
युद्ध की आहट थी। कुरुक्षेत्र की धरती पर शंख बजने से पूर्व सूर्योदय के एक प्रहर कुंती अकेली चली आईं। न रथ, न सेवक। वह मां थीं, और मां अकेली ही जाती है जब पुत्र से कुछ मांगना हो। कर्ण गंगातट पर खड़े थे, सूर्य-उपासना में लीन। आंखें बंद, अर्घ्य उठा हुआ, और पीठ उस स्त्री की ओर जो उन्हें जन्म देकर छोड़ गई थी।
कर्ण ने पैर की छाया से जाना कि कोई आया है। उपासना समाप्त कर मुड़े। देखा कुंती हैं। उन्होंने झुककर प्रणाम किया। 'माता, आज्ञा करें।' शब्दों में औपचारिकता थी, मन में एक पुरानी वेदना। कुंती ने कहा, जो वह वर्षों से कहना चाहती थीं। 'तुम मेरे पुत्र हो, कर्ण। मेरे ज्येष्ठ। पांच पाण्डवों में तुम्हारा नाम होना चाहिए था।' कर्ण मौन रहे। फिर बोले, धीरे और दृढ़ता से, 'आज यह सत्य कहां था, माते, जब संसार ने मुझे सूतपुत्र कहकर अपमानित किया? आपने तब न पहचाना।'
कुंती ने उनसे पाण्डवों को न मारने की याचना की। कर्ण ने एक वचन दिया कि जो महाभारत के सर्वाधिक करुण वचनों में से है। 'मां, आपके पांच पुत्र रहेंगे। यदि अर्जुन मरा, तो कर्ण जीएगा। यदि कर्ण मरा, तो अर्जुन जीएगा। पांच की संख्या अटूट रहेगी।' कुंती लौट गईं। आंखों में अश्रु थे। वह जानती थीं, यह प्रेम था। और यह विदाई भी।
यह भेंट केवल दो व्यक्तियों की नहीं, दो नियतियों की थी। एक ओर वह मां जिसने भय में पुत्र को जल में प्रवाहित किया था, दूसरी ओर वह पुत्र जिसने उस परित्याग को जीवनभर ढोया। जब ये दोनों मिले, तो एक ऐसी वार्तालाप हुई जो न्याय, ममता, निष्ठा और नियति के प्रश्नों को एक साथ उठाती है।
कुंती का गंगातट पर आना प्रेम का प्रमाण था, यह सत्य है। किंतु उस प्रेम के भीतर एक राजनीतिक उद्देश्य भी था। वह कर्ण से पाण्डवों की रक्षा का वचन चाहती थीं। यह ममता शुद्ध नहीं थी, यह ममता रणनीति में लिपटी हुई थी। और कर्ण ने यह जाना। उन्होंने कहा, 'आज आप माता बनकर आई हैं, क्योंकि आपको कुछ चाहिए।'
यह व्यंग्य नहीं था, यह सत्य-दर्शन था। कर्ण उस सत्य को देख सकते थे जो कुंती स्वयं से छिपा रही थीं। महाभारत यहां एक गहरा सामाजिक प्रश्न उठाता है कि क्या मां का अधिकार केवल सुविधा के समय सक्रिय होता है? क्या संकट में याद आने वाला रिश्ता वास्तविक रिश्ता है?
कर्ण ने जो वचन दिया, वह उनके चरित्र का सार है। उन्होंने अपने प्राणों को दांव पर रखकर मां को वह आश्वासन दिया जो मां मांग रही थी, किंतु अपनी निष्ठा के साथ समझौता नहीं किया। दुर्योधन के प्रति उनकी मित्रता उनका धर्म था। गीता के शब्दों में कहें तो 'श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्' अर्थात अपना अपूर्ण धर्म भी दूसरे के संपूर्ण धर्म से श्रेष्ठ है। कर्ण का स्वधर्म मित्र-निष्ठा था। उसे उन्होंने मृत्यु के मूल्य पर भी नहीं छोड़ा।
मनोविज्ञान की दृष्टि से कर्ण का संपूर्ण जीवन परित्याग की पीड़ा से आकार पाया। जिस क्षण कुंती ने उन्हें पहचाना, उस क्षण भी उन्होंने भीतर से एक दरवाजा बंद रखा। वह न तो टूटे, न ही बिखरे। उन्होंने मां को वह नहीं दिया जो मां देना चाहती थीं, क्रोध, आंसू, शिकायत। उन्होंने दिया एक असाधारण शांति, और उस शांति के भीतर एक असाधारण उदारता। यह उपनिषदीय स्थितप्रज्ञता थी, जो बिना किसी शास्त्र-अध्ययन के कर्ण ने जीवन की भट्टी में तपकर प्राप्त की थी।
आज भी ऐसे कर्ण हैं जिन्हें परिवार ने तब पहचाना जब वे स्वयं किसी काम आ सकते थे। जो पुत्र विपन्न था, उसे परिवार ने भुला दिया। जब वह पुत्र समर्थ हो गया, तब ममता जागी। यह केवल महाभारत की कथा नहीं, यह आधुनिक परिवारों, संस्थाओं और राज्यों का भी सत्य है। जो संबंध केवल उपयोगिता पर टिका हो, वह संबंध नहीं, लेन-देन है।
कर्ण-कुंती संवाद का सबसे बड़ा दार्शनिक संदेश यह है कि त्याग की परीक्षा तब होती है जब उसे चुनने में सब कुछ दांव पर हो। कर्ण ने जीवन नहीं मांगा। उन्होंने केवल एक मां को वह दे दिया जो वह दे सकते थे, और उससे अधिक नहीं, जो उनके धर्म के विरुद्ध था। क्या यही सच्चा प्रेम नहीं? क्या यही सच्चा पुत्र नहीं? और जब कुंती लौटीं, आंखों में अश्रु लिए, तो वह शायद जान गई थीं कि उन्होंने उस दिन नहीं खोया था कर्ण को। उन्होंने उसे तब खो दिया था, जब वह नदी में एक टोकरी में बह रहा था, और वह किनारे खड़ी रह गई थीं।
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