Success Story: कोरोना महामारी का दौर देश के लिए सबसे कठिन समय में से एक था। स्कूलों पर ताले लग गए, ऑनलाइन पढ़ाई शुरू हुई, लेकिन दूर-दराज के आदिवासी इलाकों में रहने वाले हजारों बच्चों के लिए शिक्षा लगभग रुक गई। पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले में भी हालात कुछ ऐसे ही थे।
इसी दौरान एक प्रोफेसर ने तय किया कि कोई भी बच्चा पढ़ाई से वंचित नहीं रहेगा। उन्होंने किसी इमारत का इंतजार नहीं किया, बल्कि पेड़ को ही स्कूल बना दिया। आज उनकी यह छोटी-सी पहल सैकड़ों बच्चों के भविष्य को नई दिशा दे रही है।
लॉकडाउन में दिखी सबसे बड़ी समस्या
कोरोना महामारी के दौरान अंगशुमान ठाकुर पौधारोपण अभियान में शामिल थे। इस दौरान उन्होंने देखा कि आदिवासी इलाके के बच्चे स्कूल जाने के बजाय अपने माता-पिता के साथ मजदूरी और अन्य कामों में लग गए हैं। ऑनलाइन पढ़ाई उनके लिए संभव नहीं थी। ऐसे में उन्होंने बच्चों को दोबारा शिक्षा से जोड़ने का फैसला किया।
शुरुआत में उन्होंने सिर्फ पांच बच्चों को इकट्ठा किया। उन्हें पढ़ाने के साथ-साथ मिड-डे मील जैसी व्यवस्था भी शुरू की, ताकि बच्चे नियमित रूप से पढ़ने आ सकें।
रवींद्रनाथ टैगोर की सोच से मिली प्रेरणा
द बेटर इंडिया में छपी खबर के मुताबिक, अंगशुमान ठाकुर विश्व भारती विश्वविद्यालय, शांतिनिकेतन के पूर्व छात्र हैं। गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर की प्रकृति के बीच शिक्षा देने की सोच से प्रेरित होकर उन्होंने वर्ष 2021 में पेड़ के नीचे नियमित कक्षाएं शुरू कर दीं।
उन्होंने इस स्कूल का नाम 'अनिर्वाण गाचेर इस्कूल' रखा। 'अनिर्वाण' का अर्थ है जो कभी न बुझे, जबकि 'गाचेर' का मतलब पेड़ होता है। यानी ऐसा स्कूल, जहां ज्ञान की रोशनी कभी खत्म न हो।
5 बच्चों से शुरू हुई पहल, आज 100 से ज्यादा छात्र
जो अभियान पांच बच्चों से शुरू हुआ था, आज वहां 100 से अधिक बच्चे पढ़ाई कर रहे हैं। यहां बच्चों को आम और नीम के पेड़ों की छांव में पढ़ाया जाता है। स्कूल में बुनियादी शिक्षा के साथ प्रकृति से जुड़ाव पर भी विशेष जोर दिया जाता है।
अंगशुमान बताते हैं कि एक बच्चे की पढ़ाई पर करीब 300 रुपये प्रति माह खर्च आता है, लेकिन आर्थिक चुनौतियों के बावजूद उन्होंने इस मिशन को रुकने नहीं दिया।
हरियाली बचाने से शुरू हुआ शिक्षा का आंदोलन
अंगशुमान ठाकुर सिर्फ शिक्षक ही नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण से भी जुड़े हैं। उन्होंने वर्ष 2019 में सोशल मीडिया के जरिए पौधारोपण अभियान शुरू किया। लोगों का अच्छा सहयोग मिला और बाद में 'गाच ग्रीन हैंड्स सोशल वेलफेयर ट्रस्ट' का गठन किया गया।
इसी अभियान के दौरान उनका संपर्क आदिवासी बच्चों से हुआ और फिर शिक्षा का यह मिशन शुरू हुआ, जो आज एक मिसाल बन चुका है।
चार दीवारी नहीं, फिर भी बन गया स्कूल
आर्थिक संसाधनों की कमी के कारण स्कूल की इमारत बनाना संभव नहीं था। लेकिन अंगशुमान ने इसे अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया। उन्होंने पेड़ों की छांव को ही कक्षा बना दिया।
आज यहां बच्चे खुली हवा में पढ़ते हैं, प्रकृति के बीच सीखते हैं और किताबों के साथ पर्यावरण संरक्षण का महत्व भी समझते हैं।