Success Story: सरकारी स्कूलों की बदहाल व्यवस्था और बच्चों के भविष्य को लेकर अक्सर सवाल उठते हैं, लेकिन तेलंगाना के आदिलाबाद जिले में एक IAS अधिकारी ने हालात बदलने का फैसला किया। जिला कलेक्टर राजर्षि शाह जब अचानक सरकारी स्कूलों के निरीक्षण पर पहुंचे तो वहां का नजारा देखकर हैरान रह गए।
कई कक्षाओं में छात्रों की संख्या बेहद कम थी और सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि करीब 11 साल के बच्चे भी तंबाकू चबा रहे थे। बड़ी संख्या में छात्र नशे की गिरफ्त में थे और पढ़ाई से उनका लगाव लगभग खत्म हो चुका था। यहीं से एक ऐसी पहल की शुरुआत हुई, जिसकी आज पूरे देश में चर्चा हो रही है।
स्कूल निरीक्षण में सामने आई गंभीर तस्वीर
निरीक्षण के दौरान राजर्षि शाह ने पाया कि कई छात्र नियमित रूप से स्कूल नहीं आते थे। जो आते भी थे, उनमें स्वास्थ्य, स्वच्छता और अनुशासन को लेकर जागरूकता की भारी कमी थी। बच्चों के साथ-साथ कई अभिभावकों में भी स्वास्थ्य और शिक्षा के प्रति जागरूकता का अभाव था। ऐसे हालात में सिर्फ किताबों की पढ़ाई से बदलाव संभव नहीं था।
'आरोग्य पाठशाला' की शुरुआत से बदली तस्वीर
बच्चों में सकारात्मक बदलाव लाने के लिए राजर्षि शाह ने सुबह की प्रार्थना सभा को नया स्वरूप दिया और इसे 'आरोग्य पाठशाला' नाम दिया। इसकी शुरुआत 14 नवंबर 2024 (बाल दिवस) से की गई। प्रार्थना के बाद हर दिन अलग-अलग विषयों पर जागरूकता सत्र आयोजित किए जाने लगे।
सोमवार – व्यक्तिगत स्वच्छता
मंगलवार – स्वास्थ्य और पोषण
बुधवार – तनाव प्रबंधन और मानसिक स्वास्थ्य
गुरुवार – नशा मुक्ति और एंटी-ड्रग जागरूकता
शुक्रवार – बीमारियों से बचाव
शनिवार – आत्मविश्वास और नेतृत्व विकास
नशे से दूरी, स्कूलों में बढ़ी छात्रों की उपस्थिति
इस पहल का असर कुछ ही महीनों में दिखाई देने लगा। जो छात्र पहले नशे की ओर बढ़ रहे थे, उनमें जागरूकता बढ़ी और वे नियमित रूप से स्कूल आने लगे। स्कूलों में छात्रों की उपस्थिति, जो पहले 50% से भी कम रहती थी, बढ़कर करीब 70% तक पहुंच गई। पढ़ाई के प्रति बच्चों की रुचि भी बढ़ने लगी और स्कूल का माहौल पहले की तुलना में काफी सकारात्मक हो गया।
आज 250 से ज्यादा स्कूलों में चल रही है पहल
आरोग्य पाठशाला की सफलता के बाद इस मॉडल को जिले के 250 से अधिक सरकारी स्कूलों में लागू किया गया। अब हजारों छात्र रोजाना स्वास्थ्य, स्वच्छता, मानसिक स्वास्थ्य और नशा मुक्ति से जुड़ी जानकारी प्राप्त कर रहे हैं। इस पहल ने ग्रामीण इलाकों में शिक्षा और स्वास्थ्य के प्रति नई सोच विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
आदिलाबाद में क्यों जरूरी थी यह पहल?
आदिलाबाद देश के सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े जिलों में गिना जाता है। जिले की बड़ी आबादी अनुसूचित जाति और जनजाति समुदाय से जुड़ी है। यहां गरीबी, कुपोषण, स्वास्थ्य सेवाओं की कमी और शिक्षा से दूरी जैसी समस्याएं लंबे समय से बनी हुई हैं।
राजर्षि शाह के अनुसार, बच्चों के साथ-साथ अभिभावकों में भी स्वास्थ्य और स्वच्छता को लेकर जागरूकता बेहद कम थी। कई बच्चे कम उम्र में ही तंबाकू जैसे नशे के शिकार हो रहे थे। ऐसे में केवल पढ़ाई नहीं, बल्कि जीवनशैली में बदलाव लाना भी जरूरी था।
शिक्षा के साथ जीवन बदलने की मिसाल
आरोग्य पाठशाला ने यह साबित किया है कि यदि स्कूलों में शिक्षा के साथ स्वास्थ्य, अनुशासन और जागरूकता को भी प्राथमिकता दी जाए, तो बच्चों का भविष्य बेहतर बनाया जा सकता है। राजर्षि शाह की यह पहल आज देश के कई जिलों के लिए एक प्रेरणादायक मॉडल बनकर उभरी है और यह दिखाती है कि एक संवेदनशील प्रशासनिक अधिकारी समाज में कितना बड़ा बदलाव ला सकता है।