Success Story: महाराष्ट्र की सलोनी गोडबोले तिवारी ने कैंसर रिसर्च को छोड़कर पशुपालन क्षेत्र में कदम रखा। इसके बाद यहां क्रांति ला दी है। सलोनी ने डॉ. मिलिंद निफाडकर के साथ मिलकर 2018 में ओकेमी बायोसाइंस की स्थापना की थी। इसका मकसद ग्रामीण किसानों को किफ़ायती माइक्रोब-आधारित समाधान प्रदान करना था। सलोनी का मानना था कि प्रोबायोटिक्स इंसानों के लिए फायदेमंद हो सकते हैं, तो जानवरों के लिए क्यों नहीं, उन्होंने 'पशुओं के लिए च्यवनप्राश' जैसे न्यूट्रास्युटिकल्स बनाए।
महाराष्ट्र टाइम्स में छपी खबर के मुताबिक, सलोनी गोडबोले तिवारी ACTREC में बतौर जूनियर रिसर्च वैज्ञानिक काम कर रहीं थी। उन्होंने नौकरी छोड़ दी और पशुओं के स्वास्थ्य क्षेत्र में कदम रखा। सलोनी ने नौकरी छोड़ने का अचानक फैसला नहीं लिया, बल्कि अपनी योजना के तहत उन्होंने इस क्षेत्र में कदम रखा। सलोनी इस बात से चिंतित थीं कि जीवन रक्षक विज्ञान ग्रामीण भारत और किसानों तक नहीं पहुंच पा रहा है। उन्होंने देखा कि दूध की गिरती गुणवत्ता और एंटीबायोटिक दवाओं के अंधाधुंध इस्तेमाल से एक नई समस्या पैदा हो रही है।
2018 में ओकैमी बायोसाइंस की शुरुआत
सलोनी ने डॉ. मिलिंद निफाडकर के साथ मिलकर 2018 में ओकैमी बायोसाइंस की शुरुआत की। उनका मकसद विज्ञान आधारित प्राकृतिक सप्लीमेंट्स (न्यूट्रास्यूटिकल्स) को भारत के कोने-कोने तक पहुंचाना है, ताकि न केवल पशु स्वस्थ रहें, बल्कि मानव स्वास्थ्य और खाद्य सुरक्षा की चुनौतियों का भी समाधान हो सके। सलोनी ने ऐसे प्रोडक्ट बनाए जो गाय, भैंस और बकरियों के लिए च्यवनप्राश के नाम से मशहूर हैं। इन्हें सिंथेटिक दवाओं के बजाय लाभदायक रोगाणुओं यानी माइक्रोब्स, अमीनो एसिड, प्रोबायोटिक्स और प्राकृतिक तत्वों का इस्तेमाल करके बनाया जाता है।
उनके प्रमुख इनोवेशन में 'रक्षक' (रोग प्रतिरोधक क्षमता और प्रजनन के लिए), 'बोवी बूस्टर' (दूध की मात्रा और गुणवत्ता बढ़ाने के लिए) और 'बक बूस्टर' (बकरियों में वजन बढ़ाने के लिए) शामिल हैं। इन सप्लीमेंट्स से महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु सहित पूरे भारत के किसानों को फायदा हुआ है।
दवाओं की निर्भरता में आई कमी
ग्रामीण क्षेत्रों में किसान अनजाने में दूध की मात्रा और गुणवत्ता बनाए रखने के लिए एंटीबायोटिक या हार्मोन इंजेक्शन का बहुत ज्यादा इस्तेमाल करते हैं। इससे फूड चेन प्रदूषित होती है। सलोनी का वेंचर पशुओं के स्वास्थ्य में सुधार करके किसानों को इन हानिकारक दवाओं पर निर्भरता कम करने में मदद करता है। वित्ती वर्ष 2024-25 में न्यूट्रास्यूटिकल डिवीजन का सालाना बिजनेस लगभग 50 लाख रुपये रहा। कंपनी अगले 5 सालों के लक्ष्यों के लिए धन जुटा रही है। इसका मकसद भारत और विश्व स्तर पर विस्तार करना है।