
विराट नगर में अज्ञातवास के अंतिम दिन थे। कौरव सेना ने विराट राज्य की गायें हर ली थीं। राजा विराट का पुत्र उत्तर कुमार थे। युवा, उत्साही, और वीरता के बड़े-बड़े दावे करने वाले। युद्ध के लिए ललकार रहे थे। वह सभा में बड़ी-बड़ी डींगें हांका करते थे कि यदि कोई कुशल सारथी मिले तो वह अकेला कौरवों को धूल चटा दें।
द्रौपदी ने सुझाया, 'नृत्य-गुरु बृहन्नला एक महान सारथी हैं।' बृहन्नला के वेश में स्वयं अर्जुन थे। उत्तर रथ पर सवार हुए। पर जैसे ही उन्होंनं कौरव सेना को देखा उनके प्राण कांप गए। भीष्म, द्रोण, कर्ण, अश्वत्थामा को देखते ही उनके हाथ से धनुष छूट गया, पैर थरथरा उठे। वह रथ से कूदकर भागने लगे।
तब बृहन्नला के वेष में अर्जुन ने उन्हें रोका। उनके भय को न उपहास में उड़ाया, न डांटा। धीरे-धीरे उनका साहस जगाया। स्वयं सारथी का आसन छोड़ धनुर्धर बने। विराट वन के शमी वृक्ष से गाण्डीव और दिव्यास्त्र उठाए। अर्जुन ने उत्तर को अपने वास्तविक स्वरूप का, अपने शौर्य का साक्षी बनाया। उस दिन कौरव सेना पराजित हुई। उत्तर कुमार विजयी लौटे, पर विजय का श्रेय उस मार्गदर्शक को था जिन्होंने अपनी पहचान छुपाकर भी अपना धर्म नहीं छोड़ा। यह केवल युद्ध नहीं था। यह एक अपरिपक्व आत्मा की, अनुभव की अग्नि में पहली परीक्षा थी।
उत्तर कुमार की कथा केवल एक राजकुमार के पलायन की कथा नहीं है। यह उस सार्वभौमिक मनोदशा की कथा है जो हर उस व्यक्ति में होती है जो क्षमता से अधिक दावा करता है और वास्तविकता से टकराने पर टूट जाता है।
उत्तर में दो विकार एक साथ थे, अहंकार और कायरता। ये परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि परस्पर पोषित हैं। जहां वास्तविक आत्मबल नहीं होता, वहां व्यक्ति बाहर से बड़े दावे करता है और भीतर से खोखला रहता है। 'यो वै भूमा तत्सुखम्' अर्थात जो विशाल है वही आनंद है, वही बल है। उत्तर का बल दिखावे का था, इसलिए पहली परीक्षा में बिखर गया।
अर्जुन का बृहन्नला-रूप यहां एक गहरा रूपक है। वे गुरु थे, पर प्रकट नहीं, अप्रकट। उन्होंने उत्तर को तब तक नहीं बताया कि वे कौन हैं जब तक आवश्यक नहीं था। यह शिक्षाशास्त्र का सूक्ष्मतम सूत्र है। एक सच्चा मार्गदर्शक तीन काम करता है-
पहला : वह शिष्य के भय को स्वीकार करता है, उसका उपहास नहीं करता। अर्जुन ने उत्तर की कायरता पर क्रोध नहीं किया। भय एक सत्य है। उसे झुठलाने से वह जाता नहीं, और गहरा हो जाता है।
दूसरा : वह अपनी शक्ति को साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत करता है, श्रेष्ठता के अहंकार के रूप में नहीं। अर्जुन ने गाण्डीव उठाया, उत्तर को दिखाने के लिए कि संभव है, असंभव नहीं।
तीसरा : वह शिष्य को परिणाम का भागीदार बनाता है। उत्तर ही विजेता कहलाया। अर्जुन ने वह यश नहीं लिया जो उनका था। यही निःस्पृह गुरुत्व है।
आज के संदर्भ में यह कथा और भी प्रासंगिक हो जाती है। हम एक ऐसे युग में हैं जहां युवा पीढ़ी के पास सूचना असीमित है, पर अनुभव का अभाव है। सोशल मीडिया ने उत्तर कुमारों की एक पूरी पीढ़ी बना दी है, जो मंच पर वीर हैं, मैदान में भयभीत। और दूसरी ओर बृहन्नला जैसे गुरु कहां हैं? जो अपनी पहचान, अपना अहंकार, अपनी प्रतिष्ठा एक किनारे रख दें और केवल शिष्य के विकास के लिए काम करें? आज मेंटरशिप प्रायः शर्तों पर होती है, पहचान के बदले, प्रशंसा के बदले, अनुयायी के बदले।
अर्जुन का बृहन्नला-रूप में होना भी एक गहरी सांकेतिकता रखता है। श्रेष्ठ व्यक्ति कभी-कभी अपनी पहचान छुपाकर भी कर्म करता है। यह दैन्य नहीं, यह परिपक्वता है। कर्म करो, फल की चिंता मत करो- गीता का यह संदेश उत्तर-प्रसंग में भी जीवित है। अर्जुन को पता था कि श्रेय उन्हें नहीं मिलेगा। तब भी उन्होंने धर्म नहीं छोड़ा।
उत्तर-बृहन्नला प्रसंग हमें सिखाता है कि नायकत्व जन्म से नहीं, मार्गदर्शन और परीक्षा से निर्मित होता है। हर उत्तर के जीवन में एक बृहन्नला की आवश्यकता है, जो उसकी क्षमता को पहचाने, उसके भय को समझे, और उसे उसकी वास्तविक शक्ति तक पहुंचाए। और हर बृहन्नला को यह स्वीकार करना होगा कि महान गुरु वही है जो अपने शिष्य की विजय में स्वयं को विसर्जित कर दे।
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