
लाक्षागृह का षड्यंत्र जब अपने अंतिम चरण में था, तब हस्तिनापुर में केवल एक व्यक्ति था जो सत्य जानता था। वह थे विदुर। वह महामंत्री थे, धृतराष्ट्र के अनुज थे, और उसी राजसत्ता के सेवक थे जो यह षड्यंत्र रच रही थी। उनके पास दो मार्ग थे- मौन रहकर पद सुरक्षित रखें, या बोलकर पांडवों को बचाएं। विदुर ने दूसरा मार्ग चुना।
किंतु यह सरल नहीं था। वह खुलकर नहीं बोल सकते थे। दुर्योधन की दृष्टि सर्वत्र थी। शकुनि चतुर थे। यदि विदुर ने प्रत्यक्ष रूप से पांडवों को षड्यंत्र बताया होता, तो वे भी संदेह के घेरे में आ जाते और पांडव भी सतर्क होने से पहले ही पकड़े जाते। इसलिए विदुर ने सांकेतिक भाषा का सहारा लिया। जब पांडव वारणावत के लिए प्रस्थान कर रहे थे, तभी विदुर युधिष्ठिर के पास आए और एक पहेली से उन्हें सतर्क कर दिया। विदुर ने युद्धिष्ठर से कहा, 'जो जंगल बिना अग्नि के भी जल सकता है, उससे वही बचता है जो रास्ता जानता हो। इंद्रियों को जागृत रखो। वह जीवित रहता है जो आगे की राह जानता है। शस्त्र वही नहीं जो लोहे से बने।' युधिष्ठिर समझ गए। उन्होंने विदुर को प्रणाम किया और कहा, 'आपका संदेश मुझे मिल गया।'
यह संवाद सतह पर साधारण लगता है, किंतु इसमें एक पूरी रक्षा-योजना छिपी थी। विदुर ने न केवल षड्यंत्र की सूचना दी, बल्कि भूमिगत सुरंग बनाने वाले खनक को भी गुप्त रूप से वारणावत भेजा। उस खनक ने रात के अंधेरे में लाक्षागृह के नीचे वह सुरंग खोदी जो पांडवों की जीवन-रेखा बनी। और जब एक वर्ष बाद भवन जला और पांडव सुरक्षित निकल गए, तब विदुर हस्तिनापुर में मौन बैठे थे। उनका चेहरा पर शोक था, परंतु हृदय आह्लादित था।
विदुर और पांडवों का सम्बन्ध रक्त का नहीं था। विदुर पांडवों के चाचा थे, किंतु सौतेले परिवार के। फिर भी विदुर ने अपना पद, अपनी सुरक्षा और अपना भविष्य दांव पर लगाकर पांडवों को बचाया। सच्ची मित्रता वह नहीं जो सुख में साथ हो, अपितु वह है जो संकट में सावधान करे, चाहे उसकी कीमत क्यों न चुकानी पड़े। आज के समाज में ऐसे मित्र दुर्लभ हैं जो आपको वह सत्य बताएं जो आप सुनना नहीं चाहते, किंतु जिसकी आपको सबसे अधिक आवश्यकता है।
विदुर ने सीधे नहीं कहा। यही उनकी बुद्धिमत्ता थी। उन्होंने जाना कि कभी-कभी सत्य को सांकेतिक रूप में कहना अधिक प्रभावी और सुरक्षित होता है। यह कूटनीति नहीं, परिस्थिति-बोध है। जो व्यक्ति संकट में घबराकर सब कुछ खुलकर कह देता है, वह प्रायः स्थिति और बिगाड़ देता है। विदुर ने माप-तौलकर, सोच-समझकर, न्यूनतम शब्दों में अधिकतम सूचना दी। यही सच्चे मार्गदर्शक की पहचान है।
विदुर हस्तिनापुर के महामंत्री थे, उस संस्था के सेवक जो षड्यंत्र रच रही थी। उन्होंने अपनी संस्थागत निष्ठा को नैतिक निष्ठा से छोटा माना। यह निर्णय अत्यंत कठिन था। आज के संदर्भ में एक अधिकारी जो अपने संगठन के अन्याय को उजागर करे, एक पत्रकार जो अपने संस्थान के दबाव के बावजूद सत्य प्रकाशित करे, एक चिकित्सक जो अस्पताल प्रशासन के विरुद्ध रोगी का पक्ष ले, ये सब विदुर की परम्परा के उत्तराधिकारी हैं।
विदुर ने युधिष्ठिर को चेताया, किंतु राजसभा में दुर्योधन के षड्यंत्र को खुलकर उजागर नहीं किया। क्या यह कायरता थी? नहीं, यह रणनीतिक संयम था। उन्होंने जाना कि खुलकर बोलने से पांडव नहीं बचते, केवल परिस्थिति और जटिल होती। बोलने और मौन रहने के बीच का चुनाव, परिणाम देखकर करना होता है, आवेश से नहीं। यह परिपक्व नेतृत्व की पहचान है।
विदुर आधुनिक भाषा में व्हिसलब्लोअर थे, वह जो व्यवस्था के भीतर रहकर व्यवस्था के अन्याय को उजागर करते हैं। इतिहास में ऐसे लोगों को सदा कीमत चुकानी पड़ी है- पद गंवाना, बहिष्कार, कभी-कभी जीवन गंवाने तक की नौबत आ जाती है। किंतु इन्हीं लोगों ने बार-बार इतिहास की धारा बदली है। विदुर ने अपना पद नहीं खोया, किंतु यह उनका सौभाग्य था, उनका उद्देश्य नहीं। वे परिणाम जाने बिना भी यही करते।
इस कथा में विदुर जितने महत्त्वपूर्ण हैं, उतने ही युधिष्ठिर भी, जिन्होंने संकेत समझा। चेतावनी तभी काम करती है जब प्राप्तकर्ता उसे ग्रहण करने योग्य हो। अनेक लोगों को जीवन में विदुर मिलते हैं, किंतु वे या तो संकेत नहीं समझते, या अहंकारवश अनसुना कर देते हैं। युधिष्ठिर की विनम्रता और जागरूकता ने ही विदुर की चेतावनी को सार्थक बनाया। मित्र की चेतावनी और व्यक्ति की ग्रहणशीलता, दोनों मिलकर जीवन बचाते हैं।
विदुर की चेतावनी महाभारत का वह प्रसंग है जो मित्रता, साहस, विवेक और नैतिक निष्ठा, चारों को एक साथ परिभाषित करता है। यह कथा पूछती है कि क्या तुम्हारे जीवन में कोई विदुर है? और क्या तुम उस विदुर की बात सुनने योग्य युधिष्ठिर हो? महाभारत का उत्तर स्पष्ट है, 'वह मित्र जो तुम्हें प्रिय लगने वाली बात कहे, सो मित्र नहीं, अपितु मित्र वह है जो तुम्हारे लिए आवश्यक बात कहे, चाहे वह कड़वी हो, चाहे उसकी कीमत चुकानी पड़े।' विदुर ने यही किया और इसीलिए पांडव जीवित रहे, इसीलिए महाभारत की कथा आगे बढ़ी, और इसीलिए आज भी जब कोई सच्चा मित्र संकट में सावधान करता है, उसमें विदुर की आत्मा बोलती है।
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