
स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम में नामांकन के लिए आयोजित होने वाली राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (NEET-PG) में चुने जाने का पैमाना बदल गया है। इस कारण अब नंबर लाना तो दूर, नंबर कट जाने के बाद भी परीक्षार्थियों का चयन हो रहा है। जिन परीक्षार्थियों को माइनस या इकाई अंक प्राप्त हुए हैं, उन्हें भी सरकारी मेडिकल कॉलेजों में दाखिला मिल गया है।
इसे लेकर सोशल मीडिया पर बहुत आक्रोश दिख रहा है। जीव वैज्ञानिक और जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में प्रफेसर आनंद रंगनाथन ने एक पोस्ट में संबंधित खबर की हेडिंग शेयर करते हुए अपनी व्यथा व्यक्त की है। रंगनाथन के इस पोस्ट पर कई प्रतिक्रियाएं आईं जिनमें लोग अलग-अलग तरीके से अपनी चिंता जता रहे हैं।
प्रोफेसर आनंद रंगनाथन ने अपने एक्स पोस्ट में लिखा, ‘भारत ने इतिहास रच दिया है। बायोकेमिस्ट्री, जिसे विज्ञान की सबसे बेहतरीन शाखा माना जाता है और जिसकी आविष्कारों को अब तक 56 नोबेल पुरस्कार मिल चुके हैं- जिसमें हरगोविंद खुराना और सुब्बाराव जैसे महान भारतीय वैज्ञानिकों का योगदान रहा है, उसने आज आधिकारिक तौर पर एक ऐसे छात्र का स्वागत किया है जिसने 800 में से माइनस 8 (-8) अंक प्राप्त किए हैं।’
इस पर डॉक्टर धनंजय सिंह तोमर कहते हैं, 'बायोकेमिस्ट्री तो छोड़ दीजिए सर, 'हड्डियों की सर्जरी वाले पाठ्यक्रम में दाखिला लेने वाले छात्र को देखिए, उसे सिर्फ चार अंक मिले हैं। सोचिए, यह डॉक्टर बनकर हड्डियों के गंभीर रूप से टूटने, घुटना एवं कूल्हे का रिप्लेसमेंट जैसी गंभीर मामलों को देखेगा। आपको लगता है कि अगर हड्डी टूट जाए तो देश का एक भी नेता इस चार अंक लाने वाले मसखरे के पास जाएगा या फिर किसी वास्तविक, योग्य डॉक्टर के पास?'
आयुधिक लिखते हैं, 'नोबेल पुरस्कार वाली प्रतिभा की जरूरत किसे है, जब आप 'नकारात्मक उपलब्धि' की कला में माहिर हो सकते हैं? जरा सोचिए, एक ऐसा बायोकेमिस्ट जो एक ऐसा टीका बना दे जो आप पर टीके के असर को खत्म कर दे। जल्द ही हमारे पास ऐसे सर्जन होंगे जो माइनस इन्फिनिटी स्कोर लाकर स्वास्थ्य मंत्री बन जाएंगे। अगला कदम होगा, नेगेटिव पीएचडी। इसमें आप अपनी थीसिस का बचाव यह साबित करके करेंगे कि उसका कोई अस्तित्व ही नहीं है।'
बिस्वरंजन पटनायक लिखते हैं, 'वर्ष 2012 में ही नामांकन बढ़ाने के लिए नीतियां बदलने के कारण चिकित्सा शिक्षा में प्रवेश पाने की पात्रता के मापदंड को बदलना शुरू हुआ था।'
सजल गुप्ता लिखते हैं, ‘लगता है हमें बोरिया-बिस्तरा समेटना शुरू कर देना चाहिए क्योंकि 20-30 वर्षों में ये लोग अस्पतालों में डॉक्टर बन जाएंगे। उनके अंदर स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र के सुधरने की उम्मीद करना बेकार होगा।’
एक्स हैंडल @DadheeChi_Vaani ने लिखा, 'गजब... भारत आने वाले दिनों में जल्द ही अपना मेडिकल टूरिजम का लाभ खोने वाला है।'
कंचन सिंह ने एक अलग पक्ष देखा। उन्होंने कहा, 'बेचारे। मुझे डर है कि वह खुद को नुकसान पहुंचा सकते हैं क्योंकि कॉलेज में उन्हें जबर्दस्त प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ेगा जिससे वो जूझ नहीं सकेंगे।'
ध्यान रहे कि देश में सैकड़ों की संख्या में प्राइवेट मेडिकल कॉलेज खुल गए हैं। नीट की कड़ी परीक्षा में अच्छे अंक लाने वाले परीक्षार्थियों की संख्या बहुत सीमित होती है, इस कारण कई मेडिकल कॉलेजों की सीटें बड़ी संख्या में खाली रह जाती हैं। सोशल मीडिया पर चर्चा और एक्सपर्ट्स की राय बताती है कि इन्हीं सीटों को भरने के लिए सरकार ने पात्रता की शर्तों को ही इतना लचीला बना दिया है कि माइनस मार्क्स लाने वाले स्टूडेंट्स को भी दाखिला मिल सके।
सवाल है कि क्या कॉलेजों का बिजनेस चलाने के चक्कर में सरकार अगले कुछ वर्षों में ऐसे डॉक्टरों की फौज नहीं कर देगी जो डिग्री तो गंभीर बीमारियों के इलाज की हासिल कर लेंगे, लेकिन ज्ञान सामान्य इलाज की भी नहीं होगी? क्या एक देश के रूप में इतना बड़ा खतरा उठाना उचित है? हैरत की बात यह है कि शासन-प्रशासन में बैठे लोगों को एक मेडिकल टूरिजम के तौर पर उभरते भारत की छवि पर लगने वाले बट्टे की रत्ती भर चिंता नहीं।
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