Success Story: कभी बैंक में थे वाइस प्रेसिडेंट, अब मुर्गी फार्म से हर साल लाखों का मुनाफा

Success Story: उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के रहने वाले अरविंद कुमार श्रीवास्तव ने MBA करने के बाद करीब 10 साल तक बैंक और इंश्योरेंस से जुड़े कारोबार में नौकरी की। वाइस प्रेसिडेंट तक पहुंचे और सालाना 18 लाख रुपये का पैकेज हासिल किया। लेकिन अपना बिजनेस शुरू करने के लिए उन्होंने नौकरी छोड़ दी।

Jitendra Singh
अपडेटेड10 Aug 2026, 06:18 AM IST
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Success Story: सालाना टर्नओवर 70-80 लाख रुपये पहुंच गया है।
Success Story: सालाना टर्नओवर 70-80 लाख रुपये पहुंच गया है।

Success Story: एक समय था जब अरविंद कुमार श्रीवास्तव के पास कॉरपोरेट दुनिया की अच्छी नौकरी थी। एमबीए की डिग्री के बाद उन्होंने बैंकिंग और फाइनेंस सेक्टर की कई बड़ी कंपनियों में काम किया। करियर आगे बढ़ा तो जिम्मेदारियां भी बढ़ती गईं और उनकी मासिक सैलरी 1.5 लाख रुपये तक पहुंच गई। यानी सालाना पैकेज करीब 18 लाख रुपये था।

लेकिन अरविंद के मन में हमेशा अपना कारोबार शुरू करने की इच्छा थी। आखिरकार उन्होंने अच्छी-खासी नौकरी छोड़ने का फैसला किया। इसके बाद जो सफर शुरू हुआ, उसने उनकी जिंदगी पूरी तरह बदल दी। आज वही अरविंद कुमार श्रीवास्तव ग्रेटर नोएडा में देसी अंडे और मुर्गे-मुर्गियों के कारोबार से सालाना लाखों रुपये कमा रहे हैं।

बस्ती से शुरू हुआ सफर, बड़े कॉरपोरेट करियर तक पहुंचे

अरविंद कुमार श्रीवास्तव मूल रूप से उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के रहने वाले हैं। उन्होंने साल 2001 से 2003 के बीच एमबीए की पढ़ाई पूरी की। इसके बाद उन्होंने बैंकिंग और फाइनेंस सेक्टर में करियर शुरू किया। उन्होंने इंडसइंड बैंक, एचडीएफसी, कोटक महिंद्रा और बजाज फाइनेंस जैसी कंपनियों में काम किया। अपने करियर के दौरान वह असिस्टेंट ब्रांच मैनेजर से ब्रांच मैनेजर, फिर क्लस्टर हेड और आखिरकार वाइस प्रेसिडेंट के पद तक पहुंचे।

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दिल्ली-NCR में करीब 10 साल तक काम करने के दौरान उनकी मासिक आय 20-30 हजार रुपये से बढ़कर करीब 1.5 लाख रुपये हो गई। यानी वह सालाना करीब 18 लाख रुपये के पैकेज तक पहुंच गए थे।

नौकरी छोड़ी तो पहले शुरू किया प्ले स्कूल

NDTV में छपी खबर के मुताबिक, करीब एक दशक तक नौकरी करने के बाद अरविंद ने तय किया कि अब किसी कंपनी के लिए काम करने के बजाय अपना बिजनेस किया जाए। इसी सोच के साथ साल 2013 में उन्होंने नोएडा में एक प्ले स्कूल शुरू किया। यह कारोबार अच्छा चलने लगा और इससे उन्हें अच्छी कमाई भी होने लगी। लेकिन साल 2020 में आई कोरोना महामारी ने उनके इस बिजनेस को बड़ा झटका दिया। स्कूल बंद हो गया और बाद में उसे दोबारा शुरू नहीं किया जा सका। यह अरविंद के लिए मुश्किल समय था, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। उन्होंने इसी संकट को नए बिजनेस के मौके में बदलने का फैसला किया।

