ध कुलीन वातावरण में पले किसी योद्धा में नहीं हो सकती थी। संदेश स्पष्ट है कि जो व्यक्ति, परिवार, या संस्था केवल संकट से घबराकर सिकुड़ जाती है, वह उन संयोगों को खो देती है जो केवल विषम परिस्थितियों में बनते हैं। जो उद्यमी विफलता में भी जुड़े रहते हैं, जो परिवार संघर्ष में भी एकजुट रहते हैं, वहां प्रायः कोई न कोई घटोत्कच जन्म लेता है।
घटोत्कच की कथा यह नहीं कहती कि विपत्ति अच्छी होती है। वह यह कहती है कि विपत्ति के भीतर भी एक अदृश्य सृजन चलता रहता है, बशर्ते हम हिडिम्बा जैसा साहस रखें जो शत्रु के बीच प्रेम को पहचाने, भीम जैसी शक्ति रखें जो परिस्थिति से न डरे, और कुन्ती जैसी विवेकशीलता रखें जो असाधारण को स्वीकार करे। जो पुत्र विपत्ति में जन्मा, वही कुरुक्षेत्र में वरदान बना।
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