Success Story: मध्य प्रदेश का नर्मदापुरम जिला अपनी उपजाऊ काली मिट्टी और गेहूं की बंपर पैदावार के लिए पूरे देश में जाना जाता है। नर्मदा नदी के किनारे बसे इस क्षेत्र के अधिकांश किसान गेहूं, सोयाबीन, गन्ना, धान और चना जैसी पारंपरिक फसलों की खेती करते हैं। लेकिन इसी जिले की प्रगतिशील किसान कंचन वर्मा ने अलग राह चुनने का फैसला किया। उन्होंने पारंपरिक खेती छोड़कर हल्दी की खेती शुरू की और आज उसी फैसले ने उन्हें लाखों रुपये की अतिरिक्त आय दिलाई है।
कंचन वर्मा का परिवार वर्षों से खेती से जुड़ा रहा है। उन्होंने स्नातक (बीए) तक पढ़ाई की और शादी के बाद खेती की जिम्मेदारी संभाली। शुरुआत में उन्होंने गेहूं, मक्का और सब्जियों की खेती की, लेकिन इन फसलों से होने वाली आय उनकी उम्मीदों के मुताबिक नहीं थी। प्रति एकड़ करीब ₹1.50 लाख तक की कमाई होती थी, जिससे खेती का विस्तार करना आसान नहीं था।
टीवी पर मिला नया आइडिया, KVK से ली ट्रेनिंग
साल 2020 में एक टेलीविजन कार्यक्रम देखते समय कंचन को हल्दी की खेती के बारे में जानकारी मिली। इसके बाद उन्होंने इस विषय को गंभीरता से समझने का फैसला किया और कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) पहुंचीं। वहां उन्होंने 7 दिनों का विशेष प्रशिक्षण लिया। प्रशिक्षण के दौरान उन्हें हल्दी की उन्नत खेती, बीज चयन, मिट्टी प्रबंधन और जैविक तकनीकों की जानकारी दी गई। इसके बाद उन्होंने हल्दी की खेती शुरू करने का फैसला किया।
सांगली किस्म ने बदल दी किस्मत
कंचन वर्मा ने हल्दी की सांगली किस्म को चुना। इस किस्म में करक्यूमिन की मात्रा अधिक होती है, जिसकी वजह से दवा उद्योग और प्रोसेसिंग इंडस्ट्री में इसकी मांग काफी रहती है। गहरे नारंगी रंग और मजबूत जड़ों वाली इस किस्म ने उन्हें बेहतर उत्पादन और बेहतर बाजार मूल्य दिलाया। यही उनकी सफलता का सबसे बड़ा कारण बना।
खेत की तैयारी पर दिया सबसे ज्यादा ध्यान
हल्दी की खेती शुरू करने से पहले कंचन ने खेत की मिट्टी की जांच कराई और ऐसी भूमि का चयन किया जिसमें पानी निकासी अच्छी हो। उन्होंने रेतीली दोमट मिट्टी में खेती की, जो ह्यूमस से भरपूर थी। रासायनिक खाद पर निर्भर रहने के बजाय उन्होंने गाय के गोबर की खाद, जीवामृत और जैविक खेती के तरीकों को अपनाया। इससे मिट्टी की उर्वरता बढ़ी और कीटों का प्रकोप भी कम हुआ।
दोगुनी हुई प्रति एकड़ कमाई
हल्दी की खेती का परिणाम उम्मीद से कहीं बेहतर रहा। जहां पहले पारंपरिक फसलों से प्रति एकड़ करीब ₹1.50 लाख की आय होती थी, वहीं हल्दी से यह बढ़कर ₹3 लाख प्रति एकड़ तक पहुंच गई। वर्ष 2023 में कंचन वर्मा ने हल्दी की खेती से करीब ₹12 लाख की कमाई की। उनकी सफलता को देखकर आसपास के कई किसान भी हल्दी की खेती की ओर आकर्षित हुए।
अब 10 एकड़ में कर रहीं खेती
आज कंचन वर्मा लगभग 10 एकड़ भूमि पर हल्दी की खेती कर रही हैं। उनका लक्ष्य इस वर्ष ₹30 लाख से अधिक की आय हासिल करना है। वह केवल खुद खेती नहीं कर रहीं, बल्कि अन्य किसानों को भी हल्दी जैसी नकदी फसल अपनाने और आधुनिक तकनीकों के इस्तेमाल के लिए प्रेरित कर रही हैं।
किसानों के लिए क्या है सीख?
कंचन वर्मा की कहानी बताती है कि खेती में केवल मेहनत ही नहीं, बल्कि सही फसल का चुनाव, आधुनिक तकनीक, प्रशिक्षण और बाजार की मांग को समझना भी जरूरी है। यदि किसान स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार नई फसलों को अपनाएं और वैज्ञानिक तरीके से खेती करें, तो कम भूमि से भी बेहतर मुनाफा कमाया जा सकता है। यही सोच कंचन वर्मा को आज हजारों किसानों के लिए प्रेरणा बना रही है।