Success Story: इन्फोसिस का ऑफिस बॉय बन गया CEO, जानिए कैसे हुआ कमाल

Success Story: सोशल मीडिया पर इन दिनों एक खबर तैर रही है, जिसमें इन्फोसिस का एक ऑफिस बॉय कंपनी का चीफ एग्जीक्यूटिव ऑफिसर (CEO) बन गया है। शख्स की कड़ी मेहनत को देखते हुए देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी सराहना की है। आइये जानते हैं इस शख्स की कैसी रही संघर्ष की गाथा

Jitendra Singh
अपडेटेड7 Feb 2026, 05:56 AM IST
Success Story: दादासाहेब भगत कभी चपरासी का काम करते थे, आज CEO हैं।
Success Story: दादासाहेब भगत कभी चपरासी का काम करते थे, आज CEO हैं।

Success Story: अगर आप अपने हुनर का इस्‍तेमाल सही तरीके से करना जानते हैं तो आपको सफल होने से कोई नहीं रोक सकता है। महाराष्‍ट्र के एक छोटे से गांव के दादासाहेब भगत ने इन्फोसिस में एक ऑफ‍िस बॉय के तौर पर काम शुरू क‍िया था और आप एक कंपनी का CEO है। कभी 4000 महीने की सैलरी पर काम करने वाला यह लड़का अब अपनी कंपनी 'Design Template' का मालिक है, वो भी इतनी सफलता के साथ कि उसकी शार्क टैंक इंडिया तक चर्चा पहुंच चुकी है। इतना ही नहीं देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी चर्चा कर चुके हैं।

दादासाहेब भगत महाराष्ट्र के बीड के एक सूखाग्रस्त गांव से ताल्लुक रखते हैं। वह यहीं पले-बढ़े। यह एक ऐसा इलाका है, जहां सूखे जैसी स्थिति बन गई थी। इस वजह से वहां खेती करना मुश्किल था। उनके परिवार में शिक्षा को प्राथमिकता नहीं दी जाती थी। उन्होंने दसवीं तक पढ़ाई की और फिर आईटीआई का कोर्स किया। इसके बाद नौकरी तलाश में महाराष्ट्र के पुणे आ गए।

इन्फोसिस में मिल गई चपरासी की नौकरी

दादासाहेब भगत को पुणे में पहली नौकरी चपरासी की मिली। शुरुआती दौर में उन्हें 4000 रुपये सैलरी मिलती थी। इन पैसों से घर का गुजारा नहीं हो पा रहा था। ऐसे में भगत दूसररी नौकरी की तलाश में डूबे थे। तभी उन्हें इन्फोसिस में बतौर ऑफिस बॉय (चपरासी) की नौकरी मिल गई। इस नौकरी से भगत बेहद खुश हुए। इन्फोसिस में भगत को 9000 रुपये सैलरी मिल रही थी। भगत को भी नहीं पता था कि इन्फोसिस कंपनी से ही उनकी किस्मत पलटने वाली है।

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अब भगत रोजाना की तरह ऑफिस साफ करते। इंजीनियर्स के बैठने की डेस्क साफ करते, उन्हें चाय पिलाते। तभी भगत ने पहली बार कंप्यूटर देखा था। भगत को यकीन हो गया कि शारीरिक मेहनत के बजाय डिजिटल से भी कमाई की जा सकती है। बस यहीं से भगत इंजीनियर्स से कंप्यूटर से जुड़े प्रश्न पूछते रहते थे। इस दौरान ऑफिस के एक शख्स ने ग्राफिक्स डिजाइन के बारे में जिक्र किया। यही बात भगत के दिल में चिंगारी जल गई।

यूट्यूब से सीखा डिजाइनिंग का काम

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, बचपन में, दादासाहेब अक्सर किसी स्थानीय कलाकार के साथ मिलकर मंदिरों में भित्ति चित्र बनाते थे। उन्होंने ग्राफिस डिजाइन को उससे रिलेट किया। उन्हें राह दिखाने वाले इंजीनियर ने राह दिखाई। उसने बताया कि हां बस ग्राफिक डिजाइन एक तरह की भित्ति चित्र ही है। दादासाहेब दिन में वे नौकरी करते और रात में मोबाइल पर ग्राफिक डिजाइनिंग से संबंधित वीडियो देखते। उन्होंने ऑनलाइन ट्यूटोरियल और फ्री प्रोग्राम का इस्तेमाल करके डिजाइनिंग सीखनी शुरू की। एक साल से भी कम समय में, वे एक ऑफ़िस बॉय से ग्राफिक डिज़ाइनर बन गए, और पोछा लगाने की बजाय इन्फोसिस में ही माउस से कमाई करने लगे।

ऐसे बन गए फ्रीलांस डिजाइनर

उन्होंने एक डिजाइनर के रूप में फ्रीलांसिंग शुरू की और बाद में अपनी खुद की डिजाइन कंपनी शुरू की। लेकिन सफलता रातोंरात नहीं मिलती है। उन्हें कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा। इसमें आर्थिक चुनौती, सीमित संसाधन और दूसरों के संदेह शामिल थे। इन सबके बाद कोविड-19 महामारी आ गई। इस वजह से उन्हें पुणे में अपना डिजाइनिंग का काम बंद करके अपने गांव लौटना पड़ा। गांव आने पर भी उन्होंने हार नहीं मानी।

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भगत ने गांव में पहाड़ी के पास एक छोटा ऑफिस बनाकर 'Design Template' स्टार्टअप की शुरुआत की। यहीं से बनी एक ऐसी कंपनी जो अब कैनवा जैसे इंटरनेशनल डिजाइन प्लेटफॉर्म्स को टक्कर दे रही है। उनकी मेहनत और जज़्बे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ध्यान भी खींचा। .पीएम ने 'मेक इन इंडिया' के तहत उनकी सराहना की।

शार्क टैंक तक पहुंची सफलता

जब दादासाहेब शार्क टैंक इंडिया में पहुंचे, तो उन्होंने boAt के अमन गुप्ता के साथ 1 करोड़ में 10% इक्विटी का सौदा किया। आज उनकी कंपनी हजारों डिजाइनर्स को प्लेटफॉर्म दे रही है और भारत को डिजिटल डिजाइन में आत्मनिर्भर बना रही है।

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