
इन्द्रलोक में उत्सव था। अप्सराएं नृत्य कर रही थीं। उर्वशी, स्वर्ग की सर्वश्रेष्ठ नर्तकी, सौंदर्य की साक्षात परिभाषा, मंच पर थी। तभी उसकी दृष्टि अर्जुन पर पड़ी और वह विचलित हो गई। अर्जुन वहां दिव्यास्त्र सीखने आए थे, युद्ध की तैयारी में। उर्वशी उनके रूप पर मुग्ध हो गई। रात्रि में उसने अर्जुन के कक्ष में जाकर अपना अनुराग प्रकट किया।
अर्जुन ने हाथ जोड़ लिए। उन्होंने उर्वशी को माता का स्थान दिया क्योंकि वह पूर्वज पुरूरवा की प्रेयसी थीं और उनके वंश की जननी के समान थीं। 'आप मेरी माता हैं'। यह वाक्य उर्वशी के हृदय में शूल की तरह चुभा। उसने अपना प्रस्ताव अस्वीकार होते देखा तो क्रोध से दीप्त हो उठी।
उर्वशी ने शाप दिया, 'तूने मुझे माता कहा! जा, तू नपुंसक हो जा! स्त्रियों के बीच नर्तक बनकर रह!' अर्जुन मौन रहे। उन्होंने न याचना की, न क्षमा मांगी। यह समाचार इन्द्र तक पहुंचा। इन्द्र ने पुत्र के पास आकर कहा कि यह शाप एक वर्ष तक ही रहेगा और अज्ञातवास में यही तुम्हारा कवच बनेगा।
विराट नगर में अज्ञातवास के समय अर्जुन ने 'बृहन्नला' बनकर राजकुमारी उत्तरा को नृत्य सिखाया। उनकी पहचान छिपी रही। जो शाप था, वही रक्षाकवच बना। ईश्वर का हर शाप एक गूढ़ वरदान है, बस उसे देखने की दृष्टि चाहिए।
जब उर्वशी ने अर्जुन को शाप दिया, तब वह क्रोध में थी। परंतु महाभारत में कोई भी घटना केवल एक स्तर पर नहीं घटती। यह शाप केवल एक अप्सरा का रोष नहीं, अपितु यह नियति का एक सुनियोजित उपकरण था। व्यासजी ने इस प्रसंग को वन-पर्व में इसलिए नहीं रखा कि पाठक केवल कथा का रस लें। उन्होंने इसे रखा ताकि यह प्रश्न उठे कि क्या संसार में कोई भी शाप अंततः ईश्वर की कृपा के बिना गिरता है?
अर्जुन का यह निर्णय कि वह उर्वशी का प्रस्ताव ठुकराएंगे, एक असाधारण नैतिक साहस का उदाहरण है। स्वर्ग में थे, इन्द्र के अतिथि थे, उर्वशी जैसी अप्सरा सामने खड़ी थी और कोई देखने वाला भी नहीं था। ऐसे क्षण में मनुष्य की परीक्षा होती है। अर्जुन ने 'नहीं' कहा। यह 'नहीं' केवल नैतिकता नहीं थी, यह उनकी आत्मा की दृढ़ता थी। गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं, 'यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन'। जो मन से इन्द्रियों को वश में करके कर्म करता है, वही श्रेष्ठ है। अर्जुन ने उस श्रेष्ठता को जिया।
उर्वशी का क्रोध समझ में आता है। उसने अपना अहंकार और अनुराग एक साथ प्रस्तुत किया था। अस्वीकृति उसे असह्य लगी। यहां एक गहरा मनोवैज्ञानिक सत्य छिपा है। हम जब किसी को देते हैं और वह न ले, तो हम उस अस्वीकृति को अपमान मान लेते हैं। उर्वशी का शाप वास्तव में उसके अहंकार की चोट से उत्पन्न हुआ था। परंतु यही चोट, यही क्रोध, ईश्वर की रचना में एक आवश्यक घटना बन गई। नियति ने उर्वशी के क्रोध को अपना माध्यम बनाया।
बृहन्नला का वेश केवल भेष नहीं था। वह एक संपूर्ण पहचान थी जिसे अर्जुन ने धारण किया। इसमें एक गहरी आध्यात्मिक उक्ति है कि आत्मा किसी भी वेश में हो, उसका सत्य नहीं बदलता। विराट नगर में जब कुरुओं ने आक्रमण किया, तब बृहन्नला ने गांडीव उठाया और फिर अर्जुन प्रकट हो गए। वेश के भीतर छिपा योद्धा, जब आवश्यकता पड़ी, प्रकट हो गया। उपनिषद कहते हैं, 'तत्त्वमसि'। वह तुम ही हो। जो तुम हो, वह कोई शाप नहीं छीन सकता।
आज के जीवन में भी यही होता है। कभी नौकरी जाती है, कभी पद छिनता है, कभी कोई अपना ही अपमान करता है। उस क्षण में हम शापित अनुभव करते हैं। परंतु जो व्यक्ति उस शाप को धैर्य से स्वीकार करता है, जो उसमें छिपे अवसर को देखने की दृष्टि रखता है, वही अंततः विजेता बनता है। अर्जुन का यह प्रसंग हमें सिखाता है कि संकट में भी अपनी आत्मा से विश्वासघात मत करो। नियति के शाप को जियो, वह एक दिन वरदान बनकर सामने आएगा।
तो क्या हम अपने जीवन के शापों को भी इसी दृष्टि से देख सकते हैं? क्या जो आज अपमान लगता है, वह कल का कवच बन सकता है? अर्जुन का उत्तर था- हां। पर उसके लिए एक शर्त है- अपनी आत्मा की मर्यादा को कभी न तोड़ना।
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