दो-तीन साल तक किया मार्केट सर्वे, फिर समझ आया असली मौका

प्ले स्कूल बंद होने के बाद अरविंद ने तुरंत कोई नया कारोबार शुरू नहीं किया। उन्होंने करीब दो-तीन साल तक नोएडा और दिल्ली-एनसीआर के बाजार को समझने में लगाए। उन्होंने यह जानने की कोशिश की कि इस इलाके में लोग किस तरह के चिकन और अंडे ज्यादा पसंद करते हैं। साथ ही उन्होंने यह भी समझा कि बाजार में किस नस्ल की कितनी मांग है और ग्राहक किस तरह के उत्पाद के लिए ज्यादा कीमत देने को तैयार हैं। इसी मार्केट रिसर्च के दौरान उन्हें देसी अंडे और देसी मुर्गे के कारोबार में बड़ा अवसर दिखाई दिया।

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22 लाख से शुरू किया फार्म, आज 12 हजार मुर्गे-मुर्गियां

मार्केट सर्वे के बाद साल 2021-22 में अरविंद कुमार ने ग्रेटर नोएडा के दादरी ब्लॉक स्थित दतावली (बोड़ाकी) गांव में नोएडा एग्री फार्म की शुरुआत की। उन्होंने करीब 22 लाख रुपये का शुरुआती निवेश किया। फार्म में उन्होंने सोनाली और ब्लैक एस्ट्रोलॉर्प नस्ल की मुर्गे-मुर्गियों का पालन शुरू किया। शुरुआत बेहद छोटी थी। उनके पास सिर्फ एक शेड था और करीब 4,500 मुर्गे-मुर्गियां थीं। लेकिन सही नस्ल, बाजार की समझ और लगातार मेहनत के साथ कारोबार बढ़ता गया। आज उनके फार्म में दो बड़े शेड हैं और मुर्गे-मुर्गियों की संख्या बढ़कर करीब 12,000 हो गई है।

70-80 लाख रुपये का सालाना टर्नओवर, 36 लाख की शुद्ध कमाई

अरविंद की मेहनत का असर उनके कारोबार के आंकड़ों में साफ दिखाई देता है। शुरुआती 22 लाख रुपये के निवेश से शुरू हुआ उनका फार्म आज सालाना 70 से 80 लाख रुपये का टर्नओवर कर रहा है। सभी खर्च निकालने के बाद उनकी सालाना शुद्ध कमाई करीब 36 लाख रुपये तक पहुंच गई है। यानी जिस व्यक्ति के पास कभी 18 लाख रुपये का सालाना पैकेज था, उसने नौकरी छोड़कर ऐसा बिजनेस खड़ा किया, जहां अब उसका सालाना मुनाफा उसकी पुरानी सैलरी से काफी ज्यादा है।

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सर्दियों में बिक्री आसान, गर्मियों में असली परीक्षा

देसी मुर्गी पालन में सीजन का भी बड़ा असर पड़ता है। अरविंद बताते हैं कि दिसंबर से फरवरी तक ठंड के मौसम में अंडे और मुर्गे बेचना अपेक्षाकृत आसान रहता है। लेकिन मई, जून और जुलाई में कारोबार की असली परीक्षा होती है। गर्मी के महीनों में बाजार की मांग घटकर आधी से भी कम रह सकती है। ऐसे समय में सिर्फ उत्पादन बढ़ाना काम नहीं आता। कारोबारी को बाजार की स्थिति समझकर बिक्री और उत्पादन की रणनीति बदलनी पड़ती है। अरविंद के मुताबिक इसी समय कारोबारी की मार्केट समझ और सही रणनीति सबसे ज्यादा काम आती है।

कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग से अलग मॉडल पर जोर

अरविंद का कहना है कि कई किसान अब कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग छोड़कर उनके साथ जुड़ रहे हैं। उनके मुताबिक कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग में छोटे किसानों के लिए मुनाफा सीमित रहता है और कई बार नुकसान का जोखिम भी बढ़ जाता है। उनका मानना है कि देसी मुर्गी पालन छोटे और बड़े दोनों तरह के किसानों के लिए कमाई का एक अच्छा प्लेटफॉर्म बन सकता है। वह किसानों को अपने अनुभव के आधार पर मार्गदर्शन और मेंटरशिप भी देते हैं।

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आज उनके फार्म में 12,000 तक मुर्गे-मुर्गियां हैं और सभी खर्च निकालने के बाद करीब 36 लाख रुपये सालाना की शुद्ध कमाई हो रही है। यह कहानी बताती है कि नौकरी से बिजनेस की तरफ जाने का फैसला जोखिम भरा जरूर हो सकता है, लेकिन सही रिसर्च, मेहनत और बाजार की समझ के साथ इसे सफल कारोबार में बदला जा सकता है।

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